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अदूरदर्शी शासन प्रशासन - विकसित कैसे बनेगा शील भारत- अतुल विनोद

अतुल विनोद अतुल विनोद
Updated Thu , 23 Jan

सार

केंद्र हो या भारत के किसी राज्य की सरकार। सरकार में शासन प्रशासन का रवैया अभी भी उतना नहीं बदला है जितना बदलना चाहिए।

janmat

विस्तार

दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है। भारत के कदमों ने उनका सिर्फ पीछा करना सीखा है। भारत दुनिया के कई देशों से बहुत पीछे चल रहा है। खासतौर से उस दिन से जो भारत का प्रबल दुश्मन है।

केंद्र हो या भारत के किसी राज्य की सरकार। सरकार में शासन प्रशासन का रवैया अभी भी उतना नहीं बदला है जितना बदलना चाहिए।

लोगों की प्रवृतियां भी अमूमन वैसी ही हैं। वोट देने की उनकी सोच समझ में कोई बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं आया है। चुनाव होते हैं और लोग विकास से ज्यादा जातीय, क्षेत्रीय और भावनात्मक मुद्दों को महत्व देते हैं। 

यही कारण है कि राजनीतिक दलों के एजेंडे में विकास की रफ्तार और दूरदर्शी कम दिखाई देती है। इनमे तात्कालिक राहत के कदम ज्यादा दिखाई देते हैं।

आज पूरे देश में सुनियोजित और सार्थक विकास की जरूरत है। इस विकास के लिए देश केंद्र या राज्य की सरकारों को फ्यूचरिस्टिक अप्रोच से काम लेना पड़ेगा। 

हर योजना भविष्य को दृष्टिगत रखते हुए बनानी पड़ेगी, शासन प्रशासन के काम में इतनी तेजी आए कि हम वैश्विक शक्तियों का मुकाबला कर सकें।

आज भी भारत विकासशील राष्ट्र है। आखिर कब तक हम विकास की बाट जोहते रहेंगे। कब तक हम विकसित देश की कतार में आने की कोशिश करते रहेंगे। आखिर कब नतीजा निकलेगा, जब हम विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आ जाएंगे।

आज हमारे देश का कोई भी राज्य दुनिया के विकसित राज्यों की श्रेणी में नहीं है। जरूर कुछ राज्यों ने अच्छी तरक्की की है लेकिन फिर भी उन्हें पूर्ण विकसित नहीं माना जा सकता। इसमें शासन प्रशासन ही जिम्मेदार नहीं है भारत की जनता का माइंडसेट भी इसके पीछे बहुत बड़ी वजह है। 

शासन और प्रशासन को हमारे यहां कर्तव्य का पाठ पढ़ाने की जरूरत होती है, कई मामलों में तो कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ता है। सरकारी अधिकारी और राजनेता, लगता है उनकी नींद कोर्ट के सख्त रवैये के बाद खुलती है। 

हाल ही में पंजाब में प्रधानमंत्री की सुरक्षा में लापरवाही बरती गई। या तो यह सियासी बदतमीजी थी या फिर प्रशासन की घोर लापरवाही। इस घटना ने भारत की साख को पूरी दुनिया में गिरा दिया।

हमारे देश के प्रधानमंत्री की लाचारी पूरी दुनिया ने देखी। हम इस सोच से कब उठ पाएंगे कि हम किसी राजनीतिक दल के नुमाइंदे भर नहीं हैं। अफसर किसी खास राजनीतिक दल की सरकार के नौकर नहीं हैं? प्रशासन किसी राजनीतिक दल का पट्ठा नहीं होता। 

ई मामले आते हैं जो बताते हैं कि शासन और प्रशासन अपना कर्तव्य और दायित्व ढंग से नहीं निभा रहे। आमजन से जुड़े हुए मामलों पर कई अधिकारियों की नींद तो खुलती ही नहीं। उनकी प्राथमिकताएं बदल गई है। छोटी छोटी समस्या देश को विकासशील बनाए हुए है। 

आज तक हम आवारा मवेशियों की समस्या से निजात नहीं पा पाए। कचरा आज भी हमारे देश की एक बड़ी मुसीबत है। अवैध निर्माण पर आज भी लगाम नहीं लगी है। अधिकारी, राजनेता, रसूखदार फायदे के लिए मनमर्जी से शहरों के विकास में हस्तक्षेप करते हैं। जान माल की भरपाई के नुकसान की बात तो बहुत दूर की बात है। समस्याएं कहां नहीं हैं? जगह-जगह समस्याएं दिखाई देती हैं। 

शहरों का सुनियोजित विकास आज तक तय नहीं हुआ है। स्मार्ट सिटी बनाने की बात हुई थी लेकिन आज भी वह जमीन पर उतरती हुई दिखाई नहीं देती।

शहरों के लोग खराब सड़कों बेतरतीब सीवेज सिस्टम से जूझ रहे हैं। गांव में आज भी सड़कों की पहुंच नहीं है।

24 घंटे बिजली निश्चित रूप से उपलब्ध हुई है, लेकिन फिर भी गांव में अतिक्रमण और नल जल योजनाएं समस्याएं बनी हुई हैं| छोटे-छोटे काम में भ्रष्टाचार होता है| 

हाल ही में मध्य प्रदेश के 1 जिले में एसडीएम को एक काम के लिए ₹35000 की रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया| एसडीएम जैसा अधिकारी जिसका वेतन लाखों में है| जिसे तमाम तरह की सरकारी सुविधाएं मिलती हैं| वह साधारण नागरिक से ₹35000 की रिश्वत लेता है|

स्वास्थ्य सुविधाओं की बात करें तो कोरोना वायरस जब आता है तो स्वास्थ्य सुविधाओं की पोल खुल जाती है| छोटी-छोटी बीमारियों के इलाज के लिए मरीजों को बड़े शहरों तक जाना पड़ता है| आखिर कब हम अपनी बुनियादी सुविधाओं को चाक-चौबंद कर पाएंगे| 

कब हम हमारे लोगों को स्वास्थ्य की गारंटी दे पाएंगे| कब हमारे नागरिकों को शुद्ध पेयजल की गारंटी मिलेगी? कब हम 24 घंटे बिजली देने का वादा पूरा कर पाएंगे| कब हम नागरिकों को विश्वस्तरीय सड़कें और बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर दे पाएंगे|

इसके लिए न सिर्फ सरकार को बदलना पड़ेगा बल्कि आम नागरिकों को भी अपनी सोच बदलनी पड़ेगी| भ्रष्टाचार और बेईमान शासन प्रशासन को सबक सिखाने के लिए उन्हें आगे आना पड़ेगा| जांच एजेंसियों का हाल कुछ अच्छा नहीं है| 

बड़ी-बड़ी एजेंसियों के बारे में यह बातें आती हैं कि वो छापे डालते हैं बड़े बड़े अधिकारियों, कारोबारियों को पकड़ते हैं लेकिन रिश्वत में बड़ी राशि लेकर उन्हें छोड़ देते हैं|

आए दिन बड़े-बड़े छापों में करोड़ों रुपए मिलने की बात सामने आती है लेकिन जब बात दंड की आती है तो ऐसा व्यक्ति दंडित होता हुआ दिखाई नहीं देता| जनता भी भूल जाती है मीडिया भी और सरकार भी| आखिर में अंडरस्टैंडिंग हो जाती है और वह व्यक्ति बच जाता है!

अधिकारियों की सोच होती है कि हम करोड़ो रुपए कमाएंगे और उनमे से कुछ करोड़ उन एजेंसियों को दे देंगे जिन एजेंसियों की जिम्मेदारी है भ्रष्टाचार को पकड़ने की|

वोट देने की बारी आती है तो आम नागरिक किसे वोट देते हैं? उनकी प्राथमिकता में कौन नेता होता है? जब अधिकारियों की नियुक्ति की बात आती है तो सरकार किन अधिकारियों को तवज्जो देती है? यह सारी बातें सोचने की है| इन पर जब तक विचार नहीं किया जाएगा तब तक दूरदर्शी सरकार की कल्पना नहीं की जा सकेगी|