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राजनीतिक सहिष्णुता, शत्रुता में बदलने का कारण कहीं भ्रष्टाचार तो नहीं?

सार

भारत की राजनीती आज किस दौर में पंहुच गयी है| बड़े पदों पर बैठे लोग आपस में शत्रुता का भाव रखते हैं| राजनीती के इन हालातों को क्या बदलने की ज़रूरत है?

janmat

विस्तार

वसुधैव कुटुंबकम की संस्कृति  वाले भारत देश की राजनीति आज किस स्तर तक पहुंच गई है कि राजनीतिक सहिष्णुता समाप्त सी हो गई है| राजनीतिक शत्रुता का माहौल बनता जा रहा है| पंजाब में प्रधानमंत्री की सुरक्षा में अक्षम्य चूक पर अभी जांच पड़ताल हो ही रही है| प्रधानमंत्री के कोलकाता में हुए कैंसर इंस्टिट्यूट के ऑनलाइन उद्घाटन कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने राजनीतिक असहिष्णुता का उदाहरण पेश किया है| राजनीति कभी सेवा का माध्यम हुआ करती थी| जो भी लोग राजनीति में काम करते थे वह समाज के सामने एक उदाहरण पेश करते थे| राजनीति में आज जैसी गला-काट प्रतिस्पर्धा नहीं होती थी| चुनाव में हार-जीत खिलाड़ी भावना से ली जाती थी| राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच शत्रुता का माहौल नहीं होता था|

भारत की आज की राजनीतिक स्थिति गंभीर चिंता पैदा कर रही है| राजनीति में सत्ता के लिए जिस ढंग से एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए, मर्यादाओं को ताक पर रख दिया जाता है| उसके उदाहरण हर रोज देखने को मिल रहे हैं| ऐसा क्यों हो रहा है? सेवा के लिए संघर्ष की कोई आवश्यकता नहीं होती| जो भी कोई सेवा करना चाहता है उसके लिए पद का होना कोई अनिवार्यता नहीं है|

समाज में कितने सारे लोग हैं जो सेवा का काम करते हैं और उनके पास कोई पद नहीं है| फिर राजनीति में सत्ता के लिए पद के लिए इतने घटिया स्तर पर जाने की क्या जरूरत है?

राजनीति में भ्रष्टाचार आज शिष्टाचार जैसा हो गया है| कोई भी व्यक्ति जब राजनीति में प्रवेश करता है तब और कोई पद प्राप्त करने के बाद, उसकी आर्थिक स्थिति में जमीन आसमान का अंतर लोगों को दिखने लगता है| इससे ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीति में धन लाभ शायद सबसे ज्यादा तेज गति से होता है| सेवा का माध्यम जब धन लाभ का जरिया बन जाएगा, तब उसके लिए प्रतिस्पर्धा निश्चित ही मारकाट तक पहुंच जाएगी और शायद यही भारतीय राजनीति में आज हो रहा है|

राजनीति में भ्रष्टाचार के मामले आए दिन प्रकाश में आते हैं| इसमें बड़े-बड़े नेता और सरकारों में अहम पदों पर बैठे लोग शामिल पाए जाते हैं|

देश में कितने मुख्यमंत्री और मंत्री हैं जो भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जा चुके हैं| कई नेता तो आज भी जेल की सजा काट रहे हैं| सरकारें बनाने के लिए देश में जिस ढंग से गठबंधन और दलबदल सहित राजनीतिक हथकंडे अपनाए जाते हैं उनको देखकर आम आदमी शर्मिंदगी महसूस करता है| जो परिस्थितियां दिखाई पड़ रही हैं उससे तो यही धारणा मजबूत होती है कि सेवा का माध्यम राजनीति अब धन लाभ कमाने का जरिया बन गया है| इसीलिए धन लाभ के लिए होने वाली प्रतिस्पर्धा राजनीतिक मारकाट तक पहुंच रही है|

केंद्र राज्य और स्थानीय सरकारों के प्रतिनिधियों की संपन्नता जानने के लिए किसी शोध की आवश्यकता नहीं है| चुनाव में टिकट प्राप्त करने से लगाकर जीतने और शासन में पद प्राप्त करने तक साम दाम दंड भेद की नीतियां जिस तरह से अपनाई जाती हैं| वह अब आम व्यक्ति की भी समझ में स्पष्ट आ जाता है| संसद के उच्च सदन और जिन राज्यों में उच्च सदन है वहां राज्य सभा, विधान परिषद की सीटें योग्यता के आधार पर नहीं पैसे के बल पर प्राप्त की जाती है|

संसद और विधानसभाओं में प्रश्न पूछने में भी भ्रष्टाचार उजागर हुए हैं| स्थिति इतनी नकारात्मक बन गई है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने मूल दायित्व, कानून बनाने की प्रक्रिया से अनभिज्ञ रहते हैं| वह केवल विधानसभाओं में औपचारिकता भर निभाते हैं| राजनीतिक बयानबाज़ी आज घटियापन की सारी हदें तोड़ रही है| भारत के निर्वाचित प्रधानमंत्री को कोई हत्यारा, कोई मौतों का सौदागर और कोई हिटलर जैसे शब्दों से संबोधित करता है| ऐसी बयानबाजी भी यह प्रदर्शित करती है कि भारत में राजनीतिक शत्रुता किस स्तर पर पहुंच गई है| ऐसे शब्द जो भारत में अपमान के लिए जाने जाते हैं| उनका देश के सबसे बड़े सेवक के लिए उपयोग करना राजनेताओं के लिए कहां तक जायज है| लेकिन बयान लोग देते हैं उस पर लोग तथ्यात्मक प्रतिक्रिया देने से भी  बचते हैं|

राजनीतिक मुकाबला चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालकर विकास और सेवा के लिए होना चाहिए|  विपक्ष का दायित्व शासन के कार्यक्रमों नीतियों पर चेक एंड बैलेंस करना है| लेकिन इस तरफ कोई भी पक्ष अपनी भूमिका नहीं निभाता| विपक्षी नेता तो ऐसे आरोप लगाते हैं जो व्यक्तिगत और चारित्रिक होते हैं| इस तरह की राजनीति में कई बार राष्ट्रीय हितों को भी तिलांजलि दे दी जाती है|

राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में भी सरकारों की नियत पर सवाल उठाए जाते हैं| सेना को भी मुद्दा बनाने से लोग नहीं चूकते| राजनीतिक दलों का एक ही उद्देश्य होता है किसी भी सीमा तक गिरो, लेकिन सत्ता हासिल होना चाहिए| सत्ता के लिए इतनी लालसा क्यों?

राजनीति सेवा के लिए है| सेवा के लिए इतनी लालसा तो राजनेताओं में हो ही नहीं सकती| निश्चित ही इसके पीछे धन लाभ हो सकता है| राजनीति का जो वातावरण आज बना है| इसी के कारण इंटेलेक्चुअल लोग राजनीति में आने से बचते हैं| राजनीति में परिवारवाद और वंशवाद इसीलिए बढ़ रहा है, क्योंकि नए लोग राजनीति में आना ही नहीं चाहते| राजनीति के आज के माहौल में उसी प्रकृति और प्रवृत्ति के जीवाणु रह सकते हैं जो उसकी सारी बुराइयों को स्वीकार करते हुए, सेवा के नाम पर धन लाभ की आकांक्षा को पूरा करने के इच्छुक होते हैं|

स्पीच की स्वतंत्रता का दुरुपयोग शायद राजनीतिक लोग सबसे ज्यादा करते हैं| मतदाताओं में लोभ की भावना को बढ़ाने का काम भी राजनीतिक दल ही करते हैं|

मतदाताओं की भी कम गलती नहीं होती, मत डालते समय उनका नजरिया भी गुणवत्ता से ज्यादा कुछ अन्य होता है| इन राजनीतिक हालातों को बदलने की जरूरत है| ऐसी स्थितियां लंबे समय तक चलती रहीं तो कहीं पब्लिक जाग ना जाए और राजनीति को सुरक्षा की जरूरत न पड़ जाए|