यूपी की भाजपा सरकार द्वारा लखनऊ में बनाए गए राष्ट्र प्रेरणा स्थल से सेक्युलरिज्म पर खतरे का स्मारक खड़ा हो गया है. भारत में ऐसा पहली बार हो रहा है जब बीजेपी के हिंदुत्ववादी नेताओं के स्मारक बनाए गए हैं..!!
बीजेपी का राजनीतिक आत्मविश्वास धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है. पीएम मोदी द्वारा कमल के आकार में बने प्रेरणास्थल के लोकार्पण के साथ ही राजनीतिक विवाद चालू हो गया है. कुछ लोगों को तो इसे राष्ट्र प्रेरणा स्थल नाम देने पर भी आपत्ति है. ऐसा सोचने वाले कहते हैं कि जिन नेताओं की मूर्तियां लगाई गई है वे भाजपा के लिए तो प्रेरणा हो सकते हैं लेकिन उन्हें राष्ट्र की प्रेरणा कैसे कहा जा सकता है?
प्रेरणा स्थल पर पंडित अटल बिहारी वाजपेयी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्तियां लगाई गई हैं. ये तीनों महानायक बीजेपी और संघ की हिंदूत्ववादी विचारधारा के प्रेरणा पुरुष रहे हैं. अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री रहे हैं. पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्मवाद बीजेपी की राजनीतिक विचारधारा का आधार रहा है.वहीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी को तो जम्मू कश्मीर में एकीकरण के प्रयासों के लिए स्मरण किया जाता है. उनकी प्रेरणा से ही मोदी सरकार जम्मू कश्मीर में धारा 370 हटाने में सफल रही है.
लोकतंत्र का स्वरूप जीवंत होता है. इसके इतिहास नहीं बल्कि वर्तमान से राष्ट्र की दिशा तय होती है. आजादी के बाद पहली बार पीएम नरेंद्र मोदी के रूप में इस विचार की सरकार देश में स्थापित हुई है. इसके पहले तो नेहरू गांधी की विरासत ही पूरे देश में राष्ट्र प्रेरणा के रूप में स्थापित करने के प्रयास दिखाई पड़ते थे. बीजेपी नेहरू के साथ तो नहीं जा सकती लेकिन उसने महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, डॉ. बीआर अंबेडकर और सरदार वल्लभभाई पटेल को अपना आइकॉन बनाने की पूरी कोशिश की है.
डॉक्टर अंबेडकर के पंच तीर्थ का विकास बीजेपी सरकार में ही संभव हो पाय. सरदार वल्लभ भाई पटेल की सबसे ऊंची प्रतिमा का श्रेय भी नरेंद्र मोदी के खाते में ही गया है, सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति भी इंडिया गेट पर स्थापित की गई. महात्मा गांधी की विरासत को लेकर भी बीजेपी की सजगता दिखाई पड़ती है.कांग्रेस और बीजेपी के बीच जिसे लेकर राजनीतिक विवाद सामने आते हैं.
महात्मा गांधी और कांग्रेस के वर्तमान गांधी नाम की विरासत मेल नहीं खाती है. बढ़ती जागरुकता के कारण अब केवल विरासत के नाम पर किसी भी महान नायक को स्वयं से जोड़े रखना तब तक संभव नहीं है जब तक कि उनके आदर्श और संदेश पर सही मायने में काम ना किया जाए.
बीजेपी ने आजादी के महानायकों को की विरासत को स्मारक और मूर्ति के रूप में आगे बढ़ाया, राजनीति के जो भी महान नेता थे वे किसी भी दल के रहे हो उनको भारत रत्न देने का काम भी बीजेपी सरकार ने किया. कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी, पीवी नरसिंह राव, के साथ ही चौधरी चरण सिंह, कर्पूरी ठाकुर जैसे नायकों को भारत रत्न से नवाजा गया. मुलायम सिंह यादव को भी पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया.
बीजेपी और संघ ने पहले राष्ट्र के दूसरे महानायकों की विरासत को आगे बढाने का काम किया फिर अपनी विचारधारा के नायकों के लिए राष्ट्र प्रेरणा स्थल बनाया. राजनीतिक रूप से इसकी आलोचना इसलिए की जा रही है कि इसमें सारे नेता हिंदुत्ववादी विचारधारा से आते हैं. जीवंत लोकतंत्र में देश के लोगों ने ही उस सरकार को चुना है जिसने अपनी पार्टी के महानायकों को राष्ट्र प्रेरणा स्थल में मूर्ति के रूप में स्थापित किया है, अगर इसको सही नजरिए से देखा जाएगा तो यह देश के मैंडेट के बाद बनी सरकार के मैंडेट पर बना स्मारक है. इसका मतलब यह है राष्ट्र प्रेरणा स्थल है.
राष्ट्र प्रेरणा स्थल पर एक विवाद यह भी खड़ा किया जा रहा है कि इसमें स्थापित मूर्तियों में तीनों नायक ब्राह्मण वर्ग से आते हैं. जातिवादी राजनीति आज की हकीकत है. सारा विवाद ही इसी पर आधारित है. मुस्लिम बीजेपी का समर्थन नहीं करते. जब-जब हिंदुत्व की राजनीति कामयाब होती है तो बीजेपी विजयी होती है. जब हिंदू जातियों में बंट जाते हैं तब बीजेपी को राजनीतिक नुकसान होता है. भाजपा हिंदुत्व को एकजुट करना चाहती है तो उसके विरोधी सेक्युलर दल हिंदुओं को जातियों में बांटना चाहते हैं.
इसी सोच के आधार पर हिंदुत्ववादी नायकों को भी जातियों के आधार पर रखा जा रहा है. हिंदुत्ववादी विचारधारा के यह तीनों नायक प्रारंभिक धारा रहे हैं. इसके बाद तो इसमें हिंदुओं की सभी जातियों के नायक शामिल होते गए हैं. केंद्र और राज्य की राजनीति में आज बीजेपी हिंदुओं की जातियों का संतुलन कर हिंदुत्व को मजबूती प्रदान करने में सफल हो पा रही है.
हिंदुत्ववादी महानायकों का राष्ट्र प्रेरणा स्थल सेकुलरिज्म के खतरे के स्मारक के रूप में सेकुलर दलों को परेशान करता रहेगा. जिनको लोकतंत्र में विश्वास है उन्हें जीवंत लोकतंत्र दिखेगा और जिन्हें वोट बैंक पर भरोसा है उन्हें इन नायकों में ब्राह्मण दिखाई पड़ेंगे. देश की बदलती राजनीति यही साबित करती है कि भारत का लोकतंत्र नई करवट ले रहा है. लखनऊ का राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल इस करवट का जीवंत स्मारक बन गया है.
लोकतंत्र परिवार से आगे बढ़ गया है. पहले व्यक्तिवाद और परिवारवाद राजनीति का मुख्य आधार होता था. अब विचार और संगठन इसकी धुरी बन गई है. परिवार और विचार का द्वंद लोकतंत्र को नया स्वरूप दे रहा है. कांग्रेस सहित सभी प्रमुख क्षेत्रीय दल परिवारवादी राजनीति को प्रोत्साहित कर रहे हैं तो बीजेपी वैचारिक परिवार का प्रतिनिधित्व कर रही है. राजनीति भले बहुदलीय हो लेकिन विचार के मामले में यह द्विपक्षीय ही है. एक पक्ष हिंदुत्ववादी है तो दूसरा पक्ष सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम परस्ती का है.
जब विचार, संस्कृति, सभ्यता को प्रमुखता मिलेगी तब राजनीति में जातिवाद समाप्त होगा, लोकतंत्र मजबूत होगा, वैचारिक महानायकों का सम्मान होगा. इसी से राष्ट्र का कल्याण होगा.