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खुलती करप्शन फाइल्स, भावी पॉलीटिकल लाइफ स्टाइल

सार

बीजेपी और कांग्रेस के बीच करप्शन पर वार निर्णायक दौर में पहुंचता दिखाई पड़ रहा है. करप्शन फाइल्स के रूप में ‘कांग्रेस फाइल्स’ और ‘अडानी शेल कंपनीज’ वेब सीरीज खूब चल रही है. कांग्रेस की करप्शन फाइल्स के कई एपिसोड सोशल मीडिया पर आ चुके हैं. यह एपिसोड बीजेपी की ओर से बनाकर पेश किए जा रहे हैं. कांग्रेस फाइल्स के एपिसोड के लिए तो इंतजार भी नहीं करना पड़ रहा है हर दिन नए एपिसोड लोड हो रहे हैं. कांग्रेस ने अडानी शेल कंपनी वेब सीरीज का केवल टाइटल ही पेश कर सकी है. अभी तक पूरा एपिसोड आना बाकी है.

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विस्तार

जब भी भारत-पाकिस्तान के बीच में युद्ध या युद्ध जैसे हालात होते हैं तो देश सारी आंतरिक समस्याओं को भूल कर एकजुट खड़ा हो जाता है. देश ऐसी एकजुटता की भ्रष्टाचार के खिलाफ भी मांग कर  रहा है. राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी और कांग्रेस दो ही दल हैं जो सरकार बनाने के दावेदार माने जाते हैं. किसी भी शुभ काम के लिए शुरुआत मंगलाचरण से होती है. भ्रष्टाचार को मिटाने के इस शुभ काम का मंगलाचरण मोदीचरण के साथ चालू हुआ है. अभी मोदी के प्रधानमंत्री के दो कार्यकाल पूरे होने में एक साल का समय बाकी है लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध की राजनीति आर-पार पहुंच गई दिखाई पड़ रही है.

युद्ध में दो पक्ष होते हैं. भ्रष्टाचार के युद्ध में भी वैसे तो अलग-अलग देखा जाए तो दो ही पक्ष होते हैं. भ्रष्टाचार का आरोप और जांच-दंड की प्रक्रिया एवं एजेंसी. भ्रष्टाचार पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नया नहीं है लेकिन अब हालात निर्णायक युद्ध के करीब दिखाई पड़ रहे हैं. राजनीतिक दलों के बीच एकता का फेविकोल और बिखराव की धार भ्रष्टाचार बना हुआ है. 

लोकतांत्रिक सरकारों के हिस्सेदार रहे या वर्तमान में हिस्सेदार राजनीतिक दलों ने देश की सर्वोच्च अदालत में भ्रष्टाचार के मामलों में जांच एजेंसियों की कार्यवाही पर आपत्ति करते हुए याचिका लगाई है. भारत में सत्ता में अधिकारों का दुरुपयोग और राजनीतिक दलों के विरोधियों को टारगेट करने के मामले पहले भी आते रहे हैं लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था ने कभी भी किसी निर्दोष को दंड का भागीदार नहीं बनने दिया है. भ्रष्टाचार की जांच ही यदि शुरू नहीं होगी तो फिर भ्रष्टाचार मिटाने का अंतिम लक्ष्य कैसे पूरा होगा? 

यह मान भी लिया जाए कि सत्ताधारी पार्टी राजनीतिक विरोधियों को टारगेट करने के लिए एजेंसी का उपयोग कर रही है तो भी मूल मुद्दा भ्रष्टाचार के मामले हैं. जब मामला ही नहीं होगा कोई कैसे जांच एजेंसी का उपयोग या दुरुपयोग करेगा? लोकतंत्र में सत्ता कभी स्थाई नहीं होती इसलिए संवैधानिक एजेंसियां को प्रतिबंधित करने के प्रयास स्वीकार नहीं किए जा सकते.

कांग्रेस और राहुल गांधी ने उद्योगपति गौतम अडानी से प्रधानमंत्री के रिश्तों को लेकर अडानी की प्रगति और विकास को राजनीतिक रूप से जोड़ने की कोशिश की है. उनके द्वारा बार-बार सवाल उठाया जा रहा है कि अडानी की शेल कंपनियों में 20 हज़ार करोड़ रुपए किसके हैं? अगर राहुल गांधी को यह पता है कि किसके हैं तो फिर इंतजार किस बात का करना? उन्हें तथ्य और प्रमाण के साथ इसे उजागर कर देना चाहिए. 

भारत में लोकतंत्र के इमोशन के साथ खेलते हुए राजनैतिक उपलब्धि हासिल करने का इतिहास रहा है. बोफोर्स के मामले में राजीव गांधी के साथ उन्हीं की पार्टी के एक नेता ने इसी तरीके का इमोशनल कार्ड यूज किया था. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कभी भी बोफोर्स पर सीधा आरोप नहीं लगाया था. केवल इसमें दलाली की बात उछाल कर ऐसा राजनीतिक माहौल बनाने में सफलता हासिल की थी कि इस मामले में भ्रष्टाचार हुआ है. 

गांधी परिवार ने ऐसी परिस्थिति को भोगा है. बिना तथ्यों के इमोशनल आधार पर किसी की छवि को खराब करने के दर्द का गांधी परिवार बखूबी भुक्तभोगी है. वहीं जिन बोफोर्स तोपों में ख़रीदी में भ्रष्टाचार के मुद्दे ने देश की सियासत को बदल दिया था वही बोफोर्स तोप सेना का गौरव बनी हुई हैं. इन तोपों ने कारगिल युद्ध में दुश्मन के दांत खट्टे करने में अहम भूमिका निभाई थी.  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों बहुत गंभीर बात कही है कि उनकी छवि को खराब करने के लिए कुछ लोगों द्वारा सुपारी ली गई है. मोदी की अच्छाइयां और कमियां राजनीतिक मुद्दा हो सकती हैं लेकिन जिस एक बात पर देश में आम सहमति है वह है पीएम मोदी की ईमानदारी. नरेंद्र मोदी को भ्रष्टाचार से जोड़ने की जब-जब कोशिश की गई है तब तक उसका उल्टा असर आरोप लगाने वाले पर ही पड़ा है. किसी उद्योगपति से या किसी भी व्यक्ति से रिश्ता होना उसकी प्रगति या उसकी किसी भी गलती के लिए कैसे जिम्मेदार माना जा सकता है?

अडानी के जो भी वित्तीय मामले हैं, उनकी जांच सुप्रीम कोर्ट में हो रही है. सच्चाई सामने आएगी लेकिन इशारे और इमोशनल पॉलिटिक्स की राजनीति किसी के व्यक्तित्व और छवि को धूमिल करने के लिए उपयोग करना राजनीतिक रूप से फायदेमंद नहीं हो सकता.

बीजेपी द्वारा ‘कांग्रेस फाइल्स’ में यूपीए सरकार के समय हुए घोटालों को सिलसिलेवार बताया जा रहा है. इस वेब सीरीज का टैगलाइन है ‘कांग्रेस मतलब करप्शन’. कोयला घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला, 2G घोटाला, पेंटिंग की खरीदी के संबंध में किए गए घोटाले के एपिसोड आ चुके हैं. विभिन्न चैनलों और मीडिया में इनको दिखाया और प्रकाशित किया गया है.

कांग्रेस की ओर से इन एपिसोड पर उनका पक्ष देने वाला एपिसोड सोशल मीडिया में दिखाई अब तक नहीं पड़ा है. कोई भी घर कितना बड़ा क्यों ना हो लेकिन उसके अंदर की सुंदरता उसमें लगे पत्थर और टाइल्स से दिखाई पड़ती है. इसी प्रकार किसी भी सरकार में ‘करप्शन फाइल्स’ उस सरकार की नीति नियत और कर्म को बताते हैं. भ्रष्टाचार के मामले में चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष हो, बिना तथ्यों और प्रमाण के आरोप-प्रत्यारोप के लिए आगे नहीं बढ़ना चाहिए. इससे ना केवल निजी व्यक्ति की छवि खराब होती है बल्कि लोकतंत्र बदनाम होता है.

भ्रष्टाचार पर प्रतिबद्धता के साथ वार करने वाले जिस तरह के कदम उठते हुए दिखाई पड़ रहे हैं उससे यह भरोसा मजबूत हो रहा है कि भारतीय लोकतंत्र की भावी पॉलीटिकल लाइफ स्टाइल ‘करप्शन फाइल्स’ से अलग होगी.