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कांग्रेस की समस्या, बिना मतलब तपस्या

सार

कांग्रेस का 85वां राष्ट्रीय अधिवेशन बदलाव के लिए नहीं लेकिन कुछ आकर्षक डायलॉग के लिए याद किया जाएगा. अधिवेशन में भारत जोड़ो यात्रा के अनुभवी कांग्रेस के नए पॉलीटिकल गुरु राहुल गांधी ने जो संदेश दिए हैं वह बदलाव के लिए नहीं बल्कि पार्टी की आत्मिक शांति के लिए ज्यादा प्रतीत हो रहे हैं.

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विस्तार

विरोधियों को सत्ताग्रही और कांग्रेस को सत्याग्रही स्थापित कर राहुल गांधी ने सत्ता को जहर बताने के अपने पुराने अनुभवों को ही दोहराया है. जब सत्ता की जरूरत ही नहीं है फिर सुंदर और सुशील चेहरे को खिचड़ी दाढ़ी से ढककर राजनीतिक परिपक्वता बताने की भी क्या जरूरत है? भारत जोड़ो यात्रा को तपस्या कहकर उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा को आध्यात्मिक रंग देने का प्रयास किया है लेकिन राजनीतिक हकीकत का मुकाबला राजनीति से ही हो सकता है. इसके लिए इमोशनल स्पीच छवि सुधार में तो काम आ सकती है लेकिन मत पेटियां भरने के लिए मजबूत संगठन और बूथ स्तर तक पार्टी की सक्रियता जरूरी है.

यह महाधिवेशन परंपरागत कमजोरियों को दूर कर सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में कोई नई पहल करने में सफल नहीं हो सका है. कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर और राज्यों में संगठन के जो हालात बने हुए हैं, कमोबेश उन्हीं बातों को जारी रखा गया है. जो भी संकल्प महाधिवेशन में पारित किए गए हैं उनमें निकले पॉलीटिकल मैसेज कांग्रेस को दूरगामी रूप से लाभ पहुंचाते हुए दिखाई नहीं पड़ रहे हैं.

कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र लंबे समय से विवाद का विषय बना हुआ था. ऐसा माना जा रहा था कि इस महाधिवेशन में पार्टी की सर्वोच्च निर्णायक इकाई सीडब्ल्यूसी के चुनाव हो सकते हैं लेकिन पार्टी ने लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत से ही किनारा कर लिया.

कांग्रेस पूरे देश में सिमटती जा रही है. राज्यों में अनुशासनहीनता और गुटबाजी को रोकने के कोई प्रयास नहीं किए जा सके हैं. विचारधारा के स्तर पर भी कांग्रेस की दुविधा इस महाधिवेशन से बढ़ती हुई दिखाई पड़ रही है. कांग्रेस अपनी सेकुलर इमेज पर आगे बढ़ने का दिखावा भले ही करती हो लेकिन सॉफ्ट हिंदुत्व और धर्म की राजनीति को आगे बढ़ाने वाले राज्यों के क्षत्रपों को बढ़ावा देकर कांग्रेस अपनी मूल विचारधारा से भटकती दिखाई पड़ी है.

रायपुर में संपन्न इस महाधिवेशन में राज्यों में कांग्रेस के बीच उभरी गुटबाजी भी साफ़ देखी गई है. इस महाधिवेशन की स्थिति भी वैसी ही दिखाई पड़ी जैसे राज्यों में कांग्रेस के संचालन की स्थिति दिखाई पड़ रही है. राज्य के क्षत्रप अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस पर कब्जा किए हुए हैं. विरोधियों की आवाज को दबाया जाता है. राजस्थान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.

जनता में लोकप्रिय युवा चेहरे सचिन पायलट कांग्रेस आलाकमान के समर्थन के बाद भी राजस्थान में अपना स्थान हासिल करने में लगातार असफल हो रहे हैं. यह असफलता सचिन पायलट से ज्यादा कांग्रेस आलाकमान की मानी जाएगी. जब पार्टी में ऐसा कोई तंत्र ही नहीं बचा है जो राज्यों की स्थितियों और हालात की वास्तविकता को समझ कर कठोर निर्णय ले सके तो पार्टी में सुधार कैसे होगा? इसी तरह के हालात अधिवेशन में भी बने रहे. कोई भी कठोर फैसले नहीं लिए गए. जो भी संकल्प पारित किए गए हैं उन सभी में बीजेपी की सक्सेस स्टोरी के रास्ते का ही ध्यान रखा गया है.
 
युवाओं को पार्टी पदों पर 50% आरक्षण देने का संकल्प इस महाधिवेशन में भी पारित किया गया है. इसके पहले उदयपुर में भी इसी तरह के प्रस्ताव पास किए गए थे. अब तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया. रायपुर अधिवेशन के बाद भी हालात जस के तस बने रहेंगे. दलित और आदिवासियों को पार्टी में रिजर्वेशन की बात आजादी के इतने साल बाद कांग्रेस शायद इसलिए कर रही है क्योंकि बीजेपी ने दलित और आदिवासी दोनों वर्गों से भारत का राष्ट्रपति बनाने का साहसिक कदम उठाया है. पहले दलित वर्ग से रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाया गया और अब आदिवासी वर्ग की द्रौपदी मुर्मू मोदी सरकार में भारत की राष्ट्रपति बनी हैं. 

दलित-आदिवासी और महिलाओं को बीजेपी ने गवर्नेंन्स में भागीदारी बढ़ाकर जो ढांचा तैयार किया है, उसी के जवाब में कांग्रेस ने पार्टी संगठन के पदों में इन वर्गों के आरक्षण का संशोधन प्रस्ताव पारित किया है. सामाजिक न्याय की दिशा में जातीय राजनीति की पुरानी शैली अब लगभग समाप्त हो चुकी है. सामाजिक न्याय की अवधारणा ने नया स्वरूप धारण कर लिया है. कांग्रेस को पार्टी में आरक्षण देने से कोई खास लाभ होने की संभावना नहीं है.

2024 में लोकसभा चुनाव के लिए विरोधी दलों की एकता के संबंध में भी कांग्रेस महाधिवेशन में कोई स्पष्ट दृष्टिकोण लेने में सफल नहीं रही है. जिस भाषा और संकेतों में विपक्षी एकता के लिए प्रस्ताव पारित किया गया है, उसके यही निहितार्थ समझे जा रहे हैं कि कांग्रेस शायद विपक्षी दलों की एकता से ज्यादा अपने विस्तार को महत्व देना चाहती है. कांग्रेस ने पूर्व में जब भी किसी राजनीतिक दल के साथ गठबंधन किया है उसे नुकसान उठाना पड़ा है. उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में चुनावी गठबन्धनों के कारण ही आज कांग्रेस राज्य में अपने सबसे बुरे दौर में पहुंच गई है. 2023 में होने वाले राज्यों के चुनावों में भी कांग्रेस में कोई चुनावी रणनीतियों की कोई पहल महाधिवेशन में नहीं दिख सकी है.

जिन राज्यों में चुनाव होने हैं उनमें कर्नाटक, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान प्रमुख हैं. इन सभी राज्यों में कांग्रेस के नेताओं में गुटबाजी चरम पर है. महाधिवेशन चुनावी राज्यों में नेताओं के बीच तालमेल और स्पष्ट कार्य विभाजन तथा युवा नेताओं को नेतृत्व देने की रणनीति को अंजाम देने में असफल रहा है. वही पुराने घिसे-पिटे और उबाऊ चेहरों पर ही दांव लगाने की रणनीति कांग्रेस की ओर से अपनाई जा रही है.

ऐसा कहा जाता है कि कांग्रेस विरोधी दल से नहीं हारती बल्कि कांग्रेस को कांग्रेस ही हराती है. सभी चुनावी राज्यों में कमोबेश यही हालात दिखाई पड़ रहे हैं कि कांग्रेस ही कांग्रेस के खिलाफ खड़ी दिख रही है. इन परिस्थितियों को सुधारने की कूबत शायद अब कांग्रेस में नहीं बची है. इसलिए ऐसी रणनीति अपनाई जा रही है कि जैसा चल रहा है वैसा ही ठीक है. जो काबिज है, उसी का समर्थन करो. चुनाव में कुछ मिल गया तो अच्छा है, नहीं मिला तो कम से कम इस आरोप से तो बचा जा सकेगा कि हमने कोई नया प्रयोग किया ही नहीं.
 
अरबी भाषा में राहुल का अर्थ यात्री होता है. राहुल गांधी को भारत जोड़ो यात्रा तपस्या लगती है. उन्होंने इससे बहुत कुछ सीखा है और फिर से यात्रा का पार्ट -2 शुरू किया जा रहा है. यात्रा हमेशा अच्छी होती है लेकिन अगर यात्रा के अनुभवों को सही परिप्रेक्ष्य में स्वीकार और क्रियान्वित करने की कोशिश की जाए तब ही यात्रा का कोई लाभ होता है. कांग्रेस संगठन में भारत जोड़ो यात्रा के पहले जो हालात थे वही हालात आज भी बने हुए हैं. जब भारत जोड़ो यात्रा के अनुभवों को पार्टी संगठन और नेताओं में एकजुटता और अनुशासन के लिए उपयोग ही नहीं किया जाएगा तो यात्रा के अनुभव का क्या लाभ होगा?

कांग्रेस द्वारा आंदोलन की जो रणनीति तय की जाती है वह जनता से जुड़ी हुई नहीं होती. आंदोलन का स्वरूप मात्र सक्रियता दिखाने के उद्देश्य से होता है. कांग्रेस के आंदोलनों को मीडिया में उतना ही स्थान मिल जाता है, जनता में कोई भी सार्थक संदेश देने के लिए कांग्रेस कोई बड़ा आंदोलन करने में अब तक सफल नहीं हो सकी है. महाधिवेशन में कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष मलिकार्जुन खडगे की लीडरशिप केवल रस्म अदायगी ही दिखाई दी वास्तव में पूरी कांग्रेस अधिवेशन में गांधी परिवार, सोनिया-राहुल और प्रियंका गांधी के इर्द-गिर्द ही घूमती रही.

कांग्रेस देश की जरूरत है. कांग्रेस को बदलना होगा. केवल डायलॉग से कांग्रेस की फिल्म सफल हो जाएगी ऐसा नहीं लगता है. कांग्रेस को विचारधारा की दुविधा को भी दूर करना होगा. एक तरफ कांग्रेस सॉफ्ट हिंदुत्व पर जाना चाहती है और दूसरी तरफ मनुवाद का विरोध करना चाहती है. केवल माइनॉरिटी पॉलिटिक्स कांग्रेस के भविष्य को सवारने में सक्षम नहीं दिखाई पड़ती. वैसे भी माइनॉरिटी वोट बैंक पर क्षेत्रीय दलों ने कब्जा कर लिया है. कांग्रेस को स्वयं को रिइन्वेंट करने की जरूरत के साथ घिसे-पिटे चेहरों को आराम देकर युवा और ताजगी भरे चेहरों को आगे लाने की जरूरत है.