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चंदा और धूत जैसा हर कर्जे में जुड़ा होता है सूत 

सार

जो बैंक आर्थिक विकास और जन-धन के रखवाले माने जाते हैं, वही बैंक आज सरकारों के लिए बड़े सिरदर्द बने हुए हैं। मिलीभगत से जन-धन की कर्जे के रूप में कॉर्पोरेट के साथ बंदरबांट आर्थिक विकास को कमजोर कर रही है। सामान्य व्यक्ति को दस-बीस हज़ार रुपयों के कर्जे के लिए बैंकों में कई दिनों की मशक्कत करनी पड़ती है और कॉर्पोरेट घरानों के साथ सांठगांठ कर अरबों रुपए के कर्जे बाद में डूबत खाते में चले जाते हैं..!

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विस्तार

पहले ऐसा लगता था कि शायद कॉर्पोरेट घराने, धंधों में घाटे के कारण बैंकों के कर्ज नहीं चुका पाते लेकिन अब तो धीरे-धीरे इसकी परतें खुलने लगी हैं कि बैंक और कॉर्पोरेट घराने आपसी सहमति से बैंकिंग के पैसे पर ही धंधा करते हैं और दोनों की हिस्सेदारी भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रहती है। आईसीआईसीआई की पूर्व चेयरमैन चंदा कोचर को वीडियोकॉन को ऋण देने में की गई गड़बड़ियों के लिए गिरफ्तार किया गया है। उनके पति की भी  गिरफ्तारी हुई है। इसके साथ ही वीडियोकॉन कंपनी के मालिक वेणुगोपाल धूत भी सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किए गए हैं। 

बैंकों के साथ फ्रॉड देश के भविष्य के साथ फ्रॉड होता है। विलफुल डिफॉल्टर आज कॉर्पोरेट जगत का फैशन सा बन गया है। क़र्ज़ लेकर उसे वापस नहीं करने की भारी कीमत देश को चुकानी पड़ती है। ऐसे लोग अर्थव्यवस्था के गुनाहगार हैं। इन गुनाहगारों को सजा मिलने से भविष्य में गड़बड़ियों की संभावनाएं सीमित हो सकती हैं। 

राजनीति में कॉर्पोरेट घरानों की कर्जमाफी विलफुल डिफॉल्टर के मामलों को पक्ष-विपक्ष के बीच हथियार के रूप में उपयोग करने की प्रवृत्ति बनी हुई है। यह मर्ज बढ़ते बढ़ते यहां तक पहुंच गया है कि बैंकों का चलना मुश्किल हो गया है। रिजर्व बैंक आफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच सालों में दस लाख करोड़ की राशि बट्टे खाते में डाली गई है। सवाल यह है कि यह लोन किस सरकार में मंजूर किया गया था? इनकी वसूली क्यों नहीं हो पा रही है? इस तरह की डूबत खाते वाले कर्जों के कारण सबसे अधिक नुकसान बैंकों को होता है। 

बैंकों में ऐसी व्यवस्था है कि एनपीए में जितनी राशि होती है उतनी राशि बैंकों को अलग से रखनी पड़ती है। जब बैंकों का एनपीए बढता जाता है तो फिर उन्हें उसी अनुपात में राशि की व्यवस्था करनी पड़ती है। इसके कारण रोजमर्रा के उनके कामकाज के लिए राशि कम पड़ती है। ऋण देकर बैंकों को जो कमाई होती है वह भी कम होती जाती है और धीरे-धीरे बैंक पर संकट की स्थिति बनती है और बैंक की वित्तीय सेहत चरमरा जाती है।

बहुत सारे बड़े कर्जदार देश छोड़कर चले गए हैं। उनको देश में लाने की मशक्कत चल रही है लेकिन यह प्रक्रिया इतनी लंबी और कानूनी पेचीदगियों वाली होती है कि वास्तविक रिजल्ट आने में बहुत लंबा समय लगता है। बैंक प्रबंधन और कॉर्पोरेट घरानों के बीच अपवित्र गठबंधन को तोड़ना बहुत जरूरी है। 

भोपाल में पिछले दिनों एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरसंघचालक दत्तात्रेय होसबोले ने भी इस मामले को गंभीरता से रखा था कि एक आम आदमी को बैंकों से लोन लेने में कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और बड़े-बड़े लोग कर्ज लेकर मिलीभगत से जन-धन का दुरुपयोग करते हैं। यह स्थितियां किसी भी देश के लिए बहुत खतरनाक हैं। जब अर्थव्यवस्था ही चरमरा जाएगी तो फिर कोई भी व्यवस्था कैसे चल सकेगी?

भारतीय संस्कृति में कर्ज के एहसास और उसको उतारने की लंबी परंपरा है। इंसान के जीवन में जन्म के साथ ही कई ऋण आ जाते हैं। भारतीय संस्कृति में ऐसे ऋणों को उतारने का परम विचार और प्रक्रिया विद्यमान है। जन्म के साथ ही माता पिता, परिवार, समाज, राष्ट्र, प्रकृति का ऋण हर इंसान को चुकाना उसका दायित्व होता है। प्रकृति से हमें जो मिला है अगर हम उसे केवल लेते रहेंगे, देने की परंपरा का निर्वाह नहीं करेंगे तो वक्त के साथ कम ही होगी। हमारी संस्कृति में कोई भी कर्ज रखना पाप के रूप में देखा जाता है। आज भी ऐसे अनेक मामले मिल जाएंगे जहां कर्ज चुकाने के लिए व्यक्ति ने अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया हो। 

बैंकों में गड़बड़ियों के बढ़ते मामलों के कारण बैंकों के प्रति जन विश्वास भी प्रभावित हुआ है। आम लोगों में बैंकों के प्रति विश्वास की कमी सामान्य रूप से देखी जा सकती है। विलफुल डिफॉल्टर कई बार बैंक ऋण नहीं चुकाने की मानसिकता के कारण अपने उद्योगधंधों को घाटे में दिखा देते हैं। कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी चलती है कि बैंक ऐसे लोगों का मुकाबला करने से पिछड़ जाते हैं। 

भारत में राजनीतिक व्यवस्था 2014 में बदली है। उसके पहले एक ही सोच की शासन व्यवस्था चल रही थी। बड़े-बड़े बैंक घोटाले इसके बाद ही उजागर हुए हैं और उन पर कार्यवाही भी होती दिखाई पड़ी है। वर्तमान में जो व्यवस्था है उसे ही पुरानी गड़बड़ियों का भी हिसाब देना पड़ता है। आश्चर्यजनक स्थिति है कि जो लोग पुरानी गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार हैं वे ही वर्तमान व्यवस्था से सवाल करने से भी पीछे नहीं। यही प्रजातंत्र की खूबसूरती कही जाएगी।

वित्तीय मामलों में वैसे तो राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का कोई बहुत अधिक मतलब होता लेकिन इसका प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। खजाने का काम हमेशा बहुत ही ईमानदार और विश्वसनीय हाथों में रखा जाता है। बैंकों में जिस तरह के घोटाले सामने आए हैं उससे तो ऐसा लगा कि बैंकों की नियुक्तियों में इसका ध्यान पहले शायद नहीं रखा गया है। 

बैंकों पर बड़े पदों पर बैठे लोग व्यक्तिगत स्वार्थ और भ्रष्ट आचरण से पैसा कमाई करने में जुटे हुए हैं। बैंकों पर भरोसा शायद उनकी प्राथमिकता नहीं है। बैंकों के फायदे से ज्यादा उन्हें अपने फायदे देखने की बुरी आदत लग गई है। बैंकों में भ्रष्टाचार पहले लोग सोचते भी नहीं थे लेकिन अब तो भ्रष्टाचार के मामले इतने बढ़ गए हैं कि इन्हें अगर भ्रष्टाचार का बैंक की कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।