उप्र में किसके होंगे विप्र ? UP के सत्ता के किनारे ब्राम्हणों के सहारे.. अतुल विनोद पाठक 

उप्र में किसके होंगे विप्र ? UP के सत्ता के किनारे ब्राम्हणों के सहारे.. अतुल विनोद पाठक 
Atul Vinod Pathak atulyamउत्तर प्रदेश में दलित वोटों के साथ ब्राह्मण वोटों को साधने वाली पार्टी सत्ता के सिंहासन पर पहुंच सकती है| यही वजह है कि समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी तीनों ही विप्र वोटर्स पर डोरे डालने के लिए सियासी रणनीति बनाने में जुटी हैं|  


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क्या ब्राह्मणों को साथ लेकर बहुजन समाज पार्टी कर पाएगी बीजेपी से मुकाबला? बीएसपी ने एक बार फिर सोशल इंजीनियरिंग का कार्ड खेला है| बहुजन समाज पार्टी को उम्मीद है कि सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला एक बार फिर कारगर होगा और वह पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बनाएगी|

2007 में भी बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग का जादुई कार्ड खेला था| इसे जादुई कार्ड इसलिए कहा गया क्योंकि यह कार्ड चल गया और बहुजन समाज  पार्टी ने अप्रत्याशित रूप से उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत हासिल किया और अपनी सरकार बनाई| यह फार्मूला इतना हिट हुआ कि सालों तक इसकी चर्चा पूरे देश में चलती रही|

हालांकि अपनी पहली सरकार के विवादित कार्यकाल के कारण मायावती को दोबारा सत्ता नहीं मिल सकी| 14 साल बाद मायावती को सोशल इंजीनियरिंग की याद आई है और वह 2022 के विधानसभा चुनाव में पुराने फार्मूले को आजमाने के मूड में दिखाई देती है| चुनाव अभियान की शुरुआत में मायावती ब्राह्मण सम्मेलन कर रही हैं| इधर SP की तरफ से परशुराम प्रतिमा लगाई जा रही है| सतीश चंद्र मिश्र एक बार फिर बसपा के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के सूत्रधार होंगे| सतीश चंद्र मिश्र ही वो शख्स है जिसने मायावती को यह फार्मूला दिया था| खास बात यह है कि ब्राह्मण सम्मेलन की शुरुआत अयोध्या से हो रही है|



यहां श्री राम का भव्य मंदिर निर्माण का कार्य चल रहा है उत्तर प्रदेश के लोगों की आस्था का केंद्र अयोध्या और यहां से ब्राह्मण सम्मेलन की शुरुआत बहुजन समाज पार्टी के लिए कितनी फायदेमंद साबित होगी इस पर सब की नजर रहेगी|

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बहुजन समाज पार्टी जब सोशल इंजीनियरिंग की बात करती है तो उसमें हिंदू समाज के सभी वर्गों को जोड़ना जरूरी हो जाता है खास तौर पर उच्च वर्ग और उच्च मध्यमवर्गीय लोगों के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम बहुत मायने रखते हैं| बसपा को यहीं से प्रभु श्रीराम का आशीर्वाद मिलने की उम्मीद है उसे लगता है कि यहां से निकला अश्वमेध का घोड़ा उसे विजय रथ पर विराजित कर देगा|

उत्तर प्रदेश में सोशल इंजीनियरिंग का यह फार्मूला दूसरी राजनीतिक पार्टियों के लिए भी फायदे का सौदा साबित हुआ है| जिस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में जितनी अधिक सीटों पर ब्राह्मण कैंडिडेट को टिकट दिया उसे अच्छी संख्या में सीटें भी हासिल हुई| 2007 में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने वाली बसपा ने 41 ब्राह्मण कैंडिडेट जीते थे| भारतीय जनता पार्टी ने 2017 उतारे गए 56 में से जीते  46 ब्राह्मण विधायकों के साथ बहुमत हासिल करने में कामयाबी हासिल की|

ब्राह्मण विधायकों की बढ़ी हुई संख्या ही उत्तर प्रदेश में सरकार बनने का बड़ा कारक बनती नजर आई है| आजादी के बाद से 1989 तक उत्तर प्रदेश में 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने| इसके बाद उत्तर प्रदेश की सियासत दलित मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग पर केंद्रित हो गई|

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अब समाजवादी पार्टी ने भी ब्राह्मण मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की है| परशुराम की मूर्तियों की स्थापना के प्रयास के जरिए को ब्राह्मण मतदाताओं को रिझाने की कोशिश कर रही है| हालांकि समाजवादी पार्टी ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ने में बहुत ज्यादा सफल होती दिखाई नहीं देती है|

कांग्रेस भी ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कोशिश करती हुई दिखाई दी लेकिन कांग्रेस के जिस नेता जितिन प्रसाद ने “ब्राह्मण चेतना मंच” नाम की संस्था बनाई वह खुद बीजेपी में शामिल हो गए हैं| दरअसल विपक्षी दलों की कोशिश रही है कि वह प्रदेश में यह माहौल बनाने में कामयाब हो जाए कि ब्राह्मण मतदाताओं का बीजेपी सरकार ने सिर्फ और सिर्फ उपयोग ही किया है बदले में ब्राह्मणों को कुछ भी नहीं दिया|

ब्राह्मणों को बीजेपी से नाराज बताने की कोशिशें भी की गई है| बहुजन समाज पार्टी ब्राह्मणों के लिए बीजेपी के बाद दूसरा बड़ा विकल्प है| इसके पीछे सतीश मिश्रा की लंबे समय की कोशिशें हैं| 1990 के बाद से उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति जनजाति पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम सियासत के केंद्र में रहे हैं, ब्राह्मण हमेशा कोसे जाते रहे हैं| 

ब्राह्मणों को पानी पी पीकर कोसने से राजनीतिक दलों की रोटियां सिकती रही हैं| हालांकि बहुजन समाज पार्टी ने ब्राह्मणों को मुख्यधारा में लाने की कोशिश सोशल इंजीनियरिंग के जरिए की| तभी से राजनीतिक दलों को ब्राह्मणों की सुध आई| मायावती ने समाज के दो छोर ब्राह्मण और दलित को जोड़ने की कोशिश की| लेकिन यह कोशिश एक सरकार बनाने तक ही फायदेमंद साबित हो सकी| अब बहुजन समाज पार्टी की कोशिश यह मैसेज देने में कामयाब हो जाने की है कि योगी सरकार में ब्राह्मणों को निशाना बनाया जा रहा है|

अब आपको बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की क्या हैसियत है? उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी करीब 12 फ़ीसदी है| कुछ सीटें ऐसी हैं जहां पर इनकी तादाद 20% से ज्यादा है| यह वही सीटें हैं जहां पर ब्राह्मण मतदाता उम्मीदवार की जीत और हार का फैसला करता है|

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यदि बहुजन समाज पार्टी ब्राह्मणों को थोड़ा बहुत भी अपने पक्ष में करने में कामयाब होती है तो यह बीजेपी के लिए बड़ा घाटा साबित हो सकता है| समाजवादी पार्टी के पास ब्राह्मण वोटर्स को खींचने का कोई  ठोस फार्मूला दिखाई नहीं देता|


सर्वे रिपोर्ट कहती है कि उत्तर प्रदेश में 2017 के चुनाव में ब्राह्मण मतदाताओं ने भारतीय जनता पार्टी का समर्थन किया था| इस वर्ग ने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का ही समर्थन किया| हालांकि अभी भी ऐसे हालात नहीं बने हैं कि ब्राह्मण पूरी तरह से बीजेपी में उपेक्षित महसूस कर रहे हो| हाल के पंचायत चुनाव में ब्राह्मण कैंडिडेट को कम तवज्जो देना बीजेपी के लिए जरूर चिंता का सबब बन सकता है|

बीजेपी की कोशिश ब्राह्मण मतदाताओं को साधने और डैमेज कंट्रोल की है| ब्राह्मण एक ऐसा मतदाता है जिसके पास अपनी सोच और आधार होता है| ब्राह्मणों की नाराजगी बीजेपी को भारी पड़ सकती है यदि समय रहते बीजेपी ब्राह्मण मतदाताओं को साध लेती है तो उत्तर प्रदेश में बड़े नुकसान से बचा जा सकता है|

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