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जहाँ अन्याय के विरुद्ध करुणा का न्याय मिलता है, उज्जैन के अप्सरेश्वर महादेव: प्रतिष्ठा पुनर्प्राप्ति का दिव्य केंद्र

सार

दिव्य नगरी में विराजमान चौरासी महादेवों की परंपरा सनातन धर्म की आत्मा को जीवंत रखे हुए है।इन 84 महादेवों में श्री अप्सरेश्वर महादेव का स्थान विशेष है- क्योंकि यह केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि खंडित आत्मसम्मान, लांछित प्रतिष्ठा और अन्याय से पीड़ित मनुष्यता के पुनरुत्थान का प्रतीक है, 84 महादेवों की श्रृंखला — श्री अप्सरेश्वर महादेव (क्रमांक 17)..!!

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विस्तार

महाकाल की नगरी उज्जैन केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि चेतना की वह भूमि है जहाँ काल भी झुककर प्रणाम करता है। इसी दिव्य नगरी में विराजमान चौरासी महादेवों की परंपरा सनातन धर्म की आत्मा को जीवंत रखे हुए है।इन 84 महादेवों में श्री अप्सरेश्वर महादेव का स्थान विशेष है- क्योंकि यह केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि खंडित आत्मसम्मान, लांछित प्रतिष्ठा और अन्याय से पीड़ित मनुष्यता के पुनरुत्थान का प्रतीक है।

पटनी बाजार क्षेत्र में स्थित यह प्राचीन शिवलिंग उन लोगों के लिए आश्रय है, जिनकी सामाजिक, पारिवारिक या व्यावसायिक प्रतिष्ठा किसी षड्यंत्र, ईर्ष्या या क्षणिक भूल के कारण आहत हुई हो। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, देवराज इंद्र की सभा में नृत्यरत अप्सरा रंभा से लय-ताल में क्षणिक विचलन हो गया।देवों के अधिपति इंद्र का यह क्षणिक क्रोध अहंकार में बदल गया और उन्होंने रंभा को कांतिहीन होने का शाप देकर पृथ्वी पर भेज दिया।यह कथा केवल मिथक नहीं, बल्कि सत्ता के अहंकार और मनुष्य की असुरक्षा का शाश्वत दस्तावेज़ है।आज भी समाज में- 

एक भूल,एक आरोप,या एक अफवाह पूरे जीवन की साख को पल भर में ध्वस्त कर देती है। श्रापग्रस्त रंभा, देवर्षि नारद के मार्गदर्शन में अपनी सखियों सहित महाकाल वन पहुँचीं। हरसिद्धि पीठ के समीप स्थित एक शांत, तेजस्वी शिवलिंग के सम्मुख उन्होंने अहंकार नहीं, आत्मसमर्पण के साथ आराधना की।उनकी तपस्या में कोई प्रदर्शन नहीं था—केवल पश्चाताप, श्रद्धा और धैर्य था। 

भगवान शिव प्रसन्न हुए।उन्होंने न केवल रंभा को उसकी खोई हुई दिव्यता लौटाई, बल्कि यह उद्घोष भी किया कि- “यह शिवलिंग उन सभी के लिए आश्रय होगा,जिनकी प्रतिष्ठा अन्याय से छीनी गई हो।”
यहीं से यह शिवलिंग “अप्सरेश्वर महादेव” कहलाया।

जब चरित्र पर मुकदमे सोशल मीडिया में चलते हैं,आज का युग भले ही तकनीकी हो गया हो,पर न्याय अब भी अधूरा है। सोशल मीडिया, राजनीतिक द्वेष, कार्यालयीन प्रतिस्पर्धा और सामाजिक ईर्ष्या—इन सबके बीच व्यक्ति की प्रतिष्ठा सबसे असुरक्षित हो गई है। ऐसे समय में अप्सरेश्वर महादेव का संदेश और भी प्रासंगिक हो उठता है।मान्यता है कि यहाँ श्रद्धापूर्वक पूजन करने से-

खोई हुई पद-प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त होती है।कार्यक्षेत्र में सम्मान सुरक्षित रहता है।झूठे आरोपों से मुक्ति मिलती है।मान-अपमान की पीड़ा से मानसिक शांति प्राप्त होती है।यह मंदिर न्याय की याचना नहीं, आत्मबल की पुनर्स्थापना का केंद्र है।

अप्सरेश्वर महादेव की एक अनूठी मान्यता यह भी है कि— यदि कोई श्रद्धालु स्वयं यहाँ नहीं आ सकता,और श्रद्धा-भाव से किसी अन्य को दर्शन हेतु भेजता है,तो भी उसे समान पुण्य फल प्राप्त होता है। यह शिव-तत्व की उस व्यापकता को दर्शाता है जहाँ दूरी नहीं,देह नहीं,केवल भावना मायने रखती है। पतन अंत नहीं, आरंभ है।अप्सरेश्वर महादेव मौन होकर भी बहुत कुछ कहते हैं—कि सत्ता का अन्याय अंतिम नहीं होता ,अपमान स्थायी नहीं होता, धैर्य और भक्ति से गरिमा लौटती है।यह शिवलिंग हमें सिखाता है कि—जब मनुष्य का न्याय विफल हो जाए,जब समाज प्रश्नचिह्न बना दे,तब शिव की शरण ही अंतिम सत्य है।

उज्जैन के अप्सरेश्वर महादेव केवल अतीत की कथा नहीं, वे वर्तमान की पुकार हैं। यह मंदिर विश्वास दिलाता है कि अन्याय कितना भी गहरा हो, सत्य की जड़ें उससे कहीं गहरी होती हैं।गरिमा का पुनरुत्थान संभव है—यदि विश्वास अडिग हो,और आत्मसम्मान जीवित हो।

अगले अंक में अगले महादेव की कथा.....