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दिख रहा सबको कोई अंधा नहीं है..दिनेश मालवीय

सार

यह शे’र मैंने अपने आसपास के खराब हालत देखकर, ज़िम्मेदार लोगों की लापरवाही के दुखी होकर कहा था. क्या अजीब बात है, कि जहां देखो वहीं मनमानियां हो रही हैं. आम आदमी के घर से निकलते ही उसका लुटना-पिटना शुरू हो जाता है. घर से पैदल निकले तो ट्राफिक इतना बिगड़ेल है, कि कब कोई ठोंक जाए, पता ही नहीं चले...

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विस्तार

यह शे’र मैंने अपने आसपास के खराब हालत देखकर, ज़िम्मेदार लोगों की लापरवाही के दुखी होकर कहा था. क्या अजीब बात है, कि जहां देखो वहीं मनमानियां हो रही हैं. आम आदमी के घर से निकलते ही उसका लुटना-पिटना शुरू हो जाता है. घर से पैदल निकले तो ट्राफिक इतना बिगड़ेल है, कि कब कोई ठोंक जाए, पता ही नहीं चले. रिक्शा करे या पब्लिक ट्रांसपोर्ट में चले, तो मनमानी वसूली. मिनी बसें ठसाठस भरी होती हैं, जो सवारी भरने के लिए कभी भी कहीं भी खड़ी हो जाती हैं. मनमाना किराया वसूला जा रहा है. ख़ुद की गाड़ी से चले तो डीजल-पेट्रोल महँगा. घर के नलों में पर्याप्त पानी नहीं आ रहा है, बिजली आती कम, जाती ज्यादा है, लेकिन बिल भरपूर आ रहा है.


नगरपालिका टैक्स तो ले रही है, लेकिन कॉलोनियों में सुविधाओं के नाम पर सिर्फ खानापूरी है. गंदगी के आलम का तो कहना ही क्या. उसकी सडकों पर वाहन चलाना हड्डियां चटकने की कीमत पर ही मुमकिन है. वाहन ख़रीदते समय ही सरकार आजीवन रोड टैक्स ले लेती है, लेकिन शहर से बाहर निकलते ही, जगह-जगह पर टोल नाकों पर जेब ढीली करनी पड़ती है. और भाई अगर पूर्व जन्म के किसी बहुत घोर पाप की वजह से थाना-कचहरी की सीढ़ी चढ़नी पड़े, तो फिर भगवान् ही मालिक है. खाकी वर्दी और काला कोट आपके साथ, क्या करे कोई नहीं कह सकता. पुराने लोगों ने वैसे ही थोड़ी कहा था, कि “भगवान् थाने और कचहरी की सीढ़ी नहीं चढ़वाये”.


बीमार हो जाना तो बहुत बड़ा अज़ाब है. सर्दी-ज़ुकाम भी दिखाने जाओ, तो डॉक्टर न जाने कितनी जाँचें करवाता है, जो अधिकतर उसके ही द्वारा संचालित या संरक्षित पैथोलोजी सेंटर पर होती हैं. दवा लेने जाओ, तो वहाँ भी कपड़े उतरने में कोई कसर नहीं रहती. अब तो एक नया ट्रेंड यह चल पड़ा है, कि शादी ही मत करो. इसके पीछे कारण पर विचार करने पर निष्कर्ष निकला, कि घर-परिवार की ज़िम्मेदारी उठाना सचमुच इतना मुश्किल होता जा रहा है, कि लोग बिना शादी के ही “प्राइवेट” रूप से शादी का “सुख” भोगने को प्रेफर करने लगे हैं.  


बच्चे पैदा नहीं करने की ओर से  भी लोग मुँह मोड़ने लगे हैं. बच्चे की ठीक से परवरिश हर किसी के वश कि बात नहीं है. बच्चे के जन्म में ही ख़ूब कुटाई हो जाती है, क्योंकि आजकल जचकी “सिजेरियन” ही होती है, जिसका मतलब सभी जानते हैं. नॉर्मल डिलीवरी तो अब एबनार्मल बात हो गयी है. चलिए बच्चा हो गया, तो उसकी पढ़ाई का मसला खड़ा है. उसे सरकारी स्कूल भेजो, तो वह कहीं का नहीं रहने वाला. यदि प्राइवेट स्कूल में भेजो तो आप कहीं के नहीं रहने वाले.


जहाँ-तहाँ जमकर एन्क्रोचमेंट हो रहे हैं. “जहां कहीं दिखी जगह” की तर्ज पर कर कोई कब्जा कर लेता है. ऐतिहासिक स्थल और स्मारक तक अतिक्रमणों से ढँक गये हैं. अतिक्रमण रोकने के जिम्मेदार लोग दिन में कई बार वहाँ से गुजरते हैं, लेकिन उन्हें यह दिखाई ही नहीं देता. यह तो मैं शहरों की बात कर रहा हूँ. गांवों और कस्बों की हालत तो काबिले बयान नहीं है. गाँव में स्थानीय नेता, सम्बंधित अधिकारियों और दबंगों का ऐसा गठजोड़ है, कि आम आदमी को उन्हीं के इशारे पर चलना होता है. तहसील और जिला स्तर तक तो उसकी कोई पहुंच ही नहीं होती. अगर चला भी जाए, तो उससे उसे कोई ख़ास राहत नहीं मिलने वाली. आखिर उसे रहना तो उसी गाँव में इन्हीं स्थानीय प्रभावशाली लोगों के बीच रहना है. वह यहां “पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर करने” वाली कहावत चरितार्थ होती है. उसे तो बिजली विभाग के लाइनमेन तक को पटाकर रखना पड़ता है.   


अब आते हैं राजनीति पर, जो हर जगह, हर चीज़ में हाबी है. हर स्तर का नेता चुनाव जीतने के लिए क्या- नहीं करता!  वह जातिवाद का भरपूर उपयोग करता है. जीतने के बाद वह क्या करता है, इसे बताने की ज़रुरत नहीं है. जातिवाद नहीं चले, तो मजहब-धर्म-सम्प्रदाय तो है ही. इससे भी काम नहीं चले तो धनबल और बाहुबल का सहारा ले लेता है. किसी भी तरह एक बार चुनाव जीतने के बाद तो उसका कई गुना घर बैठे आ ही जाना है.


सरकारी महकमों में तबादले-तैनातियाँ किस तरह होती हैं, यह एक खुला रहस्य है. जो व्यक्ति खर्च करके कहीं तैनाती करवाएगा, वह सबसे पहले तो इसके लिए दिये गये धन की वसूली करेगा. इसके बाद वह इतना कमाना चाहेगा, कि भविष्य सुरक्षित हो सके. इस काम एक तरह से “संस्थागत” स्वरूप ले चुका है. इस तरह के काम करने-करवाने वाले बड़ी संख्या में लोग साइकल से चलते-चलते अचानक महँगी कारों में चलने लगते हैं. झोपड़ी से एकदम महलनुमा मकानों में पहुँच जाते हैं.


इस संदर्भ में सबसे बड़ी बात यह है, कि किसी भी पार्टी की सरकार बन जाए, इससे इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. सत्ता के केन्द्रों पर वही चेहरे हर किसी सरकार में दिखाई देते हैं.इस विषय पर कहने-सुनने को इतना है, कि कई किताबें लिखी जा सकती हैं. लिखी भी गई हैं. सवाल यह है, कि क्या यह सब किसी को दिख नहीं रहा? यह मुमकिन ही नहीं है. सबको सब कुछ दिख रहा है. लेकिन कोई कुछ करना नहीं चाहता. यदि कोई कुछ करना भी चाहे, तो उसकी ऐसी दुर्गति होगी है, कि उसकी आने वाली सात पुश्तों में भी कोई कुछ करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा. सारी अवैधानिक और अनैतिक गतिविधियों को रसूखदारों का पूरा संरक्षण है. अधिकतर मामलों में तो सहभागिता भी है. उनको शय इसलिए मिलती है, क्योंकि वे चुनावों में मदद करते हैं.


मेरे एक मित्र ने कहा, कि समस्याएं और कमियाँ ही बताते हो, उनका हल भी तो बताओ. लेकिन किसी प्राचीन पुस्तक में मैंने पढ़ा है, कि जैसी प्रजा होती है, उसे वैसा ही शासक मिल जाता है. इसका समाधान भी लोगों के ही पास है, लेकिन वे इसके लिए कुछ करेंगे नहीं, क्योंकि वे भी तो अपना सब काम आसानी से करा लेना चाहते हैं. यदि इस अराजकता जैसी स्थिति से निज़ात पानी है, तो जनता को अपने विवेक से काम लेना होगा. ग़लत को ग़लत कहकर उसका विरोध करने का साहस जुटाना होगा. हर अच्छी चीज़ की क़ीमत चुकानी पड़ती है, लेकिन उसके परिणाम बहुत सुखद होते हैं.