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देश को नये कर ढांचे की दरकार

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Tue , 29 May

सार

देश में गरीबी-रेखा से नीचे जीने वालों का प्रतिशत धीरे-धीरे ही सही, पर घट रहा है। अब यह गति उलटी तरफ चल पड़ी है और वह भी बहुत तेजी से।

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विस्तार

दुष्काल और उसके परिणाम स्वरूप बेरोजगारी और महंगाई तेजी दे बढ़ी है |कई अध्ययन यह बता रहे हैं कि पिछले कुछ समय में एक बहुत बड़े वर्ग की आमदनी आधी से भी कम हो चुकी है। वह भी उस दौर में, जब महंगाई बहुत तेजी से बढ़ी है।

देश के कई हिस्सों में बेरोजगार सड़कों पर हैं। उनकी हताशा का कोई पक्का इलाज नहीं ढूंढ़ा गया, तो ये परेशानियां लंबे समय के लिए बढ़ सकती हैं।वस्तुत: ये सिर्फ लोगों की आमदनी घटने और उससे पैदा होने वाली तकलीफें ही नहीं हैं। इसमें वे लोग भी शामिल हैं, जिनकी आमदनी इस दौर में बहुत तेजी से बढ़ी है।दुष्काल का यह का आर्थिक असमानता बढ़ने का दौर भी रहा है। एक पिछला दौर था, जब यह कहा जाने लग गया था कि देश में गरीबी-रेखा से नीचे जीने वालों का प्रतिशत धीरे-धीरे ही सही, पर घट रहा है। अब यह गति उलटी तरफ चल पड़ी है और वह भी बहुत तेजी से। यह साफ नहीं है कि क्या तेजी से बढ़ रही है- गरीबों की गरीबी या अमीरों की अमीरी?

विश्व असमानता रिपोर्ट हमें पहले ही बता चुकी है कि देश का ५७ प्रतिशत धन इस समय सिर्फ १० प्रतिशत लोगों की जेब में है। भारत ही नहीं, यह पूरी दुनिया में हुआ है। ऑक्सफैम की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के दस बड़े खरबपतियों की आमदनी इस समय१५००० डॉलर प्रति सेकंड की दर से बढ़ रही है। इस बीच आई एक अन्य रिपोर्ट यह बताती है कि दुष्काल के दौर में दुनिया को ६०७ नए अरबपति मिले हैं, जिनमें५५ भारतीय उद्यमी हैं। पूरे समाज की तकलीफ और असमानता बढ़ने से|

एक रास्ता दुनिया के कुछ अमीरों ने सुझाया है। पिछले दिनों विश्व आर्थिक मंच के वर्चुअल सम्मेलन में दुनिया के तकरीबन१०० अरबपतियों ने साझा तौर पर यह अपील की है कि इस सूरत को बदलना होगा। उनका कहना है कि दुनिया भर में कर की जो व्यवस्था है, वह जायज नहीं है, यह व्यवस्था असमानता बढ़ा रही है। अगर आर्थिक मंदी से मुक्ति पानी है, तो अमीरों पर टैक्स बढ़ाने पडे़ंगे। उन्होंने संपत्ति कर शुरू करने का सुझाव दिया है। अरबपति इस तरह की बात करें, ऐसे अवसर बहुत कम आते हैं। आमतौर पर तो वे यही कहते हुए पाए जाते हैं कि अगर उन पर कर के बोझ कम कर दिए जाएं, तो उनके अलावा दुनिया का भी ज्यादा भला होगा। हर साल बजट से पहले भारत में विभिन्न उद्योग संगठन सरकार को अपने-अपने प्रतिवेदन देते हैं। उनमें ज्यादातर कर घटाने और सहूलियत बढ़ाने की ही मांगें होती हैं।

भले ही कर बढ़ाने की मांग करने वालों में भारतीय अमीर नहीं हैं, लेकिन क्या बजट बनाते समय सरकार को इस मांग पर ध्यान नहीं देना चाहिए? इसी से जुड़ा दूसरा सवाल यह है कि क्या सरकार को वह संपत्ति कर फिर से शुरू कर देना चाहिए, जिसके प्रावधान को इसी सरकार ने २०१५ के बजट में खत्म कर दिया था? और, क्या इससे सचमुच कोई बहुत बड़ा फायदा होगा? संपत्ति कर को लेकर हाल के दिनों में एक विश्वविद्यालय ने एक अध्ययन किया है, जिसमें इस टैक्स को फिर से लागू करने की पैरवी की गई है। इसी के साथ एक दूसरे संस्थान की राय भी आई है, जो कहती है कि अगर इस टैक्स को बहाल किया गया, तो हासिल कुछ नहीं होगा और समस्याएं ही बढ़ेंगी। सवाल यह भी पूछा जा सकता है कि जब यह टैक्स मौजूद था, तब क्या इसकी वजह से आर्थिक असमानता बढ़ने पर कोई रोक लग सकी थी? अभी भी हमारे पास कैपिटल गेन टैक्स, गिफ्ट टैक्स, आयकर पर सरचार्ज जैसी बहुत सी ऐसी कराधान व्यवस्थाएं हैं, जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे संपत्ति के बहुत ज्यादा संचय पर रोक लगाएंगी। फिर भी ऐसा हुआ क्यों नहीं?

बहुत सी टैक्स व्यवस्थाएं सिर्फ सैद्धांतिक होती हैं। व्यवहार में वे अमीरों पर बहुत ज्यादा दबाव नहीं बनातीं। और, अगर इन्हें लेकर अतिरिक्त दबाव बनाया जाए, तो काले धन का प्रसार ही बढ़ता है। एक दौर में ऐसी कंपनियों की संख्या काफी थी, जो कोई कर नहीं देती थीं और उन्हें ‘जीरो टैक्स कंपनीज’ कहा जाता था| देश एक ऐसे दौर में, जब राज्य का कल्याणकारी रूप लगातार छोटा होता जा रहा है, महज कर व्यवस्था में बदलाव करके किसी बड़े कायाकल्प की उम्मीद नहीं बांधी जा सकती। यह मामला उन आर्थिक नीतियों और नीयत का है, जो बजट जैसी अवधारणा का मूल हैं।