व्यक्ति का कैरेक्टर और उसका प्रोफेशन चलते साथ-साथ हैं लेकिन परिणामों में उनका संबंध स्थापित करना नामुमकिन सा होता है. राजनीति और राजनीतिज्ञों के कैरेक्टर में साम्य स्थापित नहीं किया जा सकता..!!
राज की नीति का मतलब है कि विचारधारा और नीतियों पर चर्चा हो लेकिन आजकल राजनेताओं के चरित्र पर हमले हो रहे हैं. वर्तमान ही नहीं अतीत के राजनेताओं को भी निशाना बनाया जा रहा है. संसद में ही प्रकाशित पुस्तकों के हवाले से पूर्व प्रधानमंत्रियों के केरैक्टर पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं.
राजनीति परिणाम से ज्यादा प्रदर्शन पर सिमटती जा रही है. काम, क्रोध, मद, लोभ मानवीय स्वभाव है. इससे कोई अछूता नहीं है, लेकिन राजनेता का आंकलन उसकी नीतियों और परफॉर्मेंस से होना चाहिए उसके कैरेक्टर पर सवाल राजनीति के चरित्र को प्रभावित करता है.
भारत सरकार ने AI के नए नियम बनाए हैं. कंपनियों को AI कंटेंट पर लेबल लगाना होगा. तीन घंटे में डीपफेक पोस्ट हटाने होंगे. यह बताना होगा कि अपलोड कंटेंट AI से बना है या नहीं. डीपफेक का खेल ज्यादातर राजनीति में अपने विरोधी को बदनाम करने के लिए किया जाता है. डीपफेक का दौर तो अभी चालू हुआ है लेकिन बदनाम करने का उपक्रम तो राजनीति की शुरुआत से ही जुड़ा हुआ है.
संसद-विधानसभाओं में ऐसे आरोप लगाए जाते हैं जो कभी भी न्यायिक प्रक्रिया में साबित नहीं हो पाते हैं. ऐसे आरोपों का लक्ष्य भी राजनीतिक लाभ ही होता है. ऐसे आरोप परसेप्शन बनाते बिगाड़ते हैं. डीपफेक पर कानून भी इसी तरह प्रभावहीन साबित हो सकता है जैसे राजनीतिक क्षेत्र में आरोप-प्रत्यारोप साबित होते हैं.
इस तरह की कोई भी सूचना जब प्रचारित प्रसारित की जाती है तो उसका उद्देश्य तात्कालिक लाभ होता है. अगर कोई इससे प्रभावित होता है तो उसे कानून के अंतर्गत मुकाबला करना होगा. कानूनी प्रक्रिया इतनी जटिल और लंबी है कि जब तक निर्णय आएगा तब तक आरोपों से जो नुकसान होना है वह हो चुका होगा. तीन घंटे में डीप फेक वीडियो-टेक्स्ट हटा भी लिया जाए तो इतने में भी वह कंटेंट कितना वायरल या डाउनलोड हो गया होगा यह पता करना कानूनी प्रक्रिया में लगभग असंभव है.
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और वक्तव्य हमेशा दोहरा अर्थ निकालते हैं. कहा कुछ जाता है और उसको सर्कुलेट कुछ इस ढंग से किया जाता है कि मूल तत्व ही भटक जाता है. संसद में राहुल गांधी द्वारा पूर्व सेना प्रमुख की अप्रकाशित किताब पर जो विवाद शुरू हुआ था वह कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्रियों के चरित्र पर हमले तक पहुंच गया है. कुछ प्रकाशित और कुछ प्रतिबंधित पुस्तकों का सदन में हवाला दिया गया अब तो सदन परिसर में ऐसे पोस्टर दिखाए जा रहे हैं जिनकी प्रमाणिकता साबित करना किसी के लिए भी संभव नहीं है. यह भी कोई सामान्य सांसद नहीं बल्कि केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह कर रहे हैं पंडित जवाहरलाल नेहरू के फोटो वाले पोस्टर प्रदर्शित करते हुए.
यूपीए सरकार में घोटाले के जितने आरोप भाजपा ने लगाए गए थे परसेप्शन में तो उससे लाभ हुआ. केंद्र में सरकार बनाने में सफलता मिली लेकिन कानूनी रूप से वे घोटाले साबित नहीं किया जा सके. किसी को सजा भी नही हुई. अमेरिका और इंडिया की ट्रेड डील पर भी विपक्षी दल यही कह रहे हैं कि भारत को अमेरिका के सामने गिरवी रख दिया गया है. बजट चर्चा में राहुल गांधी तो यहां तक कह रहे हैं कि भारत माता को बेच दिया गया है. किसानों के हितों को गिरवी रखा गया, देश के डेटा और एनर्जी सुरक्षा का सौदा किया गया.
राहुल अपने भाषण में कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी डरे हुए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति ने उन पर न मालूम किन कारणों से ऐसा शिकंजा कैसा है कि वे भारत के हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं, राहुल का पूरा भाषण परिणाम से ज्यादा प्रदर्शन पर केंद्रित दिखा है. उन्होंने जो आरोप लगाए वो कभी भी प्रमाणित नहीं किये जा सकते. पीएम डरे हुए हैं इसका क्या प्रमाण हो सकता है. अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने भारत सरकार ने सरेंडर कर दिया, यह भी डीप फेक कंटेंट जैसा ही है.
राजनीतिज्ञों की जिम्मेदारी है कि वे बिना तथ्य और प्रमाण के साथ कोई भी बात सार्वजनिक रूप से नहीं रखें. जब UPA सरकार में अमेरिका से न्यूक्लियर डील हुई थी तब भी लेफ्ट जैसे सहयोगियों ने कांग्रेस पर भारत को गिरवी रखने का आरोप लगाया था.
आलोचना राजनीतिक दलों के विचारों और उनके काम की होनी चाहिए. निजी कैरक्टर को राजनीति का विषय बनाया जाना राजनीति के चरित्र को ही नीचे ले जाएगा. व्यक्ति तो व्यक्ति होता है वह चाहे छोटा हो चाहे बड़ा हो. उसका कैरेक्टर उसके निजी आचरण का विषय है.
अतीत का जीवन में कोई महत्व नहीं होता लेकिन राजनीति में अतीत महत्वपूर्ण रोल अदा करता है. भारत में वर्तमान से ज्यादा अतीत की राजनीति हो रही है. वर्तमान पर ही सवाल और वर्तमान का ही जवाब होना चाहिए लेकिन वर्तमान में तो कोई रहना ही नहीं चाहता, या तो वह अतीत पर टिका रहता है या भविष्य का सपना दिखाने में जुटा रहता है.
डीप फेक कंटेंट के पीछे भी राजनीति की डीपफेक स्ट्रेटजी ही ज्यादा काम करती है. नियमों में सुधार कितना भी कर लिया जाए जब तक राजनीति में शुचिता के लिए हर किरदार रोल अदा नहीं करेगा तब तक कोई सुधार नहीं हो सकता जितने ही कानून बनाये जा रहे हैं उतनी ही परिस्थितियां भ्रम जाल की बढ़ती जा रही है.
राजनीति अपने हर टारगेट में सत्ता पाने की कोशिश करती है इसके लिए डीपफेक भी अगर हथियार बनता है तो यही राजनीति है. वैचारिक ईमानदारी के लिए सबसे पहले राजनीतिक जगत को बदलना होगा. नियम, टेक्नोलॉजी और आम लोगों में बदलाव का तभी कोई प्रभाव होगा.