जब कांग्रेस में पैदा हुआ गरम दल .. भारत की आज़ादी की वो कहानी जो हर भारतीय को पढना चाहिए.. भाग 5

आज़ादी की गाथा …

जब कांग्रेस में पैदा हुआ गरम दल …..

भारत की आज़ादी की वो कहानी जो हर भारतीय को पढना चाहिए.. भाग 5

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प्रारंभ के वर्षों में कांग्रेस स्वतंत्रता के उद्देश्य के लिए सुदूर सच्चाई के रूप में प्रतिबद्ध थी। इस अवधि को कांग्रेस की नरम अवस्था के रूप में जाना जाता है। इस काल में राजनीतिक और प्रशासनिक सुधारों पर जोर दिया गया था। इन सुधारों के जरिये भारतीयों को आत्मशासन के लिए क्रमशः प्रशिक्षित किया जाना था लम्बे अर्से तक इस तरह के प्रशिक्षण के बाद भारतवासी स्वतंत्रता के योग्य बन सकेंगे और तब अंग्रेज इस देश को छोड़कर जायेंगे। ऐसा कब होगा? इसका उस समय पूर्वानुमान नहीं किया जा सकता था अतः उक्त समय के लिए भारतीयों ने अपनी तकलीफों को अंग्रेजों के ध्यान में लाने की आवश्यकता तक सीमित रखा, यह काम एक ओर तो भारत में, अधिकारियों की याचिका प्रस्तुत करके किया जा सकता था। दूसरी ओर प्रचार करके अंग्रेज जनमत को भारत के पक्ष में करने की जरूरत थी। इस नरम अवस्था के दौरान कांग्रेस ने जिन सुधारों की माँग की, वे दो बुनियादी मुद्दों पर केन्द्रित थेः

प्रतिनिधि शासन और प्रशासन का भारतीयकरण यह तर्क दिया गया कि अपने श्रेष्ठ मन्तव्यों के बावजूद अंग्रेज विदेशी होने के कारण भारतीयों की भावनाओं और जरूरतों को उस तरह नहीं समझ सकते थे जिस तरह कि उनके अपने प्रतिनिधि और अधिकारी समझ सकते है अतः अपने पहले अधिवेशन से ही कांग्रेस ने यह माँग करना शुरू किया कि भारतीयों को सुरक्षा और प्रांतीय परिषदों में अपने चुने हुए प्रतिनिधि भेजने का अधिकार अनिवार्य रूप से होना चाहिये।

निश्चय ही शुरू के वर्षों में कांग्रेस ने बहुत थोड़ी मात्रा में प्रतिनिधित्व की माँग की, परन्तु समय बीतने के साथ अधिक से अधिक प्रतिनिधित्व की मांग की जाने लगी। प्रशासन का भारतीयकरण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कांग्रेस ने अपने पहले अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित किया कि सिविल सेवा परीक्षा भारत और इंग्लैंड में एक साथ आयोजित की जानी चाहिये। इस प्रस्ताव में यह भी मांग की गई कि आई.सी.एस. परीक्षा के लिए अधिकतम आय सीमा कम से कम 23 तक क दी जाए। शासन में चुने हुए भारतीय प्रतिनिधि होने की आवश्यकता संबंधी प्रस्ताव के समान प्रशासन के भारतीयकरण का प्रस्ताव कांग्रेस के प्रत्येक वार्षिक अधिवेशन में पारित किया जाना शुरू कर दिया गया।
born in the Congress-Newspuran-01कांग्रेस का ध्यान स्थापना के पहले वर्ष से ही एक और महत्वपूर्ण विषय की ओर था जो कि कराधान से संबंधित था। जैसा कि हम देख चुके हैं कि यह होना ही था क्योंकि भारत का शोषण करने का मुख्य साधन कराधान था। कांग्रेस ने तर्क दिया कि भारत जैसे गरीब देश में शासकीय व्यय अंग्रेजों ने जो उस पर थोप रखा है उससे कहीं बहुत कम होना चाहिये। यह खर्च कम किया जाना संभव था क्योंकि इसमें से काफी अनावश्यक और फिजूल था। जैसे ही यह कम किया जाएगा लोगों पर कराधान का भार कम हो जाएगा। कांग्रेस ने भारत की अंग्रेज सरकार के बढ़ते हुए सैन्य व्यय पर खासतौर पर विरोध प्रकट किया। भारत की सुरक्षा के लिए इतने बड़े सैन्य बजट की आवश्यकता नहीं थी। वास्तव में इस व्यय का काफी भाग ब्रिटेन के साम्राज्यीय हितों की रक्षा पर खर्च होता था। ऐसा होने के कारण न्याय की माँग थी कि ब्रिटेन इस खर्च में सहभागी बने, बजाय इसके कि वह अपने साम्राज्य की कीमत गरीब भारत पर लाद दे। यद्यपि न्याय नियमानुसार कार्यवाही की बात करते थे। यह प्रारंभिक राष्ट्रवादी जानते थे कि कराधान बहुत ज्यादा और गैर जिम्मेदाराना बना रहेगा यदि भारतीयों ने इस देश की सरकार की प्रभावी आवाज नहीं प्राप्त कर ली। वह इस सिद्धान्त की महत्ता समझते थे कि बिना प्रतिनिधित्व के कोई कराधान नहीं होना चाहिये। चुने हुए भारतीय प्रतिनिधित्व की मांग करने के अलावा कांग्रेस यह भी चाहती थी कि सारा बजट परिषदों को भेजा जाए। अब चूँकि हमें आजाद हुए बहुत वर्ष हो गये है, तब हमें ऐसा प्रतीत होता है कि नरम कांग्रेसी शायद अजीब तरीके से व्यवहार कर रहे थे। आखिरकार जब उन्होंने एक बार राष्ट्रीय और साम्राज्यीय हितों के बीच बुनियादी विरोध को जान लिया था तब इस बात की आशा करने का कोई मतलब नहीं था कि थोड़ी-सी प्रशासनिक और राजनीतिक छूटों से देश की समस्या हल हो जाएगी, न ही वे संभवतः छोटी-छोटी छूटों को अधिकारियों के समक्ष याचिका प्रस्तुत कर और अंग्रेजों की न्याय तथा उचित व्यवहार की भावना को अपील कर प्राप्त कर सकते थे। वास्तव में नरम कांग्रेसियों की आराम कुर्सी वाले या कि बैंक में बैठे हुए राजनीतिज्ञों के रूप में आलोचना की गई है। शुरू के बीस वर्षों में कांग्रेस के अधिवेशन को एक वार्षिक तमाशा मानकर उसे कोई तरजीह नहीं दी जाती थी क्योंकि इस वार्षिक सम्मेलन में हर बार एक से ही प्रस्ताव पारित किये जाते और साल के बाकी दिनों में उन्हें पूरी तरह भुला दिया जाता।

यह आलोचना वाजिब नहीं है इसमें इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि इन अग्रणी राष्ट्रवादियों को किन परिस्थितियों में कार्य करना होता था। जब उन्होंने साम्राज्यवाद की सच्चाई को समझ लिया था तब भी उन्हें साम्राज्यवाद से अच्छे संबंध बनाये रखने पड़ते थे। उस समय राष्ट्रवाद अपनी प्रारंभिक अवस्था में था और हमारे अग्रणी नेता एक ऐसे संगठन को साकार करने में लगे थे जो कि भारत की जनता की ओर प्रभावकारी ढंग से बोलने का दावा कर सके और यह भी कि अंग्रेज जानबूझकर इस तरीके से शासन करते थे कि जिसमें प्रतिनिधि भारतीयों के समय-समय पर समझौता बातचीत संभव हो, यथार्थतः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के 7 वर्षों के भीतर अंग्रेजों ने कांग्रेस द्वारा माँगी गई कुछ छूटों को दिया भी। निश्चय ही अंग्रेजों ने सदैव सौदेबाजी की और अभी भी वह सम्पूर्ण रूप से नहीं दिया जो कि माँगा गया था इस तरीके से अंग्रेजों ने यह सुनिश्चित किया कि प्रमुख राष्ट्रवादी संघर्षों के दौरान भी जब भी वे ऐसा निश्चित करें, वे समझौता वार्ता शुरू कर सकें और कोई समझौता तय कर सकें। नरम कांग्रेसियों को जिन गंभीर सीमाओं के भीतर कार्य करना पड़ता था उनके लिए यह भरोसा करना स्वाभाविक ही था कि प्रचार चर्चा के माध्यम से वह अपने उद्देश्यों में से कुछ को प्राप्त करने में सफल होंगे। अतः यह विश्वास करना गलत होगा कि दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, बदरुद्दीन तैयबजी और गोपाल कृष्ण गोखले जैसे व्यक्ति अपने देश के कार्यों के लिए किसी तरह कम प्रतिबद्ध थे क्योंकि वे नरम कांग्रेस वाले प्रतीत होते थे।

बारहाल राजनीतिक गतिविधियों की धीमी गति से असंतोष बढ़ रहा था। लोकमान्य गंगाधर तिलक जैसे नेताओं का उदय हुआ जिन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि सेवैधानिक संघर्ष से कही बड़े आन्दोलन की जस्पत है। उनके मतानुसार यह कहा जाना जरूरी था कि पूरे भारतवासी राजनैतिक रूप से जागृतो। भोडे बढ़त आोडी पढ़े-लिखे लोग कुछ अलग नहीं कर सकते थे इस देश के सामान्य पुरुषों और महिलाओं को अपने अधिकारों को मारने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होकर खड़ा होना होगा। अपने आप में भारतीयों को अपने शासको पर भरोसा रखने से कहीं ज्यादा आत्मनिर्भरता की जरूरत थी जनता तक पहुँच कर तिलक ने लोगों को झकझोर देने वाले राष्ट्रीय वाणी में बातचीत की। वे जानते थे कि स्वतंत्रता उनकी पीढ़ी के सामने साकार नहीं हो सकती। परन्तु कुछ ज्यादा तात्कालिक मामलों पर अधिक जोर देने की कोई जरूरत भी नहीं थी। अतः उन्होने अपने देशवासियों से और अपने शासकों से यह कहा कि "स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे मै लेकर रहूँगा" वे जानते थे कि अंग्रेजो के विरुद्ध संघर्ष बहुत लम्बा होगा। इस स्थिति में सबसे अच्छी रणनीति अंग्रेजो के विरुद्ध अनिवारक प्रतिरोध आयोजित करना और अंग्रेज जो भी छूट दे उन्हें स्वीकार करना तथा संघर्ष जारी रखना होगी।

निश्चय ही आम स्त्री और पुरुषों को अपील कर स्वतंत्रता संग्राम आधार को विस्तृत करने की कोशिश में तिलक अकेले नहीं थे। उदाहरण के लिए लगभग इसी समय अरविंद घोष ने अनिवारक प्रतिरोध के संदेश का प्रचार करना शुरू किया था और विपिन चन्द्र पाल तथा लाला लाजपत राय जैसे नेताओं ने भी ऐसा ही किया। अब राष्ट्रवाद एक किस्म का धर्म बनना शुरू हो गया और सांस्कृतिक चिह्नों का इस्तेमाल शुरू किया जाने लगा। भारत जब सिर्फ एक देश नहीं रह गया वह माता बन गयीः भारत माता। वन्देमातरम ने एक राष्ट्रवादी मंच का सम्मान प्राप्त करना शुरू कर दिया। राष्ट्रवाद के संदेश को लोकप्रिय बनाने के लिए तिलक ने गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव आयोजित करना शुरू कर दिया। गरम-दल वादी कहे जाने वाले लोग भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरम पंथी नेतृत्व से संतुष्ट नहीं हो सकते थे। अरविंद जैसे कुछ लोग बाहर आकर हिंसात्मक क्रांति के क्रांतिकारी अतिवादिता के रास्ते पर चलने की कोशिश करने लगे जिससे कि अंग्रेज शासन का खात्मा किया जा सके, परन्तु उनसे कहीं ज्यादा लोग कांग्रेस में बने रहे और उन्होंने नरम पंथी नेतृत्व को चुनौती देना शुरू कर दिया। गरम-दल वादियों को उस समय मौका मिला जबकि कर्जन ने (1905 में) बंगाल प्रांत का विभाजन किया। इस विभाजन के द्वारा बंगाल के पूर्वी जिले निकाल कर पूर्वी बंगाल को नया प्रांत बनाया गया। पश्चिमी बंगाल की अधिसंख्य आबादी मुसलमानों की थी।

अतः विभाजन की इस कार्यवाही को बंगाली मुसलमानों को बंगाली हिन्दुओं से इस उद्देश्य से अलग करने की कार्यवाही करने के रूप में देखा गया कि जिससे भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की बढ़ती हुई शक्ति को कमजोर किया जा सके। शायद इस देश में बंगाल राजनीतिक रूप से सबसे अधिक आगे बढ़ा हुआ क्षेत्र था। यदि राष्ट्रीय आन्दोलन को यहाँ पर कमजोर कर दिया जाए तो उसका देश के अन्य भागों में भी प्रभाव पड़ेगा। फलस्वरूप इस विभाजन के खिलाफ विरोध की बाढ़ आ गई राष्ट्रवादी राजनीति धधक उठी।


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