कोरकू जनजाति के जन्म संस्कार

कोरकू जनजाति के जन्म संस्कार

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जन्म संस्कार गर्भवती कोरकू महिला यथा सम्भव अन्तिम समय तक अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त रहती है। प्रसूति के बाद केवल एक सप्ताह या पन्द्रह दिन तक विधान करती है। प्रसूति का कार्य परिधार की ही बड़ी-बूढी महिलाएँ संत्र करती है। प्रसूतावस्था में भी स्त्रिया किसी भी प्रकार के अन्य औपचारिकताओं नहीं निभाया। कभी-कभी गर्भवती महिला की शिशु जन्म के समय असहाय या असीम कष्ट हो रहा हो तो उसे अपने पति के बाएँ पैर का धोयन (चरणामृत) पिलाते हैं। उनकी ऐसी मान्यता है कि घोचन पिलाने से गर्भवतो का सभी प्रकार का कष्ट दूर हो जाता है और बच्चे का जन्म सरलता से होता है। शिशु जन्म के बाद तीसरे या पाँच दिन बच्चे का नाल (नासा) पृथक किया जाता है। उस दिन दैनिक उपयोग की वस्तुएँ हैसिया (दराती), याली, लोटा, गिलास, कुदाली आदि उसके सामने रखकर उसे दिखाये जाते हैं और एक व्यक्ति थाली बजाता जाता है। प्रसूता सभी महिलाओं के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं तब स्यानी महिलाएं शिशु को देखकर यह प्रयल करती हैं कि नवजात शिशु किसी पूर्वज को आत्मा है। महिलाएं इस अवसर पर जन्म गीत गाती है

कोरकू आदिवासियों के जीवन में शराब का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। शराब बनाने की कला में कोरकू माहिर होते हैं। यह महुआ के फल से बनाई जाती है। मावे से बनी शराब को 'सीडू' कहते हैं। जन्म-मरण, विवाह-शादी, पर्व-त्योहार आदि सीड़ के बगैर अधूरा ही माना जाता है। स्त्रियाँ भी सीडू का पान करती हैं। जातीय नियम और विधि-विधानों में सीडू पीने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, इसलिए कोरकू छककर सीडू पान करते हैं।


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