यम,रावण को जला ही डालते .! रावण की त्रैलोक्य विजय – 47

यम,रावण को जला ही डालते .!
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रावण की त्रैलोक्य विजय – 47
आज की तरह पूर्वकाल में भी भयानक और घातक बम होते थे। ब्रह्मा जी के पास भी ऐसे बमों की कमी नहीं थी। वे अक्सर उनकी शरण में आने वाले लोगों की भरपूर मदद करते रहते थे। उन्होंने ही कुबेर को पुष्पक विमान दिया था।


ब्रह्मास्त्र भी उन्हीं का अस्त्र था। उनके शस्त्रागार का सर्वाधिक घातक एक देवास्त्र था -कालदंड, जो उन्होंने कभी प्रसन्न होकर यम को प्रदान किया था। अब जब रावण यमलोक में स्वयं चलकर आक्रमण करने आ ही गया तो क्रोधित यमराज को कालदंड तक निकाल लेना पडा़।रावण और यमराज की सेना के इस भीषण युद्ध की कल से आगे की कथा हम आज यहीं से प्रारंभ करते हैं।

रावण तो विकट योद्धा था ही। उसके राक्षस नानाओं ने शैशवकाल से ही उसको हिंसा, प्रतिशोध, हत्या और यज्ञ विध्वंस आदि क्रूर कर्मों में लगा कर न्याय,अत्याचार का प्रतीक बना दिया था। वह अपने समय का स्त्री लंपट भी था। रावण प्रतिशोध के कारण ही अपने बडे़ भाई कुबेर के विरुद्ध हुआ। कुबेर की लंका पर अधिकार किया। यही नहीं यमपुरी आने के कुछ समय पूर्व ही वह अलकापुरी (हिमालय)को नेहनाबूस्त करता हुआ देवलोक विजय को निकला है ।अपने भाई कुबेर को अधमरा छोड़कर उनकेे रक्त से स्नान करता और उन्हीं के पुष्पक विमान को छीनकर रावण यम की भूमि पर उतरा। नारद की सूचना के कारण यहां तत्काल ही सही किंतु सतर्क हुई यम सेना ने रावण का मुंह खट्टा कर दिया। रावण चौकडी़ भूल गया।


इधर जब यमराज को यह पता चला कि रावण ने अपनी शक्ति को पुनर्संगठित कर पुनः जोरदार आक्रमण बोल दिया है। रावण के बाण आग उगल रहे हैं। आक्रमण तीव्र है। शत्रु प्रबल है। और अत्याधुनिक आयुधों के प्रयोग से संपूर्ण यमलोक में कोलाहल है।रावण विजय की दिशा में बढ़ रहा है। उनके माथे पर बल पड़ गए।यमराज की आंखें लाल हो गईं । यम ने कहा -"मेरे योद्घा मारे गए."..? थोडी़ देर कुछ विचार किया ।और फिर...! अपने सारथी को आदेश दिया -मेरा रथ लेकर आओ। तब उनके सारथी ने उनका दिव्य रथ उपस्थित कर दिया। यमराज, उस रथ में बैठे। उनके रथ में जो प्राणघातक अस्त्र थे वे वास्तव में सामूहिक नरसंहार की क्षमता रखते थे। मृत्यु देवता स्वयं तो थे ही। परन्तु, कालदंड और कालप्राश जैसे विध्वंसक, ज्वलनशील देवास्त्र भी थे। यमराज का प्रसिद्ध मुद्गर रथ के मध्य शस्त्रागार में विशेष रुप से सुसज्जित हो रहा था।संभवतः मृत्यु किसी पदनाम धारी सेनानायक का नाम हो ।क्योंकि आगे उल्लेख मिलता है कि रावण ने भयंकर बाण मारकर मृत्युदेव को घायल किया।

फिलहाल जब यम अपने रथ पर सवार होकर युद्ध के लिए निकले -

'कालदंडस्तु पार्शवस्थो मूर्तमानस्य चाभवत।
यमप्रहरणं दिव्यं तेजसा ज्वलदग्निवत्।।'
रथ के पिछले हिस्से में यम का दिव्य आयुध कालदंड मूर्तिमान खडा़ था।
'तस्य पार्शवेषु निश्छिद्राः कालपाशाः प्रतिष्ठिताः

कालदंड की दोनों ओर छिद्ररहित कालपाश खडे़ थे। 'मूरतश्च मुद्गरः ' अग्नि के समान मुद्गर भी मूर्तिमान होकर उपस्थित था।मृत्युदेवता के साथ विकराल रथ में यमराज को युद्ध क्षेत्र में आया देख रावण के सचिव गण तो भाग ही गये। फिर जो शेष बचे थे, वे तो और भी अधिक भयभीत हो गये।स्वयं को असहाय और असुरक्षित मान, होशो हवास खो कर, यह कहते हुए कि हम तो युद्ध करने में सक्षम ही नहीं हैं, भागने लगे।

परन्तु रावण के दुस्साहस और त्रैलोक्य विजय की आकांक्षा ने उसको और अधिक प्रोत्साहित किया। कहते हैं कि यमराज का रथ संसार को भयभीत करने वाला था। किंतु फिर भी रावण भयभीत नहीं हुआ। उसको कोई क्षोभ भी नहीं था। इधर यमराज तो क्रोध में निकले ही थे। रावण को देखकर और भी उग्र हो गये। उन्होंने तत्काल रावण को लक्ष्य किया। शक्ति और तोमरों का प्रहार कर रावण के मर्मस्थलों को छेद डाला। किंतु रणबांकुरा और युद्ध, जिसकी नियति ही हो, ऐसा रावण, कहां रुकने वाला था।

रावण भी कई गुणा अधिक शक्ति से यम और उनकी सेना पर टूट पड़ा। अब दो महान योद्धा यमराज और रावण एक दूसरे के आमने सामने थे। उनके अत्याधुनिक आयुध एक दूसरे की सेना को व्यथित और व्याकुल कर रहे थे।मानों आयुधों की वर्षा ही हो रही हो। चारों ओर कोलाहल और चीत्कार। कहीं घायलों के अंबार। कहीं शवों के पर्वतों जैसे ढे़र। इस महासंग्राम का अंत नहीं था। कोई भी योद्धा अब पीछे हटने को तैयार नहीं था। मानों मृत्यु दोनों ओर के सैनिक वीरों को अपने आगोश में समेटने को आतुर थी। योद्घा भी प्राणोत्सर्ग को व्याकुल थे।

लेखक भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार व धर्मविद हैं |


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