• India
  • Thu , Jun , 20 , 2024
  • Last Update 10:30:AM
  • 29℃ Bhopal, India

जनतंत्र को लीलता जाति तंत्र..! मतदाता कैसे बनेगा सही मायने में भारत भाग्य विधाता ? सरयूसुत मिश्र 

सार

भारत में जनतंत्र को जाति-तंत्र निगल रहा है. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भारत के सभी नागरिक मिलकर गणराज्य की स्थापना का संकल्प लेते हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश में जाति तंत्र पूरी तरह से चुनाव को नियंत्रित कर रहा है. शायद राजनीतिक दलों को यही उपयुक्त लगता है कि चुनाव धर्म जाति वर्ग के विमर्श पर हो जाएं तो राज्य के विकास के लिए उनकी सोच और पूर्व में किए गए कार्यों पर चुनाव में जवाब नहीं देना पड़े..

janmat

विस्तार

भारतीय जनतंत्र को दुनिया में सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में सम्मान मिलता है| ऊपर से देखने पर भारत का जनतंत्र ऐसे ही दिखाई पड़ता है लेकिन जमीन पर देखने पर ऐसा लगता है कि भारत में जनतंत्र को जाति-तंत्र निगल रहा है| जो जन गण मन भारत का भाग्य विधाता होता था वह आज बदल कर जाति गण मन हो गया है| भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भारत के सभी नागरिक मिलकर गणराज्य की स्थापना का संकल्प लेते हैं| लेकिन आज जिस तरह की  जातीय राजनीति खुलकर हो रही है, वह गणराज्य को जातिराज्य में बदलने जैसा प्रतीत होता है|

पांच राज्यों के चुनाव में सभी दलों द्वारा प्रत्याशियों की प्रारंभिक सूची जारी कर दी गई है| इन सूचियों में ना तो कोई दल और ना ही कोई मीडिया प्रत्याशियों की मेरिट के बारे में आम लोगों को बता रहा है, बल्कि सभी दल यह बताने में लगे हुए हैं कि किस जाति और किस वर्ग को कितने टिकट दिए गए हैं| क्षेत्रीय  दलों का आधार ही जातियां हैं| राष्ट्रीय दल भी क्षेत्रीय दलों के मुकाबले के लिए जाति तंत्र की राजनीति को कम प्रोत्साहित नहीं कर रहे हैं|

उत्तर प्रदेश में जाति तंत्र पूरी तरह से चुनाव को नियंत्रित कर रहा है| सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव जातिगत जनगणना  का वायदा कर जाति तंत्र को उभारने का अपना अंतिम अस्त्र भी चला चुके हैं| जातिगत जनगणना राज्य का विषय नहीं है| यह विषय केंद्र सरकार का है और वर्तमान में जातिगत जनगणना की कोई योजना देश में नहीं है| यदि इसे लागू करने पर विचार किया जाता है तब भी संविधान में संशोधन कर इसे आगे बढ़ाना पड़ेगा| ऐसा नहीं है कि अखिलेश यादव यह तथ्य नहीं जानते, लेकिन उन्हें तो चुनाव जीतने के लिए हथकंडा फेंकना है जो उन्होंने फेंक दिया है| भाजपा से गैर यादव पिछड़े वर्गों के कुछ नेता पार्टी छोड़कर सपा में शामिल हो गए हैं| सपा ने इसे अपनी बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानते हुए ऐसी जमावट शुरू की है जैसे उन्हें चुनाव में विजय ही मिल गई है|

अखिलेश यादव ने 2017  के चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था उस समय भी ऐसे ही दृश्य दिखाई पड़े थे,, जिसमें यह स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि भाजपा इस आंधी में उड़ जाएगी| लेकिन चुनाव परिणामों में उल्टा हुआ, भाजपा भारी बहुमत से सरकार बनाने में सफल हुई| 2022 के चुनाव में भी अखिलेश यादव जाति तंत्र को अपनी जीत का बड़ा आधार मान रहे हैं| लेकिन शिक्षित युवाओं के बीच जातिवाद की भावना अपने और देश के भाग्य के निर्णय के समय शायद काम नहीं करती| 2017 के  विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम ऐसा ही संदेश दे रहे हैं|

आजकल तो अगड़े में पिछड़े और पिछड़े में अति पिछड़े को भी अलग-अलग ढंग से राजनीतिक दल अपने पाले में करने के प्रयास में जुटे हुए हैं| कुछ राजनीतिक दल तो जातियों के नाम पर ही राजनीति कर रहे हैं| और यह छोटे छोटे दल राष्ट्रीय और बड़े दलों के साथ गठ्बन्धन का अवसर भी शायद इसीलिए पा जाते हैं क्योंकि इन दलों को ऐसा लगता है कि जातियों की पार्टियां उनके लिए लाभकारी रहेगी| पांच राज्यों के चुनाव में राज्य और राष्ट्र की मूलभूत समस्याओं पर सभी दल आंख मूंदे हुए हैं| शायद राजनीतिक दलों को यही उपयुक्त लगता है कि चुनाव धर्म जाति वर्ग के विमर्श पर हो जाएं तो राज्य के विकास के लिए उनकी सोच और पूर्व में किए गए कार्यों पर चुनाव में जवाब नहीं देना पड़े|

शिक्षा, चिकित्सा,  बेरोजगारी, आर्थिक समृद्धि और कृषि को लाभकारी धंधा बनाने, औद्योगिक विकास, गुड गवर्नेंस जैसे कितने महत्वपूर्ण विषय हैं, लेकिन इन विषयों पर चुनाव में चर्चा नहीं की जाती| महंगाई प्रत्येक नागरिक के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है लेकिन सभी दल सतही तौर से इस विषय पर अपनी बात कहके आगे बढ़ जाते हैं| राज्य के विकास के मुद्दों से हटकर जाति तंत्र के मामले में तो सभी दल जाती, उपजाति, गोत्र, वंश, पंथ और मजहब को चुनावी मुद्दा बनाते हैं| बुनियादी मुद्दों पर चुनाव में विमर्श नहीं होना जनतंत्र के लिए अच्छे लक्षण नहीं हैं| देश का कोई भी राज्य आज ऐसा नहीं है जहां आर्थिक स्थिति चरमराई नहीं है| चुनाव जिन पांच राज्यों मे है वहां भी आर्थिक दृष्टि से कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था ही चल रही है| आर्थिक समृद्धि सभी राजनीतिक दलों का मुख्य एजेंडा होना चाहिए, उसी से नागरिकों के जीवन में समृद्धि और आनंद भर सकता है, लेकिन कोई भी राजनीतिक दल चुनाव में इस पर बात नहीं करता|

चुनाव के समय जाति के आधार पर दलबदल भी भारतीय जनतंत्र के लिए चिंता का विषय है| जो नेता सरकार में 5 साल तक पदों पर बने रहे और सत्ता में सभी तरह की साधन सुविधाओं का लाभ उठाया उन्हें अचानक उन वर्गों के शोषण का ख्याल चुनाव के समय ही क्यों आता है| इससे तो यही लगता है कि नेताओं को किसी भी वर्ग के विकास या कल्याण से केवल उतना ही मतलब है जो उनको चुनाव जीतने में सहायक हो सके| जो नेता सरकार छोड़कर दूसरी पार्टियों में गए हैं,  ऊपरी तौर पर भले ही जाति और वर्ग के शोषण की बात करें, लेकिन शायद उनको सरकार में रहते हुए, उनके द्वारा अपने वर्ग या क्षेत्र के विकास के लिए किए गए काम बताने के लिए कुछ भी नहीं है| ऐसे नेता जाति आधारित दूसरे दल के साथ जुड़कर शायद  संभावना देख रहे हैं कि उस दल की जाति और उनकी जाति को मिलाकर फिर से उन्हें चुनाव जीतने में सफलता मिल जाये|

हमारा देश जातियों के समूह के रूप में नहीं बना है बल्कि यहां के प्रत्येक नागरिकों ने मिलकर इसे बनाया है| इसको जातियों के समूह  के रूप में उभारना जनतंत्र के साथ एक तरह का धोखा है, यह धोखा सभी राजनीतिक दल करते हुए दिखाई पड़ रहे हैं| समाज में जातियां हैं, और सदियों से हैं, लेकिन धीरे-धीरे सभी जातियां एक दूसरे पर निर्भरता के साथ  जीवन यापन की आदी हो गई हैं| एक दौर था जब ब्राम्हण कुछ जातियों के निशाने पर थे|  दलित आधारित राजनीति की शुरुआत ब्राह्मणों के विरोध से हुयी, लेकिन जब उन्हें लगा सत्ता तभी हाथ आएगी, जब ब्राह्मण साथ होंगे, तो फिर उन्होंने ब्राह्मणों का साथ लिया और सत्ता का सुख प्राप्त किया| उत्तर प्रदेश में आज ब्राहमण समाज की ताकत कम नहीं है| लेकिन पिछड़े वर्गों की कई जातियां बहुत अधिक प्रभावशाली भूमिका में हैं| उनके हाथ में राजनीतिक ताकत भी है| समाज में अति पिछड़े और अति गरीब जो लोग हैं उनकी टकराहट पिछड़े वर्गों की ऐसी ही ताकतवर जातियों से है| इसलिए पिछड़े वर्गों की राजनीति को प्रमुखता देने वाले दल शायद अति पिछड़े और गरीब लोगों का विश्वास जीतने में सफल ना हो सके, क्योंकि अति पिछड़े और गरीब लोग उन्हीं जातियों का अन्याय और शोषण अपने दैनिक जीवन में भुगत रहे हैं, जो राजनीतिक सत्ता पाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं|

राजनीतिक दलों द्वारा अपने फायदे के लिए उभारे जा रहे जाति तंत्र के कारण आज ऐसी स्थिति बन गई है कि सरकारों में प्रदेश के सभी लोगों का विश्वास नहीं होता| एक खास वर्ग या जाति ही सरकार के साथ होती है और बाकी जातियां चुनाव के बाद अपने आप को सरकार से डिस्कनेक्ट महसूस करती हैं| जातितंत्र  की बहुत बड़ी कीमत जनतंत्र को चुकानी पड़ रही है और भविष्य तो और ज्यादा भयावह लग रहा है| भारत का असली भाग्योदय तभी होगा, जब राजनीतिक दल, जाति तंत्र से ऊपर उठकर, जन गण मन की भावना से चुनावी समर पार करेंगे, उत्तर प्रदेश का मतदाता शायद देश का सबसे ज्यादा जागरूक मतदाता है| इसलिए यह विश्वास किया जा सकता है कि देश का मतदाता सही मायने में भारत भाग्य विधाता बनेगा|