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डूबती उम्मीदों को सहारे की गुहार करते आंकड़े : असुरक्षा की भावना, हताशा या अवसाद की व्यथा कथा... आशीष दुबे

आशीष दुबे आशीष दुबे
Updated Mon , 20 Apr

सार

इसकी एक झलक नेशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के ताजा व वर्ष 2020 के दौरान आत्महत्या और दुर्घटना के आंकड़ों में मिलती है।

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विस्तार

मन की कंदराओं में झांककर देखना मुश्किल है। असंख्य लोगों के मन में भारी उथल पुथल चलने लगी है। कई तरह की असुरक्षा की भावना, हताशा या अवसाद घर करने लगा है। इसकी एक झलक नेशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के ताजा व वर्ष 2020 के दौरान आत्महत्या और दुर्घटना के आंकड़ों में मिलती है। 

 

यह रिपोर्ट इसलिए भी अहम है कि पहली बार इनसे कोरोना के आम लोगों के जीवन और खासकर उनके दिलो-दिमाग पर पड़े, असर की पुष्टि होती है। दरअसल वर्ष 2020 की शुरुआत से ही कोरोना महामारी की दस्तक आ चुकी थी। मार्च आते-आते हालात बिगड़ने लगे तथा देश व दुनिया के लगभग सभी देशों में टोटल लॉकडाउन ने सामान्य जीवन को तहस-नहस करके रख दिया। 

 

तब से ही आम धारणा थी कि कमजोर दिल दिमाग वाले लोगों के लिए इसका सामना बहुत ही मुश्किल होगा। अब एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि आत्महत्या के मामलों में 2019 के मुकाबले इस साल 10 फीसदी इजाफा हो गया। गत वर्ष आत्महत्या से कुल 153,053 मौतें हुई हैं, जो 1967 के बाद से सबसे ज्यादा हैं। 

 

आत्महत्या करने वाले लोगों में सबसे ज्यादा संख्या यानि करीब 24.6 फीसद दिहाड़ी पर काम करने वालों की है। लॉकडाउन का सबसे मारक प्रभाव इन्हीं लोगों की आजीविका पर पड़ा था। पिछले साल के मुकाबले बढोतरी का प्रतिशत देखा जाए तो सबसे ज्यादा प्रभावित तबके के रूप में उभरते हैं छात्र। अमूमन हर साल खुदकुशी करने वालों में स्टूडेंट्स 7-8 फीसदी होते हैं, लेकिन साल 2020 में इनका प्रतिशत 21.2 दर्ज किया गया है। छात्रों का मानसिक अवस्था नितांत अलग होती है। 

 

वे जीवन के उस कालखंड में होते हैं जहां उनके पास कुछ करने के सपने होते हैं, दुनिया के अनुभवों से नया-नया सामना हुआ होता है और पारिवारिक या सामाजिक समस्याएं भी साथ हैं। लॉकडाउन के कारण जिस तरह से अचानक सारे स्कूल-कॉलेज बंद करने पड़े उसका बच्चों पर जबर्दस्त असर पड़ा। उनकी पढाई प्रभावित हुई, स्कूल-कॉलेज का माहौल छूट गया, दोस्तों से मिलना-जुलना बंद हो गया और उनका जिंदगी ठहरकर चारदीवारी तक सिमट गई। लंबे लॉकडाउन के बाद जीवन के अन्य क्षेत्र धीरे धीरे खुलना शुरू भी हुए, लेकिन स्कूल कॉलेज बंद ही रहे। 

 

ऑनलाइन क्लास के जरिए पढाई का सिलसिला शुरू भी हुआ तो उन बच्चों की हताशा और बढी जिनकी डिजिटल उपकरणों तक पहुंच नहीं थी। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक देश में 2.9 करोड स्टूडेंट्स स्मार्टफोन, कंप्यूटर आदि उपकरणों तक पहुंच न होने के चलते पढ़ाई से कट से गये। इसका असर यह भी हुआ कि वे अपने संगी-साथी और उस माहौल से भी कट गये जो उन्हें खुश रखता था। 

 

युवाओं के मन में आयी आत्मघाती प्रवृति ताजा आंकड़ों से जब साफ होने लगी है तो समाज और सरकार को चाहिये होगा कि वे इसकी ओर ध्यान दें, तत्काल युवाओं की काउंसलिंग या अन्य माध्यमों से उन्हें सकारात्मक बनाने की मुहिमों को छेडें। एनसीआरबी की रिपोर्ट में सड़क हादसों का भी जिक्र है। साल 2020 में सड़क हादसों से मौतों का आंकडा काफी नीचे आया है। यानि कुल 374,397 मौतें हुईं, जो 2019 के मुकाबले 11.1 फीसदी कम हैं। 

 

आशंकडे दिखने में बेजान होते हैं लेकिन उनमें एक आवाज भी होती है जो हमें भूतकाल से सबक लेने और वर्तमान व भविष्य को संभालने की गुजारिश करती यदि इनके आधार पर सरकारें अपनी नीतियों को बेहतर करें, लोगों के लिये ज्यादा उपयोगी बनाएं तो इनकी सार्थकता है।