गुरु की आवश्यकता क्यों है, क्या बिना गुरु के जीवन नहीं चल सकता.. दिनेश मालवीय


गुरु की आवश्यकता क्यों है , 

क्या बिना गुरु के जीवन नहीं चल सकता , dinesh

गुरु बहुत सोचकर बनायें , 

अच्छा शिष्य बनने मे कसर न रखें , 

आज हम एक बहुत महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करने के लिये उपस्थित हैं। अवसर गुरुपूर्णिमा का है। इस दिन इस विषय पर आज के संदर्भ मे चर्चा करना सर्वथा ज़रूरी है। हम अनेक लोगों को यह कहते सुनते हैं कि जीवन मे गुरु की कोई आवश्यकता नहीं है। अनेक लोग इस बात को बहुत गर्व से कहते हैं कि हमने किसी को गुरु नहीं बनाया। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि ईश्वर और मनुष्य के बीच किसी माध्यम की ज़रूरत नहीं है। ऐसे भी लोग हैं जो यह कहते नहीं थकते कि सब साधु संत पाखंडी हैं। 










बड़ी संख्या मे ऐसे भी लोग हैं, जो दूसरों की नकल करके या कौतुहलवश या फिर परम्परा निभाने के लिए गुरु बना लेते हैं। लेकिन न तो गुरु के बताये मार्ग पर चलते हैं, और न उन्हें जीवन मे वांछित महत्व देते। ऐसे सभी लोग न तो  गुरुतत्व को जानते और न जीवन की सार्थकता मे गुरु के महत्व को। भारत की धर्म-अध्यात्म परम्परा मे जीवन मे गुरुदीक्षा लेना अनिवार्य माना गया है। 

किसी को "निगुरा" कहना अपमानजनक गाली से कम नहीं माना जाता। इस शब्द का अर्थ होता है ऐसा व्यक्ति, जिसका कोई गुरु न हो। ऐसे व्यक्ति पर विश्वास नहीं किया जाता था। पुराने समय मे माता पिता ही अपने बच्चों को कम उम्र मे ही किसी संत या सदाचारी व्यक्ति से गुरुमंत्र दिलवा देते थे। आज भी इसका काफी प्रचलन है। इसे कान फुंकवाना कहते थे।


गुरुभाई अपनी गुरुबहनों और गुरुभाइयों को जीवनभर सगे की तरह मानते थे। गुरु बहनें सगी बहनों से अधिक मान और स्नेह पाती थीं। इस संबंध को बहुत ही पवित्रता से निभाया जाता था। यह सब पूरी तरह समाप्त नहीं हो गया है। यह हमारी मूल संस्कृति का अंग है और कमोवेश हमेशा क़ायम रहेगा। 



कान फुंकवाना जीवन की बहुत महत्वपूर्ण बात होती थी। कान मे दिये गये मंत्र को व्यक्ति आजीवन परम पवित्र मानकर उसका जप करता था। यह मंत्र हर संकट की घड़ी मे उनका सबसे बड़ा संबल होता है। 


लेकिन चित्त की थोड़ी उन्नत अवस्था प्राप्त हो जाने पर किसी ऐसे संत या योगी से दीक्षा की ज़रूरत होती है, जिसकी चेतना का पर्याप्त उत्थान हो चुका हो। यह दीक्षा अनेक तरह से दी जाती है, जिनमें शक्तिपात बहुत प्रभावी होता है। इसमे गुरु अपनी उन्नत चेतना को शिष्य की चेतना से जोड़कर उसकी आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग खोल देता है। 



हमारे अवतारों तक ने लोक आदर्श के लिये गुरुदीक्षा प्राप्त की। श्रीराम के गुरु महर्षि विश्वामित्र और श्रीकृष्ण कृष्ण के गुरु महर्षि सांदीपनी थे। सभी संतों ने जीवन मे गुरु को सबसे ऊंचा स्थान दिया है। 
जीवन मे लौकिक शिक्षा और हुनर सीखने तक के लिये गुरु की आवश्यकता होती है, तो फिर धर्म और मोक्ष जैसी परम उपलब्धि के लिये तो सद्गुरु की आवश्यकता अनिवार्य होना ही है।


सच्चे गुरु की पहचान :

 

आज इस घोर कलियुग मे सच्चे संत या गुरु का मिल पाना कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं। आज हर जगह पाखंड और पाखंडियों का बोलबाला है। श्रीरामचरितमानस सहित अनेक शास्त्रों मे सच्चे और झूठे साधु मे भेद समझने के लिये स्पष्ट मार्गदर्शन दिया गया है। कहावत है कि "पानी पियो छान के, गुरु बनाओ जान के"। सामान्य व्यक्ति मे संतों की पहचान करने की योग्यता नहीं होती। 

यही कारण है कि वे अक्सर ग़लत लोगों के चंगुल मे आ जाते हैं। यदि आपकी प्यास और भाव सच्चे हैं तो सच्चे गुरु मिल ही जाएंगे। इस विषय पर शास्त्रों के कथनों का पालन करने से हम नकली गुरुओं के चंगुल मे आने के ख़तरे से बच सकते हैं। सच्चे संत या गुरु की पहचान के लिये दिया गया मार्गदर्शन बिन्दुवार इस तरह है-

1- सच्चा संत कभी अपनी दिव्यता का कोई दावा नहीं करता।
2- अपनी सिद्धियों का अनावश्यक प्रदर्शन नहीं करता।
3- अपने नाम के साथ महिमामंडित करने वाले विशेषण नहीं लगाता और न किसी को लगाने देता।


4- वह स्वयं को भगवान या दिव्यपुरुष आदि नहीं कहता।
5- अपने प्रचार मे उसकी कोई रुचि नहीं होती।
6- अधिकतर गुप्त रूप से साधारण व्यक्ति जैसा रहता है।
7- किसी से धन सहित किसी भी चीज़ की अपेक्षा नहीं करता।
8- अपने आचरण मे लौकिक समाज की अवहेलना नहीं करता।
9- उनके पास बैठकर शांति का अनुभव होता है।



ये कुछ सामान्य बातें हैं जिनके आधार पर सच्चे संत या गुरु की पहचान कर उनसे दीक्षा ली जा सकती है। 



यदि आपने जीवन मे गुरुदीक्षा नहीं ली है, तो अवश्य ले लीजिए आपके जीवन मे निरंतर सकारात्मक बदलाव आएंगे और जीवन सार्थ हो सकेगा। याद रखिये, गुरु बिना गति और सद्गति नहीं। गुरु जो साधना बताएँ उसका पूरी निष्ठा से अभ्यास करें।


 

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