अब अगला विधानसभा चुनाव बंगाल में होगा. बंगाल की चुनावी लड़ाई के सारे अस्त्र चलाए जा रहे हैं. वहां सीधा मुकाबला ममता बनर्जी की टीएमसी और बीजेपी के बीच है. कांग्रेस और वामपंथी पार्टी चुनाव में अप्रसांगिक हैं. बंगाल में पिछले चुनाव में जबर्दस्त प्रदर्शन के बाद इस बार बीजेपी इस चुनावी लड़ाई को सभ्यतागत संघर्ष बता रही है..!!
चुनाव आयोग द्वारा की जा रही मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण SIR की प्रक्रिया का ममता बनर्जी शुरू से ही विरोध कर रही हैं. अब तो उन्होंने सीधे कोलकाता से दिल्ली पहुंचकर इलेक्शन कमीशन में अपनी आक्रामक राजनीति का नजारा पेश किया है. इलेक्शन कमीशन को बीजेपी का आईटी सेल बताने से भी वे पीछे नहीं रही. यहां तक कि इलेक्शन कमीशन को यह कहना पड़ा कि ममता बनर्जी का आयोग के साथ मीटिंग में व्यवहार आपत्तिजनक रहा. ममता बनर्जी ने इसी तर्ज़ पर वामपंथी सरकार से सत्ता हासिल की थी.
बंगाल में कई दशकों से राज्य सरकार सत्ताधारी पार्टी की संस्थागत व्यवस्था के रूप में काम करती दिखाई दी है. वामपंथी सरकारों ने अपने कैडर के जरिए सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के फंड का दुरुपयोग किया. एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की जिसमें सरकारी तंत्र से ज्यादा सत्ताधारी पार्टी के तंत्र की भूमिका होती थी. ममता ने वामपंथी सरकार को तो उखाड़ दिया लेकिन उनकी संस्थागत व्यवस्था को स्वयं अपना लिया. बंगाल में रूलिंग पार्टी का चेहरा तो बदला लेकिन कार्य शैली पहले जैसी ही दिखाई देती रही है. पहले वामपंथी पार्टी का तंत्र सरकारी व्यवस्था संचालित कर रहा था. अब वह काम टीएमसी कर रही है.
भारत की चुनावी राजनीति में हिंसा और मारपीट पहले आम बात हुआ करती थी. अब कश्मीर और बिहार जैसे राज्यों में भी चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से होते हैं. केवल बंगाल ऐसा राज्य बचा है जहां अभी गांव गांव में विभिन्न पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच सीधा संघर्ष होता है. SIR पर तो विवाद बिहार और उत्तर प्रदेश में भी खड़े किए गए लेकिन सबसे ज्यादा राजनीतिक विवाद बंगाल में खड़े किये जा रहे हैं.
इलेक्शन कमीशन तो यहां तक कह रहा है कि उसे इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए बंगाल सरकार द्वारा मांगा गया स्टाफ ही नहीं दिया गया है. इसीलिए कमीशन को माइक्रो आब्जर्वर बनाने पड़े हैं. ममता बनर्जी ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, मुख्यमंत्री के रूप में किसी पॉलिटिशियन के पहली बार सुप्रीम कोर्ट में खुद पैरवी करने का इतिहास ममता बनर्जी ने बनाया है.
ममता SIR को पात्र मतदाताओं के नाम को काटने की प्रक्रिया बताती हैं. सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट रूप से चुनाव आयोग को कह चुका है कि एक भी पात्र मतदाता का नाम काटा नहीं जाएगा. बिहार में जो राजनीतिक माहौल बनाया गया था, बाद में वह सब गलत साबित हुआ. SIR की प्रक्रिया अभी बंगाल में चल रही है. ममता बनर्जी सर्वोच्च अदालत में अपना पक्ष रख चुकी हैं. यह तो लगभग निश्चित है कि SIR की प्रक्रिया तो नहीं रोकी जा सकती. जब प्रक्रिया होगी तो अपात्र लोगों के नाम हटेंगे.
बंगाल चूँकि सीमावर्ती राज्य है, वहां बांग्लादेश से घुसपैठ की गंभीर समस्या है. घुसपैठियों में भी हिंदू मुस्लिम की राजनीति है. बीजेपी ने हिंदू घुसपैठियों को शरणार्थी मानकर नागरिकता देने के लिए कानून बनाया है तो ममता इसका विरोध करती हैं. मुस्लिम वोट बैंक टीएमसी का बड़ा जनाधार है. उसमें किसी प्रकार की चोट सीधे ममता बनर्जी को नुकसान पहुंचा सकती है.
ममता सरकार का परफॉर्मेंस तो बहुत अधिक पुअर दिखाई पड़ता है. गवर्नेंस में करप्शन के तो इतने प्रमाणित मामले उजागर हो चुके हैं कि अब उस पर टीएमसी अपने चेहरे को बेदाग़ साबित करने में सक्षम नहीं दिखाई पड़ रही है. कई मंत्रियों को इस्तीफे देने पड़े हैं. मंत्रियों के सहयोगियों के पास से करोड़ों रुपए की नगदी जप्त हुई है.
ममता बनर्जी और टकराव एक दूसरे के पूरक हैं. वे केंद्र सरकार के साथ राज्यपाल से भी टकराती हैं. यहां तक कि सीबीआई और ईडी के साथ भी सीधे टकराने में संकोच नहीं करती. ईडी के छापे के दौरान स्वयं वहां पहुँच जाती हैं और राज्य की पुलिस के साथ फोन और पेन ड्राइव लेकर चली जाती हैं.
बंगाली अस्मिता के नाम पर गवर्नेंस करने वाले राजनीतिक दल बंगाल की छवि को ही खराब करने के जिम्मेदार कहे जा सकते हैं. जो टीएमसी पहले परिवर्तन का प्रतीक बन गई थी आज वही परिवर्तन का कारण बनती लगती है.
बीजेपी की कोशिश हिंदुत्व पर चुनाव को केंद्रित करना होता है. मुस्लिम वोट बैंक अब तक ममता बनर्जी की जीत का सबसे बड़ा कारण माना जाता है. इस बार इसमें भी सेंध लगने की संभावना है. मुर्शिदाबाद में टीएमसी के ही एक निलंबित विधायक की ओर से की गई बाबरी मस्जिद के निर्माण की पहल भी चुनाव में प्रभाव डाल सकती है.
ममता बनर्जी बीजेपी की हिंदुत्व की पिच पर इस बार जानबूझकर या गलती से चली गई लगती है. उन्होंने अपने राज्य में जगन्नाथ मंदिर बनवाया है. कोलकाता में दुर्गा आंगन का भव्य निर्माण कर रही है. महाकाल मंदिर का भी ममता बनर्जी ने शिलान्यास किया है. कई राज्यों में ऐसा देखा गया है कि हिंदुत्व की राजनीति पर जब भी चुनाव लड़ा जाता है तब उसका फायदा बीजेपी को ही मिलता है.
ममता की चुनावी क्षमता संदेह के परे है. उनसे बड़ा पॉलिटिकल फाइटर भी दूसरा दिखाई नहीं पड़ता है. उनके खिलाफ एंटी इनकंबेंसी और मुस्लिम मतों में विभाजन राज्य के चुनावी भविष्य का निर्धारण करेगा. चुनावी ममता की कटुता राज्य के अमन चैन को प्रभावित नहीं करे यह सबसे जरूरी है.