सद्गुरु की 6 सबसे चर्चित किताबें और उनका सार

1. चाहो! सब कुछ चाहो

 

अत्यंत लोकप्रिय साप्ताहिक आनंद विकटनमें एक वर्ष-पर्यंत धारावाहिक रूप से निकलकर, फिर पुस्तकाकार प्रकाशित सद्गुरु के वचनामृत अब आपके हाथों में हैं – चाहो! सब कुछ चाहोये हैं जीवन की बाधाओं को जीतकर, वांछित मनोरथ प्राप्त करते हुए संपूर्ण जीवन जीने की राह बताने वाले अनमोल वचन; जीवन में कायाकल्प लाने वाले अमोघ वचन।
2. आत्मज्ञान: आखिर है क्या

 

सद्गुरु उन दुर्लभ लोगों में से एक हैं, जो न केवल उस अनुभव के बाद जीवित रहे और उसका स्पष्ट बयान किया, बल्कि उन्होंने मानवता को एक शाही मार्ग प्रदान किया और उस दिशा में एक मौन क्रांति की शुरुआत की। इस पुस्तक में संकलित सत्संग एक ऐसे विषय के गूढ पहलू को उजागर करते है, जो लोगों की कल्पना को पहले से कहीं अधिक मुग्ध करने लगा है। एक रहस्यदर्शी, युगद्रष्टा, मानवतावादी, सद्गुरु एक अलग किस्म के आध्यात्मिक गुरु हैं।
3 .एक आध्यात्मिक गुरु का अलौकिक ज्ञान

 

लोगों के जीवन में अक्सर एक पल आता है जब पूर्ण विराम गायब हो जाते हैं। प्रश्न चिह्न उठ खडे होते हैं। विराम-चिह्नों का सिलसिला शुरू होता है। अँगडाई लेते हुए अंतहीन, अथाह विराम चिह्न…। यही वह वक्त होता है जब एक व्यक्ति एक जिज्ञासु बन जाता है। यह पुस्तक जिज्ञासुओं के लिए, अन्वेषकों के लिए है। यह विकल, व्यग्र और विवह्ल कर देने वाले प्रश्नों के सरगम का एक संकलन है, जो हरेक जिज्ञासु के मन में कभी न कभी जरूर उठते हैं। प्रश्न अनेक विषय वस्तुओं से संबंधित हैं – भय, कामना, कष्ट और पीडा, निष्ठा, स्वतंत्र इच्छा शक्ति, नियतिवाद, ईश्वर, विश्वास, प्रेम, नैतिकता, आत्म-वंचना, असमंजस, कर्म, आध्यात्मिक-मार्ग, मन, शरीर, रोग, आरोग्यता, पागलपन, मृत्यु, विसर्जन। प्रश्न और भी हैं।
4. मृत्यु एक कल्पना है

अपने शरीर से परे प्राणी का आगे बढना, इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह संसार में क्या था, और वह अपने बारे में क्या सोचता था या सब लोग उसके बारे में क्या सोचते थे। यह सिर्फ इस पर निर्भर करता है कि वह कितना जागरूक है, उसने अपने अंदर इस भौतिक शरीर के परे कितना कुछ पैदा किया है
5. सृष्टि से सृष्टा तक

पुस्तक के प्रथम खंड में सृष्टि के द्वैत की चर्चा की गई है, जिसकी जटिलताओं और विविधताओं में उलझा हुआ मनुष्य बुरी तरह से घायल हो चुका है। द्वैत ही उसके जीवन में रंग भरता है, जीवन के समस्त खेल, सौन्दर्य और खुशी का कारण द्वैत ही है। लेकिन इसके लिए उसे एक बहुत भारी कीमत चुकानी पडी है, द्वैत के कारण ही वह सभी तरह के दुःख, कष्ट और मुश्किलों में फँसा हुआ है। सद्गुरु इससे निकलने की उक्ति बताते हैंः अगर तुम उस आयाम में स्थापित हो जो सृष्टि का उद्गम है; अगर तुम्हारा एक हिस्सा सृष्टा और दूसरा हिस्सा सृष्टि है, फिर तुम सृष्टि के साथ जैसे चाहो वैसे खेल सकते हो, लेकिन यह तुम्हारे ऊपर कोई भी निशान नहीं छोडेगी।दूसरे खंड में सद्गुरु महत्वपूर्ण चेतावनी भी देते हैं: जब इंसान एक खास स्तर की सिद्धि प्राप्त कर लेता है, तो उसके अंदर करुणामय होने की प्रबल इच्छा जागती है। वह इस पृथ्वी के हर जरूरतमंद की आवश्यकताओं को पूरा करना चाहता है। यह किसी प्रकार की समझदारी, बुद्धिमानी, या जागरूकता से उत्पन्न नहीं होती। यह सर्वश्रेष्ठ बनने की चाहत से पैदा होती है। भवसागर की रोमांचकारी यात्रा पर निकले यात्रियों के लिए यह पुस्तक चैतन्य को उपलब्ध एक अनुभवी नाविक की प्रज्ञा से जुडने का एक दुर्लभ अवसर प्रदान करती है।
6. दिव्‍यदर्शी की आँखन देखी

यह पुस्तक सँजोने के लिए है। यह ज्ञान के एक जीते-जागते दिव्यदर्शी की, एक विलक्षण विद्या-निधि की, एक आधुनिक दिव्यदर्शी के लोक की अपूर्व झलक प्रदान करती है। यद्यपि अपनी चर्चा के दौरान सद्गुरु अतर्क के सुदूर छोर को छूते है, तथापि अपनी प्रज्ञापूर्ण, विशुद्ध वाकशैली के कारण अत्यंत काल्पनिक विषयों पर बोलते हुए भी वे कभी अपनी प्रामाणिकता नहीं खोते। इसका परिणाम है एक अनोखा नज़रिया – उस जगत के प्रति जिससे आप परिचित हैं, या कम से कम आप सोचते हैं कि आप परिचित हैं! दिव्यदर्शी की आँखों से – अद्भुत, अतुल्य अंतर्दृष्टि और तीक्ष्ण स्पष्टता के दिव्य चक्षु से – जगत रूपांतरित होता है। एक ऐसा जगत जो आपको स्मरण दिलाता है कि इस पृथ्वी पर, औैर स्वर्ग में भी, आपकी कल्पना से परे, आपके विचारों से परे, बेशुमार, ढेरों चीजें हैं।

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