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संवाद कम, सियासी अभिनय ज्यादा

सार

संसदीय राजनीति का फॉर्मेट भी क्रिकेट और फिल्मों जैसा बदल गया है. अब टेस्ट मैच नहीं T-20 का दौर है. तीन घंटे की फिल्मों से ज्यादा OTT का जमाना है. OTT पर सेंसर नहीं है..!!

janmat

विस्तार

    संसदीय राजनीति भी OTT के दौर में पहुंच गई है. कोई भी सेंसर को मानने को तैयार नहीं है. स्पीकर जो नियमों को मुताबिक सांसदों को सेंसर करता है, उसके खिलाफ ही नो कॉन्फिडेंस का अभिनय उसके कॉन्फिडेंस को कमजोर करने के लिए किया जाता है. सबको पता है, यह मोशन अपनी मौत मर जाएगा लेकिन सियासत का यही रूप संसद में छाया हुआ है. 

    नेता विपक्ष राहुल गांधी को पूर्व सेना प्रमुख की अप्रकाशित पुस्तक पर सदन में बोलने नहीं दिया जाता. दूसरी तरफ भाजपा के सांसद जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और दूसरे कांग्रेसी नेताओं पर प्रकाशित कई पुस्तकों का उल्लेख करने में सफल हो जाते हैं. इनमे कई पुस्तकें प्रतिबंधित थी. सदन के रिकॉर्ड से उन्हें हटा दिया गया. रिकॉर्ड और उसे हटाने का भी अभिनय गजब है. जो मैसेज देना है, वह दे दिया जाता है. पूरे देश में चर्चा हो जाती है और रिकॉर्ड से हट जाता है.

    राहुल गांधी को नहीं बोलने दिया जाता तो कांग्रेस स्ट्रेटजी के तहत महिला सांसदों को आसन के करीब भेजकर प्रधानमंत्री को भी बोलने नहीं देती. लोकसभा स्पीकर सदन को बताते हैं कि उनके पास ठोस जानकारी थी कि पीएम के आने पर सदन में अप्रत्याशित घटना हो सकती है इसलिए उन्होंने ही PM से सदन में न आने का अनुरोध किया था. 

    कांग्रेस की सांसदों पर स्पीकर का यह आरोप सियासत का ही हिस्सा लगता है लेकिन सदन के इतिहास में यह दर्ज हो चुका है कि महिला सांसदों के विरोध के कारण पीएम राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में अपना भाषण नहीं दे सके. उन्हें राज्यसभा में अपनी बात रखनी पड़ी.

    कांग्रेस मुद्दा बना रही है कि प्रधानमंत्री महिला सांसदों से डर गए साथ ही यह सवाल कर रही है कि क्या कांग्रेस की महिला सांसद PM पर हमला कर देतीं? अगर कांग्रेस के सांसदों के सामने बीजेपी की महिला सांसद भी आ जाती तो कोई अप्रत्याशित घटना भी हो सकती थी. राहुल गांधी के पूज्य पिता पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या एक महिला आत्मघाती मानव बम द्वारा ही की गई थी. इसलिए यह कहना कि कोई भी अपराध महिला नहीं कर सकती है झूठ ही लगता है. कांग्रेस तो इसकी भुक्त भोगी भी है. 

    संसद के बजट सत्र में विवाद की शुरुआत राहुल गांधी के भाषण से शुरू हुई, जब उन्होंने पूर्व सेना अध्यक्ष की पुस्तक के हवाले से उद्धरण देने का प्रयास किया. रक्षा मंत्री और गृहमंत्री ने कहा यह पुस्तक प्रकाशित नहीं है. राहुल गांधी पुस्तक की प्रति लेकर आ गए. अब तो पुस्तक के प्रकाशक ने स्पष्टीकरण दिया है कि किताब अभी तक किसी भी प्रारूप में प्रकाशित नहीं हुई है. दिल्ली पुलिस ने पुस्तक का ड्राफ्ट लीक होने का अपराध पंजीकृत कर लिया है. 

    राहुल गांधी को यह बताना चाहिए कि जो पुस्तक वह दिखा रहे हैं वह उन्हें कहां से मिली है? प्रकाशक के दावे के बाद सवाल है कि क्या पुस्तक दिखाने में भी झूठ का सहारा लिया गया है? जहां तक राहुल गांधी के बोलने का सवाल है, सदन में नेता प्रतिपक्ष को बोलने का अवसर निश्चित रूप से मिलना चाहिए. 

    अब तक राहुल गांधी ने पूर्व सेना अध्यक्ष की किताब के हवाले से केवल यही बात सदन के बाहर भी कही है कि जब भारत और चीन की सेना आमने-सामने थी तब सेना अध्यक्ष द्वारा रक्षा मंत्री से बात किए जाने पर कुछ घंटे के बाद केवल यही कहा गया कि जो उचित समझें वह कर लें. हर बार खुद का निर्णय देना ही डिसीजन नहीं होता. फील्ड के अफसर को स्वतंत्रता देना भी महत्वपूर्ण निर्णय होता है. 

    स्पीकर के खिलाफ नो कॉन्फिडेंस में राहुल गांधी और कांग्रेस का गठबंधन ही एक्सपोज़ हो रहा है. विपक्ष के सभी सांसदों ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. सरकार ये साबित करना चाहती है कि राहुल गांधी में विपक्ष का कॉन्फिडेंस नहीं है, तो राहुल गांधी यह साबित करना चाहते हैं कि पीएम मोदी कॉम्प्रोमाइज हैं. 

    अंततः सत्ता और विपक्ष जो भी राजनीतिक संदेश दे रहें हैं  उसको मतदाता किस रूप में स्वीकार कर रहे हैं वही सबसे महत्वपूर्ण है. जिस पक्ष के संदेश को मतदाता स्वीकार करते हैं उसे ही चुनाव में विजयी बनाते हैं. 

    राहुल गांधी की राजनीतिक असफलता यही है कि वे पार्टी को चुनावी जीत दिलाने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं. प्रधानमंत्री के लोकसभा में नहीं बोलने पर कांग्रेस ने X पर पोस्ट किया -'लोकसभा तो झांकी है पीएमओ से हटाना बाकी है’. यह कांग्रेस का राजनीतिक संकल्प हो सकता है लेकिन ये सोशल मीडिया पोस्ट से पूरा नहीं होगा. इसके लिए जमीनी संघर्ष करना होगा. जनता का भरोसा हासिल करना होगा जिसमें कांग्रेस लगातार असफल हो रही है.

    संसद लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर है. वहां से तो कम से कम सत्य ही सामने आना चाहिए. चाहे सरकार की ओर से हो चाहे विपक्ष की ओर से हो. अगर सच्चाई उजागर नहीं की जाएगी तो फिर लोकतंत्र ही कमजोर होगा. 

    जब दोनों गठबंधनों के नेतृत्व के बीच में संवाद की संभावना समाप्त हो गई है तो फिर एक दूसरे को लेकर झूठा नेरेटिव बनाना स्वाभाविक है. यही इस समय हो रहा है. हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि देश हित के मुद्दे भी सियासी हिसाब से खेले जा रहे हैं. INDO-US ट्रेड डील को भी सियासी नजरिए से देखकर सब अपने अपने पैंतरे चल रहे हैं. 

    राजनेताओं की बुद्धि से ज्यादा जनमत का विवेक लोकतंत्र की ताकत है. जब उसको चुनाव में अवसर मिलता  है तब वह फैसला सुनाता है. जनादेश का फैसला ही अंतिम है और इसी अनुसार देश चलेगा नो कॉन्फिडेंस का अभिनय जनादेश पर चोट नहीं पहुंचा सकता.