सिंहासन के मद से नहीं, संस्कार से बनते हैं विश्वविजेता, विक्रमादित्य ने धन से नहीं, त्याग से जीता संसार, 84 महादेवों में 16वें — श्री ईशानेश्वर महादेव..!!
उज्जयिनी—महाकाल की अनंत छाया में बसी वह पुण्यभूमि, जहाँ प्रत्येक श्वास में काल का बोध और प्रत्येक शिवलिंग में न्याय का साक्षात्कार होता है। इसी दिव्य नगरी के चौरासी महादेवों में 16वें स्थान पर प्रतिष्ठित श्री ईशानेश्वर महादेव केवल एक आराध्य नहीं, बल्कि सनातन चेतना का जीवंत विधान हैं—जो सत्ता, अहंकार और अधर्म को समय रहते आईना दिखाता है।
श्री ईशानेश्वर महादेव की स्थापना-कथा कोई साधारण पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि वह शाश्वत सत्य है जो हर युग के शासकों, प्रशासकों और प्रभावशाली व्यक्तियों के लिए आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है। यह कथा स्पष्ट कहती है—जब व्यवस्था धन, भय और बल के अधीन हो जाती है, तब शिव-तत्त्व स्वयं हस्तक्षेप करता है।
प्राचीन काल में तुहुण्ड नामक एक अत्यंत शक्तिशाली दानव हुआ। उसकी शक्ति केवल बाहुबल तक सीमित नहीं थी—उसका प्रभाव भय, दबाव और लोभ के सहारे पूरे त्रिलोक पर फैल चुका था। देवता, ऋषि, गंधर्व, यक्ष—कोई भी उसकी दमनकारी सत्ता से अछूता न रहा।इंद्र का ऐरावत हाथी और उच्चश्रवा अश्व तक उसके अधीन हो गए। स्वर्ग के द्वार बंद कर दिए गए। देवताओं से न केवल उनका वैभव, बल्कि उनका धर्म और कर्तव्य भी छीन लिया गया।यह केवल देवताओं की पराजय नहीं थी—यह धर्म, मर्यादा और न्याय की हार थी।जब सभी मार्ग बंद हो जाएँ, तब शिव-स्मरण ही शेष रहता है,विवश और चिंतित देवताओं की पुकार पर महामुनि नारद प्रकट हुए। उन्होंने गहन ध्यान के उपरांत कहा“महाकाल वन जाओ।इन्द्रद्युम्नेश्वर के समीप स्थित ईशानेश्वर शिवलिंग की आराधना करो।समाधान वहीं है।”यह संकेत अत्यंत सूक्ष्म और गहरा है—जब बाह्य शक्तियाँ विफल हो जाएँ, तब आत्मशुद्धि और शिव-स्मरण ही अंतिम उपाय होता है। देवगण महाकाल वन पहुँचे।
ईशानेश्वर महादेव के समक्ष न कोई अधिकार रखा गया, न कोई अहंकार—केवल पूर्ण समर्पण।तभी उस शिवलिंग से धुआँ उठा…और फिर एक प्रचंड ज्वाला प्रकट हुई।उसी ज्वाला में तुहुण्ड अपनी सम्पूर्ण सेना सहित भस्म हो गया।न कोई युद्ध,न कोई समझौता,न कोई लेन-देन।शिव-न्याय घटित हुआ।यही शिव-तत्त्व की विशेषता है—वह दिखाई नहीं देता, बिकता नहीं—वह केवल घटित होता है।
ईशानेश्वर : जहाँ अधिकार नहीं, कर्तव्य लौटते हैं तुहुण्ड के विनाश के पश्चात देवताओं को उनका स्थान, उनका गौरव और उनका कर्तव्य पुनः प्राप्त हुआ। तब देवगणों ने उद्घोष किया—“जिस स्थान ने हमें हमारा सर्वस्व लौटाया, वही ईशानेश्वर है।”तभी से यह स्थल त्रिलोक में श्री ईशानेश्वर महादेव के नाम से पूजित हुआ।
आज तुहुण्ड किसी एक शरीर में नहीं,एक प्रवृत्ति के रूप में जीवित है।आज भी ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि धन से न्याय खरीदा जा सकता है,प्रभाव से सत्य बदला जा सकता है,और भय से व्यवस्था चलाई जा सकती है।पर सनातन दर्शन स्पष्ट कहता है,सब कुछ खरीदा जा सकता है, पर ईश्वर-तत्त्व नहीं।
महाकाल की इसी पुण्यभूमि पर
राजा विक्रमादित्य खड़े दिखाई देते हैं—जिन्होंने सत्ता को सेवा बनाया,और शासन को न्याय।
उनका साम्राज्य तलवार से नहीं, धर्म से विस्तृत हुआ।
शिव-कृपा ने उन्हें इसलिए यश दिया,क्योंकि उनका नेतृत्व अहंकार से नहीं,संस्कार से संचालित था। श्री ईशानेश्वर महादेव यह सिखाते हैं—नेतृत्व का अर्थ प्रभुत्व नहीं, उत्तरदायित्व है। शासन का अर्थ आदेश नहीं, सेवा हैऔर सबसे ऊपर है— न्याय ,जो इस मार्ग पर चलता है,उसे स्थायित्व, यश और लोकसम्मान मिलता है।जो इससे भटकता है,उसका पतन सुनिश्चित है। केवल विजय नहीं, विवेकमान्यता है कि श्री ईशानेश्वर महादेव के दर्शन से शत्रु-नाश, कार्य-सिद्धि और पाप-क्षय होता है।पर इससे भी बड़ा फल है—विवेक की प्राप्ति।यही विवेक मनुष्य को तुहुण्ड बनने से रोकता है।उज्जयिनी के पटनी बाज़ार क्षेत्र,मोदी की गली, बड़े दरवाज़े में स्थित यह प्राचीन मंदिर आज भी मौन होकर यही कहता है—
धन, बल और प्रभाव क्षणिक हैं।
धर्म, न्याय और शिव-तत्त्व शाश्वत हैं।जो इसे समझ ले—वही वास्तव में विजयी है।
क्रमशः जारी है — 84 महादेव धर्मयात्रा…