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कलेक्टर्स पर आक्षेप, प्रोटेक्टर को प्रशंसा

सार

संसदीय व्यवस्था के शासन लोक में वक्त के साथ कर्ज और करप्शन बढ़ता ही जा रहा है. दोनों में धन की भूमिका है. कर्ज से धन लेकर विकास किया जा रहा है और विकास में करप्शन की गति बढ़ रही है..!!

janmat

विस्तार

    संसदीय व्यवस्था के शासन लोक में वक्त के साथ कर्ज और करप्शन बढ़ता ही जा रहा है. दोनों में धन की भूमिका है. कर्ज से धन लेकर विकास किया जा रहा है और विकास में करप्शन की गति बढ़ रही है.

    कर्जों के आंकड़े रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया सहित हर फोरम पर उपलब्ध हैं. कोई भी सरकार कर्ज लेती है तो प्रक्रिया शुरू होते ही सब कुछ सार्वजनिक हो जाता है. करप्शन जरूर शासनलोक का छिपा हुआ एलिमेंट है, कोई माने कुछ भी लेकिन शासन की आत्मा को सब कुछ पता होता है.

    ऐसे तथ्य उजागर हुए हैं कि चालू वित्तीय वर्ष में मध्यप्रदेश सरकार ने रिकॉर्ड उधारी ली है. मध्यप्रदेश को इस साल लगभग 79000 करोड रुपए क़र्ज़ लेने की पात्रता थी. अब तक 62000 करोड़ से ज्यादा का कर्ज लिया जा चुका है. अभी वित्तीय वर्ष समाप्त होने में समय बचा हुआ है. लिमिट की सीमा के अंतर्गत यथासंभव ऋण ले ही लिया जाएगा.

    यह केवल मध्यप्रदेश का सवाल नहीं है, लगभग हर राज्य की सरकार कर्जों के जाल में उलझ गई है. चुनावी घोषणाएं राज्य सरकारों को इतना दबा देते हैं कि बिना कर्ज के विकास का पहिया घूम ही नहीं सकता है. 

    कर्ज लेना कोई बुरी बात भी नहीं है लेकिन अगर उसका सदुपयोग हो, जमीन पर विकास को गति मिले, कर्ज का उपयोग प्रोडक्टिव हो तो इससे राज्य को लाभ है. राज्यों के कर्जों पर पक्ष-विपक्ष की आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति केवल दोषारोपण के लिए ही दिखाई पड़ती है. इसके पीछे राज्य के विकास की कोई भी सोची समझी रणनीति नहीं होती है.

    पैसा कहीं से भी आए उसका उपयोग शासन का तंत्र ही करता है. तंत्र में करप्शन को मापने का कोई पैमाना नहीं है. रिश्वतखोरी के आरोपों में जो लोग पकड़े जाते हैं, वह तो एक बानगी होती है. जो नहीं पकड़े जाते हैं उनका संस्थागत ढांचा शासन लोक में इतनी मजबूती से पकड़ बनाए रखता है कि करप्शन कम होने के बजाय बढ़ता हुआ ही दिखता है. 

    मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव अपने गुड गवर्नेंस के लिए सरकार द्वारा पुरस्कृत हैं. एक साल की सेवावृद्धि उनकी परफॉर्मेंस का प्रतीक है. पिछले दिनों वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर कलेक्टरों से चर्चा के दौरान उनकी एक टिप्पणी मध्य प्रदेश के शासन लोक की आंखें खोलने वाली है. वे कहते हैं कि-मुख्यमंत्री ऐसा बताते हैं कि कोई कलेक्टर बिना पैसे लिए काम नहीं करता. 

    मुख्यमंत्री जिलों में जाते हैं. पब्लिक से डायरेक्ट कनेक्ट होते हैं. उनके पास एडमिनिस्ट्रेटिव फीडबैक फर्स्ट हैंड रहता है लेकिन सीएस के पास भी फीडबैक की कमी नहीं होती. सीएम और सीएस आपस में भी फीडबैक शेयर करते हैं. इसी शेयरिंग में सीएम ने कलेक्टरों के बारे में सूचनाओं को शेयर किया होगा. फिर भी पूरे सिस्टम को खराब कहना तर्कसंगत नहीं. हर कलेक्टर पैसे लेकर काम कर रहा होगा ऐसा नहीं माना जा सकता. ईमानदार कलेक्टरों को यह टिप्पणी आहत ही कर रही होगी? 

     मुख्यमंत्री का करप्शन को लेकर फीडबैक कलेक्टरों को बता देने भर से क्या व्यवस्था में सुधार आ जाएगा. जब यह पूरा मामला मीडिया में उछल गया तो फिर इसका ऑफिशियल खंडन होना ही था. यह औपचारिकता भी निभाई गई. परसेप्शन कभी झूठ नहीं बोलता. हवा प्रदूषित भी हो तब भी जीवन उसी से चलता है. 

    पूरा शासन तंत्र जन समस्याओं के समाधान के लिए प्रो एक्टिव दिखाई नहीं पड़ता. शासन के जिन केंद्रों पर सीधे पब्लिक से संपर्क होता है उन पर कामकाज के लिए दलालों के माध्यम से कारवाई सबसे त्वरित और सुविधाजक मानी जाती है. डिजिटल गवर्नेंस के कारण कुछ व्यवस्थाएं सुधरी जरूर हैं लेकिन तंत्र ने घुमा फिरा कर डिजिटल गवर्नेंस को भी अपने हाथों की कठपुतली बना लिया है. समय पर काम होना शासनलोक में असंभव घटना मानी जाती है. 

    कलेक्टरों की पदस्थापना भी वैसे तो सामान्य घटनाक्रम है लेकिन किसी अफसर को कलेक्टर का पद पाना उसके लिए असामान्य घटना ही है, इसीलिए ऐसे भी अफसर है जो फील्ड में जाने से ही कतराते हैं. पोस्टिंग से ही जो बुराई शुरू हो जाती है वह काम के दौरान कैसे रोकी जा सकती है. कुछ करप्शन तो संस्थागत रूप ले चुके हैं. हर स्तर के पावरफुल लोग सब कुछदेखते हैं लेकिन आंखें मूंदे रहते हैं.

    यह प्रक्रिया सहभागिता के कारण भी हो सकती है शासन लोक में एक प्रशासकीय पक्ष और दूसरा राजनीतिक पक्ष है. दोनों पक्ष एक दूसरे को अक्षम और बेईमान होने की नजरों से देखते हैं. राजनीतिक पक्ष का सार्वजनिक चेहरा अलग होता है और निजी चेहरा दूसरा होता है. प्रशासनिक अधिकारियों के सामने दोनों पक्ष उजागर होते हैं. 

    अगर सीएस के फीडबैक के आधार पर मध्यप्रदेश के शासन लोक का विश्लेषण किया जाए तो आम आदमी तो जिसे शासन तंत्र से कोई लेना देना नहीं है उसकी समझ में नहीं आएगा लेकिन जो शासन तंत्र के संपर्क में हैं उन्हें इस वाक्य की सच्चाई स्वीकार करने में एक क्षण भी नहीं लगेगा.

    कलेक्टरों के प्रमोटर और प्रोटेक्टर CM और CS ही माने जाते हैं. यही उनकी पोस्टिंग के निर्णायक हैं. यही उनके परफॉर्मेंस का आकलन करते हैं. यही उनकी CR को फाइनल करते हैं. जो मॉनिटरिंग के लिए जिम्मेदार हैं वे जिलों में गवर्नेंस में गड़बड़ियों से खुद को कैसे अलग रख सकते हैं? अच्छे बुरे अफसर हर तंत्र में होते हैं. सबको एक तराजू में तोलना ठीक नहीं होता. 

    सुधार की शुरुआत खुद से होती है. शासन लोक का उच्च स्तर अगर सुधार की कमर कस ले तो फिर नीचे जिलों में सुशासन के लिए कुछ भी कहना नहीं पड़ेगा. पर उपदेश कुशल बहुतेरे से सुधार की कल्पना केवल खुशफहमी ही हो सकती है.