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84 महादेव: श्री मनकामनेश्वर महादेव, शिव के तीसरे नेत्र से भस्म हुआ कामदेव, फिर देहहीन होकर भक्ति से पाया वरदान..आलेख श्रृंखला – 13

सार

उज्जैन, जहां हर शिवालय एक शाश्वत संदेश है, महाकाल की नगरी उज्जैन केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि चेतना की वह भूमि है जहां प्रत्येक कण में शिवत्व विद्यमान है, यहां स्थित प्रत्येक शिवस्थल अपने भीतर कोई न कोई गूढ़ दार्शनिक संकेत समेटे हुए है..!!

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विस्तार

गन्धर्ववती घाट पर विराजमान श्री मनकामनेश्वर महादेव का यह दिव्य स्वरूप हमें यह बोध कराता है कि भगवान शिव केवल संहार के अधिष्ठाता नहीं हैं, बल्कि वे इच्छाओं के शुद्धिकरण, करुणा के विस्तार और सौभाग्य के सृजनकर्ता भी हैं।

उज्जैन, जहां हर शिवालय एक शाश्वत संदेश है।महाकाल की नगरी उज्जैन केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि चेतना की वह भूमि है जहां प्रत्येक कण में शिवत्व विद्यमान है। यहां स्थित प्रत्येक शिवस्थल अपने भीतर कोई न कोई गूढ़ दार्शनिक संकेत समेटे हुए है। इन्हीं दिव्य स्थलों में गंधर्ववती घाट पर स्थित श्री मनकामनेश्वर महादेव मंदिर एक ऐसा पावन केंद्र है, जहां शिव कामना को करुणा में रूपांतरित करते हैं।यह मंदिर केवल मनोकामना पूर्ति का स्थान नहीं, बल्कि यह अहंकार, इच्छा और भक्ति के संतुलन की अद्भुत कथा को जीवंत करता है।

पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, एक समय ब्रह्माजी सृष्टि रचना की दिव्य योजना में ध्यानमग्न थे। उसी क्षण उनकी अंतःकामना से एक अत्यंत रूपवान और तेजस्वी पुत्र प्रकट हुआ। ब्रह्माजी के प्रश्न करने पर उस बालक ने स्वयं को उनकी कामना का प्रतिरूप बताया।

ब्रह्माजी ने उसे सृष्टि विस्तार का कार्य सौंपा। किंतु वह पुत्र—जिसे कंदर्प कहा गया—आज्ञा पाकर भी अपने कर्तव्य से विमुख होकर अंतर्धान हो गया।कर्तव्य विमुखता से क्रोधित ब्रह्माजी ने अपने नेत्रों से उत्पन्न अग्नि द्वारा उसे भस्म करने का श्राप दे दिया। किंतु कंदर्प के दीन-भाव से क्षमा याचना करने पर ब्रह्माजी का हृदय करुणा से भर उठा।उन्होंने कहा—“तुम पूर्णतः नष्ट नहीं होगे। तुम स्त्री शरीर के बारह अंगों में निवास करोगे और संसार को आकर्षण के सूत्र में बांधोगे।”साथ ही ब्रह्माजी ने उसे पुष्पों का धनुष और पांच पुष्प-बाण प्रदान किए।

यहीं से कामदेव का संसार में प्रभाव आरंभ हुआ।अपने सामर्थ्य और प्रभाव से अभिभूत कंदर्प जब अहंकार में डूब गया, तब उसने तपस्यारत भगवान शिव को भी वशीभूत करने का प्रयास किया। यह प्रयास शिव की तपश्चर्या और ब्रह्मचर्य के विरुद्ध था।महादेव ने नेत्र खोले,और तीसरा नेत्र खुलते ही काम भस्म हो गया।यह केवल देह का दहन नहीं था, यह अहंकार और असंयम का विनाश था।पति-वियोग में व्याकुल रति का विलाप दिशाओं में गूंज उठा। तब आकाशवाणी हुई—“शोक मत करो। तुम्हारा पति अब अनंग (देहहीन) रहेगा। यदि वह महाकाल वन जाकर भगवान शिव की उपासना करेगा, तो उसे अपना उद्देश्य और अस्तित्व पुनः प्राप्त होगा।”देहहीन कंदर्प महाकाल वन पहुंचा।

गंधर्ववती घाट के समीप स्थित शिवलिंग के सम्मुख उसने कठोर तपस्या आरंभ की। यह तप अहंकार रहित, कामना शुद्ध और समर्पण से पूर्ण था।उसकी निस्वार्थ भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और कहा“आज से यह शिवलिंग तुम्हारे नाम से कंदर्पेश्वर, अर्थात मनकामनेश्वर महादेव कहलाएगा। यहां आने वाला प्रत्येक भक्त, यदि श्रद्धा और संयम के साथ कामना करेगा, तो उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।”दर्शन फल और तिथि विशेष मान्यता है कि चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को श्री मनकामनेश्वर महादेव के दर्शन करने वाला भक्त—सौभाग्य प्राप्त करता है।दांपत्य जीवन में सुख पाता है,मनोकामना की पूर्ति करता है और अंततः देवलोक का अधिकारी बनता हैं।

मनकामनेश्वर महादेव हमें यह सिखाते हैं कि—शिव कामना के विरोधी नहीं हैं,वे असंयम और अहंकार के विरोधी हैं। वे इच्छाओं का दमन नहीं करते,बल्कि उन्हें भक्ति, मर्यादा और संतुलन की दिशा देते हैं।आज के भौतिक और भोगप्रधान युग में यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है कि-

यदि इच्छा को अहंकार से मुक्त कर श्रद्धा, संयम और समर्पण के साथ परमशक्ति को अर्पित किया जाए,तो वही कामना सौभाग्य, शांति और कल्याण का कारण बन जाती है।यही शिव हैं- जो भस्म में भी विश्वास बोते हैं, जो दंड में भी करुणा रखते हैं और जो कामना को कल्याण में रूपांतरित कर देते हैं।हर हर महादेव।