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जनजातीय चेतना के नायक ही वास्तविक महानायक, अपनी धरा के लिए समर्पण का स्वर्णिम इतिहास -दिनेश मालवीय

सार

भारत की बहुरंगी संस्कृति में जनजातीय जीवन के रंग बहुत जीवंत और चटख हैं. प्रकृति की गोद में जन्में और पलने वाले ये लोग, प्रकृति की तरह सहज और सरल है. उन्होंने पर्वतों से दृढ़ता सीखी, तो नदियों से तरलता; फूलों से मुस्काना सीखा, तो झरनों से गाना; सिंहों से निर्भीकता सीखी, तो हिरणों से चपलता. यही कारण है कि जनजातीय लोग जहां बच्चों की तरह निश्छल होते हैं, वहीं शौर्य और वीरता में किसी से कम नहीं होते

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विस्तार

भारत की बहुरंगी संस्कृति में जनजातीय जीवन के रंग बहुत जीवंत और चटख हैं. प्रकृति की गोद में जन्में और पलने वाले ये लोग, प्रकृति की तरह सहज और सरल है. उन्होंने पर्वतों से दृढ़ता सीखी, तो नदियों से तरलता; फूलों से मुस्काना सीखा, तो झरनों से गाना; सिंहों से निर्भीकता सीखी, तो हिरणों से चपलता. यही कारण है कि जनजातीय लोग जहां बच्चों की तरह निश्छल होते हैं, वहीं शौर्य और वीरता में किसी से कम नहीं होते. जनजातीय इतिहास वीरता, शौर्य, देशभक्ति, आत्मगौरव, सत्यनिष्ठा और निश्छल जीवन की एक ऐसी अमिट गाथा है, जिसकी मिसाल कहीं और देखने को नहीं मिलती. छल-कपट उन्हें छूकर भी नहीं गया है.

भारत की आज़ादी की लड़ाई में देश के विभिन्न अंचलों के जनजातीय लोगों ने बहुत बढ़चढ़ कर भाग लिया. बिरसा मुंडा तो इतने बड़े जननायक हुए है, कि उन्हें लोग भगवान् कहते हैं. वे देवतुल्य माने जाते रहे हैं. भारत के ह्रदय-स्थल मध्यप्रदेश के आदिवासी नायक भी किसी से पीछे नहीं रहे. हमारे इन भाई-बहनों ने अपनी वीरता, बुद्धिमत्ता और देशभक्ति के बलपर अंग्रेजी हुकूमत के छक्के छुड़ा दिए. मध्यकाल में मध्यप्रदेश के गढ़ मंडला की वीरांगना रानी दुर्गावती की वीरता की आज भी मिसाल दी जाती है. उन्होंने उस समय के सर्वशक्तिमान बादशाह अकबर के सेनापति आसफ खां की विशाल फ़ौज का बहुत वीरता से मुकाबला किया. अपनी पराजय होती देख रानी ने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए स्वयं को कटार भौंककर खुद का बलिदान कर दिया. अकबर की इस ताकतवर फ़ौज का रानी दुर्गावती ने जिस बहादुरी से मुकाबला किया, उसकी गाथा इतिहास के पन्नों में सुनहरी अक्षरों में दर्ज है.

रानी दुर्गावती वीर ही नहीं, बल्कि लोककल्याण करने वाली योग्य शासक थीं. उन्होंने अपने राज्य में सिंचाई सुविधाओं के साथ ही, विकास के जो कार्य किये, वे आज भी मौजूद हैं. ब्रिटिश शासन काल में अंग्रेजों के अत्याचारों, अन्याय, अपने सामाजिक-धार्मिक जीवन पर उनके द्वारा किये गये कुठाराघात, सामाजिक-धार्मिक जीवन में बेजा दखलंदाज़ी और देश को आज़ादी दिलाने के लिए मध्यप्रदेश के जनजातीय नायकों ने ऐसा संघर्ष किया, कि ब्रिटिश सरकार की चूलें हिल गयीं. वे अपने देश को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए जी-जान से लडे और अपनी शहादत भी दी.

टांटिया भील - अंग्रेजों के लिए रोबिन हुड और अपने लोगों के लिए मामा टांटिया जनजातीय वीरों में ऐसे महावीर थे, जिनको निमाड़ अंचल में आज भी देवता की तरह पूजा जाता है. वह अंग्रेजों की संपत्ति लूटकर गरीब लोगों को बांटते थे. इसलिए उन्हें इन्डियन रोबिनहुड भी कहा जाता है. यह ख़िताब उन्हें खुद अंग्रेजों ने दिया था. मामा गरीब परिवारों की बेटियों की शादियाँ करवाते थे. इसी कारण लोग उन्हें प्यार से मामा कहते थे. वे आज भीवह  टांटिया मामा के नाम से ही विख्यात हैं. मामा निमाड़ अंचल के ऐसे महान लोकनायक हैं, जिनकी गाथाओं को अनेक लोकगीतों में भी पिरोया गया है.

खंडवा जिले मेंकी पंधाना तहसील के ग्राम बड़ौदा अहीर में उनका मंदिर और स्मारक है. यह उनका जन्म-स्थल है. उनका एक मंदिर भीकनगाँव तहसील के ग्राम गढ़ी कोटड़ा में भी है. उनके वंशज आज भी बड़ौदा अहीर में रहते हैं. ऐसा माना जाता है, कि उन्हें अलौकिक शक्तियां प्राप्त थीं. वे इतने चतुर और कुशल थे, कि उन्हें पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने दो हज़ार सैनिक लगाए, लेकिन वह उनके हाथ नहीं आते थे. वह देखते ही देखते बिजली की तरह उनकी आँखों से ओझल हो जाते थे. मामा आदिवासी समाज के आपसी झगड़ों को वह चुटकी बजाते हल कर देते थे. सब लोग उनकी बात मानते थे.

अंग्रेजों की दमनकारी शक्ति को उन्होंने बहुत कड़ी चुनौती दी. मामा ने अंग्रेजी हुकूमत के शोषण और दमन के खिलाफ जबरदस्त विद्रोह किया. लेकिन अफ़सोस, कि कुछ गद्दारों की मदद से 1889 में अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया और उन्हें फंसी दे दी गयी. ऐसी मान्यता है कि उनके शव को खंडवा रेल मार्ग पर पातालपानी स्टेशन के पास फैंक दिया गया था. आज भी रेल चालक इस जगह मामा को सलामी देने के लिए कुछ पल के लिए ट्रेन रोकते हैं. उनकी अमर गाथा जन-जन के मन में अब भी बसी है. उनके प्रति लोगों की वैसी ही श्रद्धा है, जैसी उस समय थी.

भीमा नायक-खज्जा नायक

देश की जंगे-आज़ादी में बढ़चढ़ कर भाग लेकर अंग्रेजों को नाकों चने चववाने वाले महानायकों में खज्जा नायक और भीमा नायक के नाम बहुत सम्मान से लिये जाते हैं. बड़वानी जिले के पंचपावली जंगल में रहने वाले भिलाला जनजाति के भीमा नायक और उनके साथी खज्जा नायक ने अपनी विद्रोही गतिविधियों से अंग्रेजों का जीना हराम कर दिया था. दोनों ने अंग्रेजी सेना के साथ जमकर लोहा लिया. भीमा को अंग्रेज़ किसी भी तरह काबू नहीं कर पा रहे थे. ब्रिटिश सरकार ने भीमा नायक को खबर भेजी, कि वह अपनी गतिविधियाँ रोक दें, तो उन्हें माफ़ कर दिया जाएगा. भीमा ने समर्पण भी कर दिया, लेकिन फिर अंतरात्मा की आवाज़ पर जल्दी ही फरार हो गए और फिर से विद्रोहियों से जा मिले.

भीमा को इसके बाद तीन बार आत्मसमर्पण का अवसर दिया गया, लेकिन भीमा ने इनकार कर दिया. दो अप्रेल 1867 जी अंग्रेजी पुलिस को बालकुआ से तीन मील दूर भीमा के होने का सुराग मिला. वहां भीमा अपनी झोपड़ी में सो रहे थे. सिपाहियों ने उन्हें दबोच लिया, लेकिन वह छूटकर भाग निकले. दुर्भाग्य से भागते समय उनका पैर एक पत्थर से टकरा गया और वह गिर गये. पुलिस ने उन्हें पकड़कर बंदी बना लिया. भीमा नायक को पोर्ट ब्लेयर और निकोबार में रखा गया,वहीं उनकी मृत्यु हो गयी. खज्जा नायक भी भीमा नायक के साथ निमाड़ और खानदेश में सक्रिय थे. खज्जा नायक से अंग्रेजों ने बार-बार आत्मसमर्पण के लिए कहा, लेकिन इस स्वाभिमानी वीर ने उनकी बात नहीं मानी. उनके साथ सैंकड़ों लोग थे. वह लगातार अंग्रेजों के विरुद्ध गतिविधियों में संलग्न रहते थे. लेकिन अफ़सोस, कि उनकी ह्त्या उनके ही एक साथी द्वारा कर दी गयी.

सीताराम कंवर

सीताराम कंवर भी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले एक प्रमुख जनजातीय नायक थे. उनकी अगुवाई में ही होलकर रियासत और बड़वानी रियासत में विद्रोह हुआ.इनके साथ रघुनाथ मंडलोई भिलाला भी थे. उन्होंने होल्कर के सैनिकों और सवारों को अपने साथ मिला लिया. उनकी गतिविधियों से अंग्रेज़ बहुत परेशान हो गये और उनकी जान के पीछे पड़ गए. उनके साथी रघुनाथ मंडलोई को कुछ समय बाद होल्कर रियासत के अधिकारियों ने पकड़ लिया. सीताराम कंवर 8 अक्टूबर 1958 को अंग्रेजों के साथ एक मुठभेड़ में शहीद हो गये.

शंकर शाह और रघुनाथ शाह

इन दोनों पिता-पुत्र ने अंग्रेजों के खिलाफ निडर होकर ज़ोरदार संघर्ष किया. शंकर शाह अंतिम गोंड राजा थे. गढ़ मंडला की वीरांगना रानी दुर्गावती के वंशज होने के कारण उनका लोग बहुत सम्मान करते थे. लिहाजा, विद्रोही गतिविधियों में लोग उनके साथ हो लिए. सन 1857 में जब जबलपुर में विद्रोह हुआ तो राजा शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह विद्रोही गतिविधियों के केंद्र बन गए. पुलिस ने दोनों को बंदी बना लिया. उन्हें 18 सितम्बर 1857 को सरेआम तोप के मुंह से बाँध कर उड़ा दिया गया. एक अँगरेज़ अधिकारी ने इस घटना पर दिए गये अपने विवरण में लिखा है, कि जब पिता-पुत्र को तोप के मुंह से बांधा गया, तो उनके चेहरे पर भय का कोई निशान नहीं था. उन्हें मौत देने का यह तरीका लोगों में दहशत पैदा करने के लिए अपनाया गया था.

मध्य प्रदेश में और भी अन्य जनजातीय नायक हुए, जिनका संघर्ष और बलिदान किसी भी तरह कम नहीं है. इनमें मानगढ़ के राजा गंगाधर गोंड, भूटगाँव के राजा महिपाल सिंह गोंड, मालगुजार सिंह गोंड, ढिल्लन सिंह गॉड, राजा उम्मेर सिंह गोंड, इमरत भोई उरपाती, सहारा भोई, झंका भोई, अमरू भोई, लोटिया भोई, टापरू भोई, इमरत भोई सैयाम, टूरिया की शहीद मुद्दे बाई सहित बहुत बड़ी संख्या में जनजातीय वीर शामिल हैं. इन सभी ने अंग्रेजों के साथ अपने स्तर पर जबरदस्त संघर्ष किया. इस तरह हम देखते हैं की मध्य प्रदेश के जनजातीय नायकों का देशभक्ति का जज़्बा किसीसे कम नहीं था. उन्होंने अपने और अपने देश के स्वाभिमान के लिए उस सत्ता के साथ निर्भीकता से संघर्ष किया, जिसके राज्य में सूरज नहीं डूबता था. उनकी लड़ाई सिर्फ अपने सामाजिक-आर्थिक हितों, अपने परिवार और बच्चों, ज़मीन और व्यक्तिगत हितों के लिए न होकर, अपने देश की माटी के स्वाभिमान और देश की स्वतंत्रता के लिए थी. इन महानायकों ने ब्रिटिश सत्ता के साथ जो संघर्ष किया वह देश की आजादी में उनका बहुमूल्य योगदान है. इस सभी जनजातीय वीरों को कोटिश: प्रणाम और नमन.