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नायकों के मोरपंखों से कैसे मिलेगी उन जातियों को छाया.. सरयूसुत मिश्र 

सार

देश में जाति गौरव को उभारने का खेल खुलेआम खेला जाता है, जातीय गौरव का ढिंढोरा पीटने में सरकारी धन का उपयोग भी सर्वविदित है, जातियों में टकराव और विभाजन को रोकने का कोई प्रयास शायद इसलिए नहीं करते, क्योंकि यह सत्ता की चाभी हासिल करने का जरिया बन चूका है..

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विस्तार

आज देश में जाति गौरव को उभारने का खेल खुलेआम खेला जाता है। जातीय नायकों को मां, बाप, बाबा, दादा और बुजुर्गों से ऊपर महत्व और स्थान देने की होड़ लगी हुई है। कोई भी राजनीतिक दल इस खेल में पीछे नहीं है। जातीय गौरव का ढिंढोरा पीटने में सरकारी धन का उपयोग भी सर्वविदित है। अब स्थिति दिनों दिन और विकृत स्वरूप लेती जा रही है। राजनीतिक दलों के बीच जाति और समाज बंटे हुए हैं। वैसे तो हम राष्ट्रीय एकता और गौरव को मजबूत करने की हमेशा बात करते हैं, लेकिन जातियों में टकराव और विभाजन को रोकने का कोई प्रयास शायद इसलिए नहीं करते, क्योंकि यह सत्ता की चाभी हासिल करने का जरिया बन गया है। 

जाति और समाज का गौरवगान समाज और जाति का विषय है, लेकिन आज यह सब राजनीति प्रायोजित कर्मकांड बन गया है। आजादी के बाद आज स्थिति यहां पहुंच गई है कि हमारे समाज और राष्ट्र के जो महापुरुष और महागौरव हैं, उनको जातियों के बीच बांट दिया गया है। मतलब यह हुआ कि भारत आज महापुरुषों के नाम पर बटा हुआ है। हर जाति अपने एक महापुरुष का महिमामंडन करती है। महापुरुषों का स्मरण आत्म गौरव के लिए जरूरी है। लेकिन वोटों की राजनीति के लिए जातिय गौरव को बढ़ाना राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है।

भारतीय संस्कृति और आत्मा के प्रतीक हमारे महापुरुष जातियों में कैसे बट गए ? भगवान परशुराम किसी के हो गए हैं, तो रविदास किसी के हो गए हैं। महाराज शिवाजी किसी विशेष जाति और समाज के हो गए हैं तो नानक देव और ज्योतिबा फुले किसी अन्य जाति के प्रतीक पुरुष बना दिए गए हैं। सरदार पटेल को कोई जाति अपना महानायक मानती है, तो डॉक्टर अंबेडकर को भी जातियों तक ही सीमित कर दिया गया है। महात्मा गांधी राष्ट्रपिता हैं, लेकिन जातीय राजनीति के लिए उन पर भी सवाल उठाए जाते हैं। यहां तक कि भगवान कृष्ण को भी एक जाति से जोड़ा जाता है। भगवान बिरसा मुंडा को जनजाति का गौरव माना जाता है, तो भगवान राम को भी कुछ लोग अपनी जाति और समाज का होने का दावा करते हैं। हमारी संस्कृति ने जिनको भगवान माना है, उनको किसी भी जातिगत नजरिए से देखना क्या उन्हें कमतर करना नहीं है। इन महापुरुषों को जातियों में विभाजित करना, क्या भारतीय आत्मा के विभाजन जैसा नहीं है ? यही विभाजन भारत को धीरे-धीरे कमजोर कर रहा है।

यह महापुरुष हमें राष्ट्र और समाज की एकता की प्रेरणा देते हैं। लेकिन हम क्षुद्र सोच से इन्हें जातिय गौरव में बदलने का प्रयास करते हैं। ऐसा नहीं है कि जातियों में विभाजन के कारण भारत ने ऐतिहासिक नुकसान नहीं भुगता है। अंग्रेजों और मुगलों ने तो विभाजन के फार्मूले पर ही लंबे समय तक भारत पर शासन किया। जब-जब हम बटे तब तब हम कटे हैं। फिर भी हम हम इन कमजोरियों में क्यों अटके हुए हैं।पहले तो सामाजिक भेदभाव के कारण हम कबीलों और जातियों में बटे हुए थे, लेकिन आज हमें “राजनीति” सुनियोजित ढंग से बांट रही है। राजनीतिक लक्ष्य और उद्देश्यों के लिए जातीय नायकों, महानायको के नाम पर गौरवगान अहंकारी संतुष्टि और कुछ राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति का जरिया हो सकता है, लेकिन इससे अंततः राष्ट्रीय एकता बाधित होती है, सबसे बड़ा सवाल यह है कि जातिय नायकों के मोरपंखों से इन जातियों को छाया कैसे मिलेगी।

मोरपंख नायकों की महानता और बलिदान के प्रति महासम्मान का प्रतीक है। लेकिन उससे आज जीवन यापन की बुनियादी बातों का समाधान कैसे किया जा सकता है ? रोटी कपड़ा मकान की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति कोई गौरवगान नहीं कर सकता। भूखे और बेबस लोगों के लिए सरकार को सामुदायिक रसोई शुरू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सख्त निर्देश दिए गए हैं।  इन निर्देशों के पीछे गरीबों की बेबसी और लाचारियों की चीत्कार शासकों को क्यों सुनाई नहीं पड़ती ? जातीय गौरव उभारने के पीछे लोकतंत्र के माध्यम से सत्ता की चाबी हथियाने का परम उद्देश्य होता है। आज योग्यता के आधार पर नहीं जातिगत आधार पर लोकतांत्रिक शासक, मुख्यमंत्री और मंत्री बनाए जाते हैं। जब सब कुछ जाति आधार पर ही हो रहा है तो जातिगत जनगणना का विस्फोट भी हो ही जाना चाहिए, इसे रोकने से क्या होगा, जबकि राजनीति की दिनचर्या जाति आधार पर ही चलती है। 

जातीयता ,भारतीयता को प्रभावित कर रही है। राष्ट्रीय गान के साथ एक जाति एंथम राजनीति में गाया जा रहा है। इस एंथम से लोग ठगे जा रहे हैं। चुनाव के समय तो ऐसा जातीय संसार रच दिया जाता है, कि शासन के बुनियादी कर्तव्य और दायित्व की चर्चा हो ही नहीं पाती।  इसके लिए कोई एक दल को दोषी नहीं कहा जा सकता, कई बार तो ऐसा लगता है शासन के मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए जातीय नायकों के जादू का खेल खेला और दिखाया जाता है। राजनीति से अब यह सवाल हर दिन पूछने की जरूरत है कि सरकारी धन विकास के किस काम के लिए खर्च किया गया और उससे कितनी जिंदगियों में बदलाव आया।

ऐसा भी नहीं है कि राजनीति का जातीय कार्ड हमेशा सफल ही होता रहा हो, कई बार जनता इसे पूरी तरह से नकार देती है। लेकिन फिर भी राजनीति में जाति की लाइन चलती ही रहती है। ऐसा शायद इसलिए होता है क्योंकि लोकतांत्रिक सरकारों के पास कुछ नया करने के लिए  ना तो धन और ना ही कोई योजना या चिंतन है। यह कितना हास्यास्पद लगता है कि किसी भी व्यक्ति को अपने पुरखों की पुण्यतिथि तो याद रह सकती है, लेकिन उनकी जन्मतिथि तो किसी को भी याद नहीं रहती। भारतीय संस्कृति के महान पर्व पितृपक्ष के दौरान जब तर्पण में तीन पीढ़ियों के पूर्वजों का नाम लेना आवश्यक होता है, तब भी बहुत सारे लोगों को अपनी तीन पीढ़ियों का नाम याद नहीं आता। पुण्यतिथि, जयंती, विवाह-भोज और मृत्यु-भोज पर दिखावा तथा धन की बर्बादी को रोकने के लिए सामाजिक आंदोलन चल रहे हैं।

कोई भी व्यक्ति अपने पूर्वजों की पुण्य तिथि और जयंती समारोहपूर्वक नहीं मनाता। घर में पूर्वजों के प्रति भाव और सम्मान व्यक्त करने तक ही यह दिवस सीमित होते हैं। विवाह भोज और मृत्यु भोज सामाजिक मजबूरी है, इसलिए इसे  तो करना ही पड़ता है, लेकिन फिर भी जो धनाड्य लोग इन अवसरों पर धन का प्रदर्शन करते हैं, उनकी समाज में कटु आलोचना भी होती है। कई बार सरकारें ऐसी कुरीतियों को दूर करने के लिए जन जागरूकता फैलाने का काम भी करती हैं, लेकिन वह जागरूकता सरकारों तक क्यों नहीं पहुंचती? यह बात समझ से परे है! 

भारत की राजनीति की धुरी काफी सालों बाद बदली है। यह धुरी पुरानी रिंग से बाहर निकलने की कोशिश करती तो दिखाई पड़ रही है, लेकिन, नई राजनीति का प्रकाश फैलने में शायद समय लगेगा। यह सफल तभी होगी, जब राजनीतिक दृष्टि बदलेगी, सेवा संकल्प एवं समर्पण सही मायनों में राजनीति का आधार बनेगा। एक और सुझाव देना आवश्यक है। क्यों नहीं हम सभी जातियों के गौरव और नायकों का एक राष्ट्रीय संग्रहालय निर्मित करें। हर राज्य अपने स्तर पर भी इनका निर्माण करायें, मानव संग्रहालय बना हुआ है जिसमें सभी जनजातियों के रहन-सहन, निवास, खान-पान और औजार  सुरक्षित रखे हुए हैं। क्यों नहीं हम जनजातियों के नायकों और संस्कृति का संरक्षण टाइगर रिजर्व जिनसे विशेष क्षेत्र बनाकर सुरक्षित रख सकते हैं। लोगों में उत्सुकता है कि जंगलों में जीवन यापन करने वाला समाज कैसे रहता है?

अगर हम इस दिशा में ईमानदारी से कोई प्रयास करें, तो ये पर्यटन का बड़ा माध्यम बन सकता है। आज पूरी दुनिया में  नायकों की मूर्तियों और नायकत्व पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। कई जगहों पर तो मूर्तियां तोड़ी गई हैं। भारत में भी शहरी इलाकों में चौराहों पर लगने वाली मूर्तियों की परंपरा टूट रही है। क्यों नहीं हम ऐसी परंपरा विकसित करें जो हमारे नायकों की वीर गाथाओं और शौर्य को प्रदर्शित करे। लेकिन इसके लिए कोई स्थाई व्यवस्था की जाए, ताकि उनका संदेश हर रोज नई पीढ़ी को मिल सके।