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राजनीति का आभूषण अहंकार, क्षमा इंसानी संस्कार

सार

भारत की संसद राहुल गांधी द्वारा माफी नहीं मांगने के कारण नहीं चल पा रही है. राहुल गांधी माफी नहीं मांगने पर अड़े हैं तो सत्ताधारी पक्ष माफी के लिए अमादा है. माफी-माफी के इस खेल में सदन नहीं चल रहा है. इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है कि सदन न चलने से जन-धन की कितनी बर्बादी हो रही है..!

janmat

विस्तार

लंदन में राहुल गांधी ने भारत के लोकतंत्र को लेकर जो भी बात कही थी उसका जो भी लोकतांत्रिक असर होना था वह तो हो ही चुका है. माफी मांगने से तो माफी मांगने वाले का सम्मान बढ़ता है. राहुल गांधी जब स्वयं अपना सम्मान बढ़ाने के लिए चिंतित नहीं हैं तो फिर विरोधियों को उनके सम्मान के लिए इतना चिंतित होने की क्या आवश्यकता है? अगर राहुल गांधी माफी मांग भी लेंगे तो उससे देश पर क्या प्रभाव पड़ेगा? लोगों के जीवन में उस माफी का क्या असर होगा?

राजनीति में माफी कोई नई बात नहीं है. कई बार तो राजनीतिक दल के नेता अपनी गलतियों के लिए सार्वजनिक रूप से जनता से माफी मांगते हैं. कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने भी माफी मांगी है. आजकल राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप का स्तर इतना गिरता जा रहा है कि अब तो अदालतों में भी माफी मांगने की परंपरा सी चल पड़ी है. हर राज्य में राजनीतिक नेताओं के बीच मानहानि के मुकदमे चल रहे हैं. कई मुकदमों में तो माफी मांग कर मामले को रफा-दफा किया गया है लेकिन कई मामले अभी भी चल रहे हैं.

माफी की मांग और माफी की जरूरत को देखते हुए यह विषय जनमानस में पनप रहा है कि हमारे समाज के आदर्श नेता ऐसी बातें क्यों कहते हैं जिससे कि माफी मांगने की जरूरत पड़े? कांग्रेस तो राहुल की माफी मांगने की बात को भी सावरकर से जोड़ दिया है. कांग्रेस ने ही ऐसा परसेप्शन बनाया है कि सावरकर ने अंग्रेजों से माफी मांगी थी. इस पर कई बार तथ्यात्मक बातें आ चुकी हैं लेकिन कांग्रेस इस तरह के अतीत के पन्नों को उलट कर न मालूम क्या साबित करना चाहती है? 

इतिहास में किसी ने माफी मांगी थी या नहीं मांगी थी, इसका आज के भारत पर क्या असर है? किसी भी वर्तमान नेता के परिवार या उसके पूर्वजों के कृत्यों से वर्तमान पीढ़ी को कलंकित या दोषी बताने का प्रयास क्या जायज कहा जाएगा? इतिहास में तो न मालूम कितनी घटनाएं हैं जिनमें राजा-महाराजाओं, स्थापित राजनीतिक परिवारों में ऐसे कृत्य किए गए हैं जिसके लिए जन धारणाएं आज भी बनी हुई हैं.

चाहे संसद हो या राज्यों की विधानसभा हो, कमोबेश हर दिन चर्चा में ऐसे वाक्य या शब्द निकल जाते हैं जिस पर नेता माफी मांग कर या खेद व्यक्त कर आगे बढ़ जाते हैं. संवाद के पवित्र मंच पर शब्दों और अपनी भाषा पर पकड़ एक बहुत बड़ी ताकत होती है लेकिन हर राजनेता की इन पर पकड़ हो ऐसा संभव नहीं होता. कई बार ऐसी परिस्थितियां बनती हैं और तत्काल खेद व्यक्त कर मामला निपटा दिया जाता है.

राहुल गांधी के माफी मांगने का जो मामला है वह इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण कहा जा सकता है क्योंकि सत्ताधारी पक्ष ऐसा मान रहा है कि उन्होंने विदेश में जाकर भारतीय लोकतंत्र का अपमान किया है. राजनीति में विकास और अर्थव्यवस्था के मुद्दे कम ही चर्चा में आ पाते हैं. अधिकांश मामले ऐसे ही मान-अपमान के चलते रहते हैं. उन पर ही लोकतंत्र की सारी ऊर्जा लगाई जाती है. 

राहुल गांधी ने क्या कहा, उससे जो भी परिस्थितियां देश में बनी, उसको देशवासियों ने महसूस किया. ऐसे राजनीतिक मुद्दों का यही हश्र होता है कि जनता के बीच नेता के बारे में एक धारणा विकसित होती है. राहुल गांधी के मामले में लंदन में दिए गए बयानों के पक्ष में जो धारणा बनी है वह धारणा बन चुकी है. लेकिन माफी के नाम पर देश के सदन को चलने नहीं देना देश के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है.

भारतीय संस्कृति में तो क्षमा व्यक्ति का आभूषण होता है. हमारे धर्म में माफी मांगने को मनुष्य का सबसे बड़ा गुण माना गया है. क्षमा वही मांग सकता है जिसमें अहंकार नहीं होगा. जब तक अहंकार प्रभावी रहेगा तब तक कोई भी माफी नहीं मांग सकता है. राहुल गांधी कोई नए राजनेता नहीं हैं. कई दशकों से संसद में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. माफी मांगना या नहीं मांगना उनका निजी मामला है लेकिन माफी मांगना कभी भी इंसान को ऊंचाई ही प्रदान करता है. 

भारतीय राजनीति आज अहंकार का शिकार होती दिखाई पड़ रही है. एक छोटा सा भी नेता अपने अहंकार में इतना डूबा होता है कि जन सामान्य से बहुत दूर दिखाई पड़ता है. राजनीति में अहंकार का कोई स्थान नहीं होना चाहिए. जो नेता अहंकार से दूर होता है वह लोकप्रियता की दृष्टि से जनता में सबसे ऊंचा स्थान पाता है. ऐसा नहीं है कि हमारे सामने उदाहरण नहीं हैं. बहुत सारे जन नेता हैं जिन्हें जनता में सम्मान और गरिमा के साथ देखा जाता है. 

भारतीय लोकतंत्र को अब माफी की राजनीति से आगे जाने की जरूरत है. अब भारतीय राजनेताओं को ऐसाआचरण पेश करने की जरूरत है कि माफी मांगने की या माफी की मांग की जरूरत ही न पड़े. भारतीय लोकतंत्र परिपक्वता के मामले में काफी आगे बढ़ गया है. अब देश राजनेताओं से इस परिपक्वता की अपेक्षा करता है. सेवा के इस पवित्र क्षेत्र में माफी और क्षमा प्रेम का अस्त्र माना जाएगा. अहंकार राजनीति में बहुत लंबे समय तक राजनीतिक जीवन को जीवित रखने में सहयोगी नहीं बन सकता है.