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 बहुत कुछ बदलेगा समान नागरिक संहिता से 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Tue , 14 Jul

सार

भारत में समान नागरिक संहिता पर विधि आयोग ने जैसे ही प्रक्रिया शुरू की, राजनीति फिर तेज हो गई है..!

janmat

विस्तार

समान नागरिक संहिता को लेकर देश में राजनीतिक हलचल तेज है। हमारा देश भारत वैसे भी विविधताओं का देश है। विश्वास, संस्कृति व परंपराओं की विविधता मूल में है। इस मुद्दे को लेकर राजनीति भी जमकर होती रही है। भारत में समान नागरिक संहिता पर विधि आयोग ने जैसे ही प्रक्रिया शुरू की, राजनीति फिर तेज हो गई है। समाज दो हिस्सों में बंटता दिख रहा है। एक पक्ष इसके समर्थन में है और दूसरा पक्ष इसका विरोध कर रहा है। दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जहां समान नागरिक संहिता जैसे कानून लागू हैं। इस सूची में विकसित और आधुनिक देश भी शामिल हैं।

इन देशों की लंबी सूची है। इनमें अमेरिका, आयरलैंड, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्किये, इंडोनेशिया, सूडान, मिस्र, जैसे कई देश शामिल हैं, जो समान नागरिक संहिता को मानते हैं। इन देशों में सभी धर्म के लोगों के लिए एक समान कानून होता है। ख़ास बात इन देशों में भारत की तरह  किसी विशेष धर्म या समुदाय के लिए उनका अपना कानून नहीं है।

यूरोप के कई ऐसे देश हैं, जो एक धर्मनिरपेक्ष कानून को मानते हैं। वहीं, इस्लामिक देशों में शरिया कानून को मानते हैं, वहाँ अन्य नागरिकों के लिए अलग कानून नहीं है। ऐसे देशों में सभी पर एक कानून ही लागू होता है।

इसके पूर्व भी विधि आयोग ने 2016 में समान नागरिक संहिता पर लोगों से राय मांगी थी। आयोग ने 2018 में अपनी रिपोर्ट तैयार की। उन्होंने जब रिपोर्ट जारी की तो उस वक्त कहा गया कि भारत में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता नहीं है। भारत के गोवा राज्य में समान नागरिक संहिता लागू है। गोवा को विशेष राज्य का दर्जा मिलने के साथ-साथ राज्य में समान नागरिक संहिता भी लागू है। संसद से गोवा को ऐसा अधिकार दिया गया था कि वह पुर्तगाली सिविल कोड लागू कर सकता है। गोवा में सभी धर्मों के लोगों के लिए एक समान कानून है। गोवा में शादी या तलाक कोर्ट या रजिस्ट्रेशन द्वारा ही कानूनी तौर पर मान्य होता है। 

गोवा को छोड़कर पूरे भारत में हिंदू, इस्लाम और ईसाई धर्म के लिए अलग-अलग कानून है। 

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अनुसार, समिति 30 जून के आसपास ड्राफ्ट को सरकार को सौंपने की तैयारी कर रही है। प्रदेश सरकार इसके आधार पर राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करेगी।

 

वैसे भाजपा के एजेंडे में शामिल इस मुद्दे को कांग्रेस समेत कई दल ध्रुवीकरण की कोशिशों के रूप में देख रहे हैं। विधि आयोग की हालिया पहल ने इस मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है। आयोग ने देश के हर नागरिक को इस बाबत अपने विचार प्रस्तुत करने का अधिकार दिया है। उल्लेखनीय है कि भारत का संविधान तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान भी समान नागरिक संहिता का मुद्दा खासी चर्चा में रहा था। तब भरोसा जताया गया था कि इस लोकतांत्रिक देश में कालांतर में समान नागरिक संहिता लागू करने को मूर्त रूप देने का अवसर आएगा। दरअसल, तब संविधान सभा के कई दिग्गज इसके पक्ष में थे, लेकिन भारतीय समाज की जटिलता और तत्कालीन संवेदनशील स्थिति के चलते इस पर निर्णायक फैसला नहीं हो सका था। 

स्वतंत्र भारत में कई बार संसद व विधानसभाओं में इस मुद्दे पर खूब चर्चा होती रही। अब इसी कड़ी में व्यापक आधार रखने वाले धार्मिक संगठनों की इस मुद्दे पर राय मांगी गई है। दरअसल, इस जटिल विषय पर समान संहिता बनाना ही अंतिम हल नहीं है, उसका क्रियान्यवन भी उतना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अलग-अलग धार्मिक समूहों को साथ लेकर आगे बढ़ना आसान भी नहीं होगा। फिर अगले साल होने वाले आम चुनाव व इस साल के अंत तक कई महत्वपूर्ण राज्यों के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर इस मामले के सरगर्म रहने के आसार हैं।A

सवाल विधि आयोग द्वारा इस जटिल मुद्दे पर सार्वजनिक विमर्श को लेकर दिए गए समय को लेकर भी है। कुछ लोगों का मानना है कि सारे देश में व्यापक विमर्श के बाद ही इस संवेदनशील मुद्दे पर आगे बात की जानी चाहिए। वैसे विपक्षी दल आरोप लगाते रहे हैं कि सत्तारूढ़ दल इस मुद्दे को ध्रुवीकरण के हथियार के रूप में प्रयोग कर सकता है। इस कयास की एक वजह यह है कि भाजपा के दो प्रमुख एजेंडे- राम मंदिर व अनुच्छेद 370 को हटाने के लक्ष्य हासिल किये जा चुके हैं। वहीं देश में यह बहस पुरानी है कि व्यक्तिगत कानून में व्याप्त विसंगतियों को दूर करके एक देश, एक कानून की अवधारणा को मूर्त रूप दिया जाये। 

वैसे किसी भी सभ्य समाज व लोकतांत्रिक देश में सभी नागरिकों के लिये समान कानून के प्रावधान एक आदर्श स्थिति है, लेकिन भारतीय समाज की कई तरह की जटिलताएं इसके मार्ग में बाधक बनी रही हैं। निस्संदेह, देश की एकता व सद्भाव का वातावरण भी हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। किसी भी सभ्य समाज में कानून का निर्धारण धार्मिक आधार के बजाय तार्किक व समय की जरूरत के हिसाब से ही होना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि समाज में बहुमत व अल्पमतों के हितों की रक्षा की जानी चाहिए।