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सद्गुरु जग्गी वासुदेव के ध्यानलिंग मन्दिर में ऐसा क्या है ख़ास ? भोपाल में भी है इसी तरह का ध्यान लिंग

ईशा योग केंद्र, दक्षिण भारत के कोयंबटूर नगर से चालीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित, वेल्लनगिरि पर्वतों की तलहटी में स्थित है। यह केंद्र ब्रह्मचारियों के सक्रिय अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, स्वयंसेवकों तथा आगंतुकों का आवास स्थान है। सद्गुरु द्वारा एक शक्तिशाली स्थान के रूप में प्रतिष्ठित इस केंद्र (आंतरिक विकास केंद्र), का अनूठापन ये है कि यहाँ योग के चारों पथ – ज्ञान, कर्म, क्रिया व भक्ति-भेंट किए जाते हैं। प्रति सप्ताह, हज़ारों लोग, केंद्र में आंतरिक शांति व कल्याण की खोज के लिए आते हैं।आंतरिक विकास के लिए बनाया गया यह शक्तिशाली स्थान योग के चार मुख्य मार्ग – ज्ञान, कर्म, क्रिया और भक्ति को लोगों तक पहुंचाने के प्रति समर्पित है। इसके परिसर में ध्यानलिंग योग मंदिर की प्राण प्रतिष्‍ठा की गई है।

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1999 में सद्गुरु द्वारा प्रतिष्ठित ध्‍यान लिंग अपनी तरह का पहला लिंग बताया जाता है जिसकी प्रतिष्ठता पूरी हुई है। योग विज्ञान का सार ध्यानलिंग, ऊर्जा का एक शाश्वत और अनूठा आकार है। १३ फीट ९ इंच की ऊँचाई वाला यह ध्यानलिंग विश्व का सबसे बड़ा पारा-आधारित जीवित लिंग है। यह किसी खास संप्रदाय या मत से संबंध नहीं रखता, ना ही यहाँ पर किसी विधि-विधान, प्रार्थना या पूजा की जरूरत होती है। जो लोग ध्यान के अनुभव से वंचित रहे हैं, वे भी ध्यानलिंग मंदिर में सिर्फ कुछ मिनट तक मौन बैठकर घ्यान की गहरी अवस्था का अनुभव कर सकते हैं। इसके प्रवेश द्वार पर सर्व-धर्म स्तंभ है, जिसमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाई, जैन, बौध, सिक्‍ख, ताओ, पारसी, यहूदी और शिन्तो धर्म के प्रतीक अंकित हैं, यह धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर पूरी मानवता को आमंत्रित करता है।

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लगभग 1000 साल पहले मध्यप्रदेश के भोजपुर नामक स्थान में इस तरह का ध्यानलिंग बनाने का सबसे नजदीकी प्रयास किया गया लेकिन यह प्रक्रिया उस वक्त पूरी नहीं की जा सकी थी ,  हालांकि अब से लगभग 20 साल पहले भारतीय पुरातत्व संरक्षण विभाग ने इस प्रक्रिया को पूरा किया और मंदिर निर्माण पूर्णता को प्राप्त हुआ ,भोजपुर का ध्यान लिंग अपने आप में अनूठा और सबसे पहला ध्यान लिंग है, जो 6 चक्रों पर आधारित है

भोजपुर के ध्यान लिंग में नीचे 6 पत्थर है जो 6 चक्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं और सबसे ऊपर भगवान शिव है |  यह ध्यान लिंग तीन प्रमुख  ग्रंथि ब्रह्मा विष्णु महेश का प्रतिनिधित्व करता है साथ ही 6 चक्रों का बेस और सातवें चक्र यानी  सहस्रार पर भगवान शिव स्वयं विराजमान है | 

एक रहस्यमय और अद्भुत निर्माण है मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 32 किलोमीटर दूर भोजपुर (रायसेन जिला) में…
यह या भोजेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हैं। इस प्राचीन शिव मंदिर का निर्माण परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज (1010 ई-1055 ई) द्वारा किया गया था। मंदिर 115 फीट (35 मी॰) लंबे, 82 फीट (25 मी॰) चौड़े तथा 13 फीट (4 मी॰) ऊंचे चबूतरे पर खड़ा है।
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है यहां का विशाल शिवलिंग, अपने-आप में अनूठे और विशाल आकार वाले इस शिवलिंग के कारण भोजेश्वर मंदिर को उत्तर भारत का सोमनाथ भी कहा जाता है।  यह विश्व का सबसे बड़ा प्राचीन शिवलिंग माना जाता है।
आधार सहित शिवलिंग की कुल ऊंचाई 40 फीट (12 मी॰) से अधिक है। शिवलिंग की लंबाई इसकी ऊंचाई 7.5 फीट (2.3 मी॰) तथा व्यास 5.8 फीट (2 मी॰) है। यह शिवलिंग एक 21.5 फीट (6.6 मी॰) चौड़े वर्गाकार आधार (जलहरी) पर स्थापित है। मंदिर से प्रवेश के लिए पश्चिम दिशा में सीढ़ियां हैं। गर्भगृह के दरवाजों के दोनों ओर नदी देवी गंगा और यमुना की मूर्तियां लगी हुई हैं।
इसके साथ ही गर्भगृह के विशाल शीर्ष स्तंभ पर भगवानों के जोड़े – शिव-पार्वती, ब्रह्मा-सरस्वती, राम-सीता एवं विष्णु-लक्ष्मी की मूर्तियां स्थापित हैं। सामने की दीवार के अलावा बाकी सभी तीन दीवारों में कोई प्रतिमा स्थापित नहीं हैं। मंदिर के बाहरी दीवार पर यक्षों की मूर्तियां भी स्थापित हैं।
इस मंदिर को देखते ही समझ आता है कि यह सिर्फ एक मंदिर ही नहीं, अपने विशाल आकार के अलावा भी इस मंदिर की कई विशेषताएं हैं।
इसका विशाल प्रवेशद्वार का आकार-प्रकार वर्तमान में भारत के किसी भी मंदिर के प्रवेशद्वारों में सर्वाधिक विशाल है। इसके अंदर स्थापित शिवलिंग को देख, प्रवेशद्वार का यह आकार प्रासंगिक लगता है। इस मंदिर की एक अन्य विशेषता इसके 40 फीट ऊंचाई वाले इसके चार स्तम्भ हैं। गर्भगृह की अधूरी बनी छत इन्हीं चार स्तंभों पर टिकी है।
साथ ही भोजेश्वर मंदिर की छत गुम्बदाकार हैं। कुछ विद्धान इसे भारत की प्रथम गुम्बदीय छत वाली इमारत मानते हैं। और यह एक सशक्त प्रमाण है कि भारत में गुम्बद निर्माण का प्रचलन इस्लाम के आगमन के पहले भी था। इस मंदिर का निर्माण भारत में इस्लाम के आगमन के पहले हुआ था अतः इस मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनी अधूरी गुम्बदाकार छत भारत में गुम्बद या शिखर निर्माण के प्रचलन का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

प्राचीन स्थापत्य व वास्तुकला का महाविद्यालय: भोजेश्वर मंदिर के विस्तृत चबूतरे पर ही मंदिर के अन्य हिस्सों, मंडप, महामंडप तथा अंतराल बनाने की योजना थी। ऐसा मंदिर के निकट के पत्थरों पर बने मंदिर- योजना से संबद्ध नक्शों से पता चलता है। इस जगह की एक अद्भुत विशेषता यह भी है कि भोजेश्वर मंदिर के भूविन्यास, स्तंभ, शिखर, कलश व अन्य रेखांकन चट्टानों की सतह पर आशुलेख की तरह उत्कीर्ण किए हुए हैं।

आस-पास नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि भोजेश्वर मंदिर के विस्तृत चबूतरे पर ही मंदिर के अन्य हिस्सों, मंडप, महामंडप तथा अंतराल बनाने की अद्भुत योजना थी। मन्दिर निर्माण की स्थापत्य योजना के नक्शे व अन्य विवरण निकटस्थ पत्थरों पर उकेरा गया है। जिनसे मंदिर- योजना से संबद्ध नक्शों को स्पष्ट देखा जा सकता है। इतने स्पष्ट नक्शे और योजना को देख प्रतीत होता है कि यह निर्माण स्थल समकालीन शिल्पज्ञों, वास्तुकारों और अभियांत्रिकों के लिए एक महा-विद्यालय जैसा था।

यहां एक वृहत मन्दिर परिसर बनाने की योजना थी, जिसमें ढेरों अन्य मन्दिर भी बनाये जाने थे। वास्तुविद मानते हैं कि यदि यह योजना सफलतापूर्वक सम्पन्न होती तो यह मन्दिर परिसर भारत के सबसे बड़े मन्दिर परिसरों में से एक होता।
इस मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है और आश्चर्य भी होता है कि आखिर इतने भारी पत्थर, इतनी ऊंचाई पर कैसे पहुंचाए गए होंगे? परंतु मंदिर के ठीक पीछे के भाग में एक ढलान बना है, जिसका उपयोग निर्माणाधीन मंदिर के समय विशाल पत्थरों को ढोने के लिए किया गया था।
यहां उल्लेखनीय है कि पूरे विश्व में कहीं भी निर्माण हेतु सामग्री को संरचना के ऊपर तक पहुंचाने के लिए ऐसी प्राचीन भव्य निर्माण तकनीक अब दिखाई नहीं देती। भोजेश्वर मंदिर में इसे प्रत्यक्ष प्रमाण के तौर पर देखा जा सकता है कि आखिर कैसे 70 टन भार वाले विशाल पत्थरों को मंदिर के शीर्ष तक पहुंचाया गया।
प्राचीन विज्ञान का नमूना: प्राचीन भारतीय शिल्प और स्थापत्य कला के निर्माण की तकनीक अवश्य भिन्न थी। उल्लेखनीय है कि परमार वंश के प्रतापी राजा भोज ने इस विशाल मंदिर का निर्माण अपने विख्यात ग्रंथ समराङ्गणसूत्रधार के आधार पर करवाया था। समरांगणसूत्रधार भारतीय वास्तुशास्त्र से सम्बन्धित ग्रन्थ है।
इस ग्रन्थ में 83 अध्याय हैं जिनमें नगर-योजना, भवन शिल्प, मंदिर शिल्प, मूर्तिकला तथा मुद्राओं सहित यंत्र। यंत्रों के बारे में (अध्याय 31, जिसका नाम ‘यन्त्रविधान’ है) वर्णन है जिसमें भारी वस्तुओं को ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए आधुनिक हाइड्रोलिक्स सिद्धांत का भी विस्तार से वर्णन किया गया है।
अधूरे मंदिर का अबूझा रहस्य: परंतु यह अद्भुत मंदिर अपने आप में एक अबूझा, अनसुलझा रहस्य समेटे है।
भोजेश्वर मंदिर का निर्माण अधूरा हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि निर्माण कार्य एकदम से ही रोक दिया गया होगा। इसका निर्माण अधूरा क्यों रखा गया इस बात का इतिहास में कोई पुख्ता प्रमाण तो नहीं है पर जनश्रुति है कि इस मंदिर का निर्माण एक ही रात में होना था, परन्तु छत का काम पूरा होने के पहले ही सुबह हो गई, इसलिए निर्माण अधूरा रह गया।
हालांकि इसके कारण अभी तक अज्ञात ही हैं किन्तु इतिहास वेत्ताओं का अनुमान है कि ऐसा किसी प्राकृतिक आपदा, संसाधनों की आपूर्ति में कमी अथवा किसी युद्ध के आरम्भ हो जाने के कारण ही हुआ होगा। शायद राजा भोज के निधन होने से भी इस प्रकार के निर्माण का रुकना तर्कसंगत प्रतीत होता है।
किसी विद्वान का मानना है कि छत संभवतः निर्माण काल में पूरे भार के सही आकलन में गणितीय वास्तु दोष के कारण निर्माण-काल में ही ढह गयी होगी। तब राजा भोज ने इस दोष के कारण इसे पुनर्निर्माण न कर मन्दिर के निर्माण को ही रोक दिया होगा।
भिन्न मत-मतांतर: कई विद्वानों का मानना है कि भोजेश्वर शिवमंदिर एक प्रकार का अंत्येष्टि स्मारक है। इस प्रकार के मन्दिरों को स्वर्गारोहण-प्रासाद कहा जाता था। इस प्रकार के मन्दिरों में एकल शिखर के स्थान पर परस्पर पीछे की ओर घटती हुई पत्थर की सिल्लियों का प्रयोग किया जाता है। उनके अनुमान के अनुसार राजा भोज ने इस मन्दिर को संभवतः अपने स्वर्गवासी पिता सिन्धुराज या ताऊ वाकपति मुंज हेतु बनवाया होगा।
क्या कहती है किवदंतियां: इस मंदिर के निर्माण के बारे में दो कथाएं प्रचलित हैं। पहली जनकथा के अनुसार वनवास के समय इस शिव मंदिर को पांडवों ने बनवाया था। भीम घुटनों के बल पर बैठकर इस शिवलिंग पर फूल चढाते थे। इस मंदिर का निर्माण द्वापर युग में पांडवों द्वारा माता कुंती की पूजा के लिए इस शिवलिंग का निर्माण एक ही रात में किया गया था। जैसे ही सुबह हुई तो पांडव लुप्त हो गए और मन्दिर अधूरा ही रह गया।
इसके साथ ही इस मंदिर के पास ही बेतवा नदी है। जहां पर कुंती द्वारा कर्ण को छोड़ने की जनकथाएं भी प्रचलित हैं।
दूसरी मान्यता के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण मध्यभारत के परमार वंशीय राजा भोजदेव द्वारा 11वीं सदी में करवाया गया था। राजा भोजदेव एक अत्यंत प्रतापी और विद्वान राजा थे। उन्हें कला, स्थापत्य और विद्या के महान संरक्षक माना जाता है जिन्होंने 11 से अधिक पुस्तकें भी लिखी थी।
वर्तमान में : यह मन्दिर ऐतिहासिक स्मारक के रूप में भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण के अधीन है। मन्दिर के निकट ही इस मन्दिर को समर्पित एक पुरातत्त्व संग्रहालय भी बना है। शिवरात्रि के अवसर पर राज्य सरकार द्वारा यहां प्रतिवर्ष भोजपुर उत्सव का आयोजन किया जाता है।

 

 

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