• India
  • Mon , Jan , 26 , 2026
  • Last Update 04:23:PM
  • 29℃ Bhopal, India

84 महादेवों की यात्रा: दसवाँ पड़ाव, कर्कोटेश्वर महादेव-  नाग-शक्ति, धर्म-साधना और विष-विजय का दिव्य केंद्र

सार

चौरासी महादेवों में कर्कोटेश्वर को दशम महादेव जानो, जिनके मात्र दर्शन से ही विष का प्रभाव नष्ट हो जाता है..!!

janmat

विस्तार

उज्जयिनी की पुण्यभूमि भारतीय सनातन चेतना की वह अक्षय धरोहर है, जहाँ अध्यात्म केवल शास्त्रों की पंक्तियों में सीमित नहीं, बल्कि लोक-जीवन की श्वास-प्रश्वास में आज भी जीवंत रूप से प्रवाहित होता है। यही वह दिव्य नगर है, जहाँ महाकाल के सान्निध्य में प्रतिष्ठित चौरासी महादेव केवल मंदिरों की गणना नहीं, अपितु शिव-तत्त्व की अखंड साधना-परंपरा के सजीव प्रतीक हैं।

इसी पुण्य-श्रृंखला का दसवाँ पड़ाव है — श्री कर्कोटेश्वर महादेव, जिनकी गणना चौरासी महादेवों में एक अत्यंत रहस्यमय, प्रभावशाली और तांत्रिक-आध्यात्मिक महत्व से परिपूर्ण शिवलिंग के रूप में की जाती है।

पुराणों में कर्कोटेश्वर महादेव का उल्लेख अत्यंत श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया है—

 “कर्कोटेश्वर-संज्ञं च दशमं विद्धि पार्वति।

 यस्य दर्शनमात्रेण विषैर्नैवाभिभूयते॥

हेपार्वती! चौरासी महादेवों में कर्कोटेश्वर को दशम महादेव जानो, जिनके मात्र दर्शन से ही विष का प्रभाव नष्ट हो जाता है।

यह श्लोक न केवल उनके स्थान को प्रमाणित करता है, बल्कि उनके आध्यात्मिक प्रभाव और तत्त्वज्ञान को भी उद्घाटित करता है।

संस्कृत में ‘कर्कोट’ शब्द का अर्थ सर्प या नाग होता है। सनातन परंपरा में नाग केवल एक जीव नहीं, बल्कि काल, विष, संरक्षण, कुंडलिनी शक्ति और गूढ़ चेतना का प्रतीक है। भगवान शिव के कंठ में विराजमान वासुकि नाग इस तथ्य का द्योतक है कि शिव ही विष और काल—दोनों के स्वामी हैं।

कर्कोटेश्वर महादेव उसी नाग-तत्त्व के अधिष्ठाता रूप हैं—जहाँ विष नाश नहीं होता, बल्कि साधना द्वारा अमृत में रूपांतरित होता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक समय सर्पों की माता ने सर्पों द्वारा धर्म-पालन में हुई त्रुटियों से कुपित होकर उन्हें यह श्राप दे दिया कि वे राजा जनमेजय द्वारा किए जाने वाले सर्पयज्ञ में भस्म हो जाएंगे।

इस भयावह श्राप से व्याकुल होकर नाग-वंश के अनेक सर्प अपने उद्धार के लिए विभिन्न तीर्थों की ओर चले गए—

कोई हिमालय पहुँचा, कोई प्रयाग, कोई कुरुक्षेत्र, तो कोई ब्रह्मलोक में तप करने लगा।

इसी क्रम में एलापत्रक नामक सर्प ब्रह्माजी के शरणागत हुआ और विनयपूर्वक उद्धार का मार्ग पूछा। तब ब्रह्माजी ने कहा—

 “महाकाल वन जाओ। वहाँ महामाया के सान्निध्य में भगवान शिव का दिव्य लिंग है। उसकी आराधना ही तुम्हारा उद्धार करेगी।”

ब्रह्माजी की आज्ञा से कर्कोटक नामक सर्प महाकाल वन पहुँचा और उस शिवलिंग के समक्ष घोर तपस्या और स्तुति में लीन हो गया। उसकी निष्ठा, संयम और धर्मपरायणता से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और वरदान दिया—

 “जो नाग धर्म के मार्ग पर चलेंगे, उनका कभी विनाश नहीं होगा।”

उसी क्षण से वह शिवलिंग कर्कोटकेश्वर और कालांतर में कर्कोटेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हुआ।

कर्कोटेश्वर महादेव को सामान्यतः नाग-दोष या कालसर्प योग निवारण का केंद्र माना जाता है, किंतु उनका वास्तविक महत्त्व इससे कहीं अधिक गूढ़ है। यह स्थल मानव शरीर में सुप्त पड़ी कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है—जो अनुशासन, साधना और विवेक से जाग्रत होती है।

यहाँ की साधना भय से मुक्ति, मानसिक संतुलन और जीवन में अचानक उत्पन्न होने वाले अवरोधों को शांत करने की प्रेरणा देती है।

श्रावण मास, नाग पंचमी और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशेष पूजन-अर्चन होता है। श्रद्धालु जल, दूध, बेलपत्र तथा नाग-प्रतीक अर्पित कर शिव की उपासना करते हैं।

कर्कोटेश्वर महादेव का मूल संदेश अत्यंत स्पष्ट और कालजयी है—

 जीवन का विष—चाहे वह भय हो, क्रोध हो, अहंकार हो या मोह—

यदि शिव-स्मरण और धर्म के अनुशासन में साधा जाए,

तो वही विष अमृत में परिवर्तित हो जाता है।

यही कारण है कि उज्जयिनी के चौरासी महादेवों में कर्कोटेश्वर महादेव न केवल एक तीर्थ हैं, बल्कि आत्म-विजय, संयम और चेतना-जागरण के दिव्य केंद्र माने जाते हैं।