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सरकारों और न्याय की लड़ाई

सार

एकीकृत, कुशल और जन-केंद्रित न्यायपालिका पर देश के न्यायमूर्तियों का वैचारिक चिंतन भोपाल में हो रहा है. नेशनल ज्यूडिशल अकेडमी बनने के समय से ही न्यायपालिका के नवाचार की पहल भोपाल से जुड़ गई है..!!

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विस्तार

    न्यायमूर्तियों का यह सम्मेलन और उसका विषय यही संदेश दे रहा है, कि वर्तमान न्यायमूर्ति भी इस बात से चिंतित हैं कि देश की न्यायपालिका ना तो अभी कुशल है, ना हीं जन-केंद्रित और ना ही उसका स्वरूप एकीकृत है. जो न्यायमूर्तियों को महसूस हो रहा है, वह तो आम लोगों को हर रोज दिखाई पड़ता है. सुप्रीम कोर्ट में किसी भी आम आदमी का न्याय के लिए पहुंचना, लगभग असंभव है. पूरी प्रक्रिया इतनी महंगी और धन केंद्रित हो गई है, कि गरीब आदमी की वहां तक पहुंच ही नहीं बची है. 

    महंगे-महंगे वकील ही सुप्रीम कोर्ट को पहचान देते हैं. जिन मामलों की आए दिन चर्चा देश में चलती है, वह या तो राजनीतिक होते हैं, या कानून निर्माण की प्रक्रिया से जुड़े होते हैं. अगर यह कहा जाए कि राजनीतिक दल और सरकार ही विशेषकर सुप्रीम कोर्ट में वादी और प्रतिवादी दोनों की भूमिका निभाते हैं. आम आदमी तो निचली अदालतों में ही न्याय के लिए भटकता रहता है. भारतीय दंड और न्यायसंहिता में न्यायिक कानून एक ही है, लेकिन निचली अदालत से लेकर उच्च अदालत तक फैसले अलग-अलग होते हैं.

    निचली अदालत के फैसले ऊपरी अदालत में बदल दिए जाते हैं. अब देश के शीर्षस्थ न्यायमूर्ति एकीकृत न्यायपालिका की चर्चा कर रहे हैं, इसका आशय तो यही लगता है, कि कानून के मुताबिक किसी भी अदालत में लिया गया फैसला उस कानून की ही दिशा होगी, जब न्यायिक दृष्टि केवल और केवल कानून पर काम करेगी, तो फिर किसी भी अदालत में फैसले के पलटने का न्यूनतम चांस, अपवाद स्वरूप ही हो सकता है. वर्तमान में तो अधिकांश फैसले पलट जाते हैं.

    जहां तक कुशल न्यायपालिका का प्रश्न है, यह तो उनसे पूछा जाए जो कानून के मुताबिक जमानत के लिए योग्य केसेस में भी अनावश्यक सजा भुगत रहे हैं. केस में जितनी सजा अधिकतम निश्चित है, उससे अधिक सजा आरोपी ट्रायल के दौरान ही भुगत चुका होता है. तारीख-दर-तारीख न्यायपालिका का शिकार अपनी उम्र काटता जाता है. आपराधिक और राजस्व संबंधी मामलों में तो गवाही सबूत की इतनी लंबी फेहरिस्त होती है, कि निर्णय तक केस पहुंचने में दशकों लग जाते हैं.

    संसद या सुप्रीम कोर्ट इस पर भी आए दिन बहस होती है. सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्तियों पर भी वैचारिक विवाद कायम रहते हैं. वर्तमान में न्यायाधीशों की नियुक्ति उनकी कॉलेजियम के ही हाथों में है. संसदीय व्यवस्था इस कार्यपालिका के अंतर्गत लाना चाहती है, लेकिन अब तक यह संभव नहीं हो पाया है. यह बात बिल्कुल सही है, कि तमाम सारी कमियों के बावजूद आज भी न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा कायम है.

    न्यायपालिका में लंबित केसेस की संख्या लगातार बढ़ रही है. सरकारी काम काज न्यायपूर्ण होना चाहिए, लेकिन ऐसा बताया जाता है, कि अदालतों में 65% से ज्यादा मामले सरकारों से जुड़े हुए होते हैं. अदालती मामलों से सरकारी कामकाज दो-तरफा प्रभावित होते हैं. कांट्रेक्ट वाले मामले अदालती रोक के कारण विकास को भी प्रभावित करते हैं. सर्विस मैटर में पीड़ित कर्मचारियो के केसेस में लंबी कानूनी लड़ाई चलती रहती है. 

    न्याय मूर्तियों के सम्मेलन में ऐसा निष्कर्ष निकला है, कि पहले वे सरकारों से कहेंगे कि केस में पहले आपसी समझौते का विकल्प आजमाया जाए. जब इस पर सहमति नहीं बने फिर अदालत का रुख़ किया जाए. अदालतो में जो मामलो लंबित हैं, वह आपसी समझौते की प्रक्रिया का पालन करने के बाद ही हैं. अगर यह कार्यवाही नहीं होती तो अदालतों में मामले और बढ़े रहते. 

    राज्य सरकारों में अकाउंटेबिलिटी की परंपरा ही लगभग समाप्त हो गई है. उच्च स्तर पर जिम्मेदार अफसरों द्वारा न्यायपूर्ण फैसले से ज्यादा किसी को खुश करने के लिए फैसले करने की परंपरा बढ़ती जा रही है. मॉनीटरिंग की सरकारी व्यवस्था लगभग समाप्त हो गई है. सरकारों की राजनीतिक और प्रशासनिक धाराएं एक दूसरे को कमतर साबित करने में सरकारी फैसले बद-से-बद्तर होते जाते हैं.

    न्यायपालिका में भी करप्शन की शिकायत आती रहती हैं. न्यायाधीशों के रिटायरमेंट के बाद राजनीतिक लाभ के पदों पर जाने की परंपरा भी न्याय की आधारशिला को प्रभावित करती है. राष्ट्रीय न्यायिक नीति पर सहमति तब तक प्रभावी नहीं हो सकती, जब तक कि संसद में उस पर सहमत नहीं हो. सरकारों और उनके राजनेताओं पर तो भ्रष्टाचार के आरोप लगते ही रहते हैं. राजनीतिक दल स्वयं एक-दूसरे को भ्रष्ट साबित करने में पीछे नहीं रहते हैं. न्यायपालिका में भी न्यायाधीशों पर करप्शन के केसेस उजागर हो रहे हैं. न्यायाधीशों की कई बार राजनीतिक प्रतिबद्धताएं भी सामने आती हैं. 

    आम आदमी तो अदालत में भगवान का स्वरूप देखता है. इस स्वरूप और विश्वास को बनाए रखना न्यायपालिका का सबसे बड़ा दायित्व है. न्यायपालिका में केसेस के निपटारे के लिए समय सीमा तय होना आवश्यक है. जब कार्यपालिका में सिटीजन का चार्टर लागू है, तो फिर न्यायपालिका में मुकदमों पर यह चार्टर क्यों नहीं लागू किया जा सकता.

    खुशी की बात है कि देश के शीर्षस्थ न्यायमूर्ति न्यायपालिका को जन-केंद्रित बनाने की चिंता कर रहे हैं. जन-केंद्रित कोई नारा नहीं है बल्कि न्यायिक कार्य प्रणाली का आधार होना चाहिए. यही प्रक्रिया जब तक खर्चीली रहेगी, तब तक वह जन-केंद्रित नहीं हो सकती. वर्तमान में तो न्याय व्यवस्था धन केंद्र दिखाई पड़ती है. वकीलों की फीस आम आदमी तो दे ही नहीं सकता है. कुछ गिने-चुने वकील हैं, जो अमीर और धनी लोगों का ही केस लड़ते हैं.  

    न्यायपालिका को त्वरित, सस्ता, कुशल और जन-केंद्रित बनाना आसान नहीं है. इससे एक बात तो साफ है कि वर्तमान में न्यायपालिका इससे दूर है. प्रसन्नता की बात है कि वर्तमान न्यायाधीशों ने यह तो महसूस किया कि अभी न्यायपालिका जन-केंद्रित नहीं है. 

    सम्मेलन से जो निष्कर्ष निकलेगा उससे कैसे न्यायपालिका जन-केंद्रित बनेगी, यह तो अदालतों की कार्यप्रणाली में सुधार ही बताएगा.