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सरकार नहीं व्यापार का बोध कराती मुफ्तखोरी की घोषणाएं

सार

गलत नीतियों, जन-धन के अपव्यय और भ्रष्टाचार के कारण दुनिया के कई देश दिवालिया हो रहे हैं. भारत के कुछ पड़ोसी देशों में तो जीना दूभर हो गया है. पाकिस्तान में आर्थिक हालात आपातकाल जैसे बने हुए हैं. श्रीलंका में आर्थिक अराजकता के कारण तो राष्ट्रपति को देश छोड़कर भागना पड़ा था. आर्थिक अराजकता की जो सच्चाई बंद आंखों से भी देखी जा सकती है वह राजनेता खुली आंखों से भी क्यों नहीं देखना चाहते..!

janmat

विस्तार

भारत में मुफ्तखोरी की योजनाएं जिस तरह से लुटाई जा रही हैं, उसके दुष्परिणाम भावी पीढ़ी को भुगतने पड़ेंगे. इसमें कोई संशय नहीं है कि राजनीति में सत्य जैसे गायब सा होता जा रहा है और झूठ का बोलबाला है. कोई भी किसी से पीछे नहीं रहना चाहता. लक्ष्य सीधा और सपाट है कि सत्ता कैसे भी मिले. सत्ता भी सेवा के लिए नहीं बल्कि साधन के लिए जरूरत है. चाहे सरकारी पक्ष हो, चाहे विपक्ष हो, चुनाव के दृष्टिगत घोषणाओं का अंबार लोगों को लालच और प्रलोभन देकर सत्ता हासिल करने का खुला संघर्ष बन गया है.

मध्यप्रदेश में इस समय महिलाएं राजनीति का केंद्र बनी हुई हैं. राजनीतिक दलों को ऐसा लगता है कि महिलाओं को प्रभावित करके उनके वोट हासिल करना बहुत आसान है. सरकार ने 'लाड़ली बहना योजना' के माध्यम से महिलाओं को प्रभावित करने का प्रयास किया तो कांग्रेस ने एक कदम आगे बढ़कर महिलाओं को उनकी सरकार बनने पर 15 सौ रुपए महीने देने की घोषणा कर दी. योजनाओं की घोषणाएं और क्रियान्वयन की गति चुनाव के आसपास काफी तेज हो जाती है. वैसे तो राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों की विश्वसनीयता नहीं के बराबर बची है. चुनाव आयोग के पास चुनावी वचन पत्रों की पूर्ति के लिए कोई वैधानिक व्यवस्था नहीं है.

महिलाओं को हर महीने एक राशि मिले, इसमें किसी को कोई दिक्कत नहीं है लेकिन आजादी के 70 साल बाद देश और राज्यों की यह हालत बनी हुई है कि महिलाओं को ₹1000 या ₹1500 देने की बात करके राजनेता महिलाओं के जीवन में सुधार की कल्पना कर रहे हैं, इसे क्या कहा जाएगा? इसे केवल वोटों के लिए लालच और प्रभोलन के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता. 

नकद राशि कभी भी किसी के जीवन में बदलाव या सुधार का माध्यम आज तक नहीं बन सकी है. हर सरकार और हर दल में इस तरीके की योजनाएं लागू की जाती हैं लेकिन इनका दीर्घकालीन कोई प्रभाव नहीं पड़ता. केवल तदर्थ तौर पर लोगों को खातों में नगद राशि मिल जाती है और राजनीतिक दल और सरकार को वाहवाही मिल जाती है. उसके तात्कालिक नतीजे चुनाव में जीत हासिल करना ही होता है और यह लक्ष्य तो पूरा हो जाता है.

मध्यप्रदेश के पुराने इतिहास पर नजर डाली जाए तो चुनाव के पहले कोई न कोई ऐसी घोषणाएं होती हैं जो नगद रूप से लोगों को लाभ पहुंचाएं. बेरोजगारी भत्ता देने की घोषणाएं भी मध्यप्रदेश में पहले हुई हैं. उनको क्रियान्वित करने की सतही प्रयास भी किये गए हैं लेकिन आज मध्यप्रदेश में किसी भी व्यक्ति को कोई बेरोजगारी भत्ता नहीं मिल रहा है. छत्तीसगढ़ सरकार ने चुनाव के दृष्टिगत फिर से बेरोजगारों को भत्ता देने की घोषणा की है. यह घोषणा भी चुनाव के लिए केवल एक दांव ही मानी जा सकती है. इसका कोई भी दूरगामी प्रभाव देखने को नहीं मिलेगा.

राज्यों की वित्तीय स्थितियां  चिंताजनक ढंग से खराब हैं. सभी राज्य कर्ज़ों के जाल में फंसे हुए हैं. पूंजीगत व्यय लगातार कम होता जा रहा है. केवल दिखावे और पब्लिक को प्रलोभन देने की योजनाओं को प्राथमिकता दी जा रही है. कांग्रेस ने 2018 के चुनाव के पहले अपने वचन पत्र में वादा किया था कि पेट्रोल-डीजल सस्ता किया जाएगा. सत्ता आने पर टैक्स कम करना तो दूर बल्कि 5 परसेंट बढ़ा दिया गया था. वही पार्टी आज घोषणा कर रही है कि उनकी सरकार बनने पर महिलाओं को 15 सौ रुपए महीने दिए जाएंगे.

लोकतंत्र आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है. दलीय राजनीति लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय नुकसान करते हुए दिखाई पड़ रही है. कोई नेता विदेश में जाकर भारत के लोकतंत्र पर सवाल उठाता है तो कोई प्रलोभन और लालच के लिए सरकारी धन के अपव्यय को अपनी उपलब्धि के रूप में दिखाने में गौरव महसूस करता है. यह दोनों परिस्थितियां लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं कही जा सकतीं. लोकतंत्र की असली मालिक जनता आज मूकदर्शक बनकर राजनीति के तमाशे देखने के लिए मजबूर है. आज के हालात पर यह दोहा कितना चरितार्थ है

चीलबाज और गिद्ध सब घेरे हैं आकाश
कोयल, मैना शुकों का पिंजड़ा है अधिवास

राजनीति में हर व्यक्ति इसी संघर्ष में लगा है कि सत्ता पर उसी का कब्जा हो जबकि कार्यकाल कितना हो इसका कोई महत्व नहीं है. महत्व इसका है कि यह कार्यकाल कैसा हो और उसने लोकतंत्र को कितनी मजबूती और जनकल्याण को कितनी ईमानदारी से अंजाम दिया है. आज तो हालात ऐसे बने हुए हैं कि

 ‘लोकतंत्र में इस कदर फैली लूटमलूट
 दाम बुराई के बढ़े सच्चाई पर छूट’

हर राजनेता अपने को महान और दूसरे को कमतर बताने में लगा हुआ है. इसे लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि  

किया जाए नेता यहां अच्छा वही शुमार
सच कह कर जो झूठ को भी देते गले उतार