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चुनाव क्या उभारते हैं विभाजन के घाव? ध्रुवीकरण पर ही टिक गया है यूपी का चुनाव|

सार

देश के विभाजन की त्रासदी की परिस्थितियों को फील करना है तो यूपी चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश आ जाइए| मुगल सल्तनत से लेकर हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण और भारत के विभाजन के सारे किरदार गांधी, नेहरू, जिन्ना, पटेल, सब की मौजूदगी आप महसूस करेंगे|

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विस्तार

विकास के मुद्दों पर शुरू हुआ चुनाव इस बार फिर हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण पर टिक गया है| चाहे पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कैराना हो, शामली हो, मुजफ्फरनगर हो या और कोई भी जिला हर जगह हिंदू और मुस्लिम विभाजन साफ झलक रहा है| पूरा चुनाव अभियान मजहब के इर्द-गिर्द घूम रहा है| समाजवादी पार्टी और बीजेपी मुस्लिम और हिंदू पक्षकार बने दिखाई पड़ रहे हैं| जनता के मुद्दे महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, चुनावी मुद्दे बनने में इस बार भी असफल हो गए हैं| सभी दल मजहब और जाति की राजनीति को आगे बढ़ाने में अपना हित देख रहे हैं|

भगवा, लाल टोपी, हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बाद अब कब्रिस्तान, मंदिर की भी एंट्री चुनाव अभियानों में हो गई है| पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट मतदाताओं को लुभाने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जाटों से अपना रिश्ता बताते हुए कहते हैं हम सब 650 सालों से साथ हैं, तब से मुगलों से लड़ रहे हैं| पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंदू मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण विस्फोटक स्थिति में पहुंच चुका है| कैराना से तो हिंदुओं को पलायन करना पड़ा| हिंदुस्तान पाकिस्तान के विभाजन के समय जो लोग अपनी जड़ों से कटे थे आज भी वह उस दर्द को महसूस करते हैं| हर साल किसी न किसी राज्य में होने वाले चुनाव विभाजन के दर्द को उभारने का काम करते हैं| 

विभाजन का दर्द ही सत्ता की दवा बन जाती है| इसके लिए हिंदुत्व की राजनीति ही अकेले जिम्मेदार नहीं है, वोटों के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाली पार्टियाँ भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं|  

उत्तर प्रदेश में आज कितने मुस्लिम प्रत्याशी है जो जेल से चुनाव लड़ रहे हैं| इनमे से अधिकांश समाजवादी पार्टी और उसके सहयोगी दलों से उतारे गए हैं|  योगी आदित्यनाथ यदि यूपी के चुनाव को 80-20 के बीच का चुनाव कहते हैं तो समाजवादी पार्टी इसे  85-15 का चुनाव बताती है| सपा मुस्लिम के साथ पिछड़ों और दलितों को अपने साथ जोड़ते हुए केवल सवर्ण को भाजपा के साथ जोड़ते हुए 85-15 का चुनाव बताती है|

भारतीय राजनीति में आजादी के बाद से ऐसा कोई चुनाव नहीं हुआ जहां हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण और विभाजन के दर्द को न उभारा गया हो| पहले यह हिंदुओं को किनारे करने की दृष्टि से उपयोग किया जाता था लेकिन अब तुष्टीकरण के खिलाफ हिंदू एकीकरण के लिए| अब ध्रुवीकरण हिंदुओं के पक्ष में हो गया है| राजनीति का ये हिंदुत्व काल कहा जा सकता है|

जो राजनीतिक दल मुस्लिम राजनीति की बुनियाद पर सत्ता हासिल करते रहे हैं उनमें भी अब इतना साहस नहीं है कि वह मुस्लिमों के पक्ष में सार्वजनिक रूप से कुछ कह सकें|

यूपी चुनाव हिंदू-मुस्लिम मंदिर-मस्जिद और मजहब पर सवार है, लेकिन मुस्लिम मतों के आकांक्षी भी मुस्लिमों के पक्ष में कोई भी बात कहने से डर रहे हैं| ऐसे राजनीतिक दलों को शायद पश्चिम बंगाल के चुनाव से सीख मिली है| 

हालाकि पश्चिम बंगाल और यूपी की राजनीतिक परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं|  पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट और कांग्रेस रसातल में पहुंच गई इसलिए ममता बनर्जी को लाभ हो गया| भाजपा भले सत्ता में ना आ पाई हो लेकिन उसे राजनीतिक फायदा ही हुआ है| बंगाल में भाजपा 2 सीटों से 77 सीटों पर पहुंची है| 

उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जहां हिंदुओं के सभी तीर्थ स्थल मौजूद हैं| भगवान राम का जन्म स्थान अयोध्या, शिव की नगरी काशी और भगवान कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा उत्तर प्रदेश में ही हैं| 

उत्तर प्रदेश में हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण कटु सत्य के रूप में हमारे सामने है| ध्रुवीकरण के लिए राजनेता भी ज़िम्मेदार हैं और मजहब को देश से बड़ा मानने वाले भी| आजादी के बाद की राजनीति में कभी मुस्लिम तो हावी रहा तो कभी हिंदू|  

जानकार मानते हैं कि आम मुसलमान राष्ट्र विरोधी नहीं है लेकिन उन्हें वोटबैंक की राजनीती के चलते इतना डरा दिया जाता है कि वे दल विशेष के विरोध के साथ कई बार राष्ट्र विरोधी तत्वों के साथ खड़े नजर आते हैं| दरअसल इन्हें सोची समझी साजिश के तहत भडकाया जाता है|  भारत पाकिस्तान का बटवारा आम मुस्लिमों की मांग नहीं थी लेकिन जिन्ना सहित कुछ ख़ास तत्वों नें अपने निजी स्वार्थों के लिए इनकी मजहबी भावनाओं का इस्तेमाल कर देश को दो हिस्सों में तोड़ दिया|  जैसे पूर्व राष्ट्रपति हामिद अंसारी को ही ले लीजिये, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने एक बार फिर से विवादित बयान दिया । उन्होंने अमेरिका के चार सांसदों के साथ भारत में मानवाधिकारों की मौजूदा स्थिति पर चिंता व्यक्त की  और कहा है कि देश में असुरक्षा का माहौल बढ़ रहा है। 'इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल' की चर्चा में भाग लेते हुए पूर्व उपराष्ट्रपति अंसारी ने हिंदू राष्ट्रवाद की बढ़ती प्रवृत्ति पर अपनी चिंता व्यक्त की। अंसारी ने भारतीय गणतंत्र का जो अपमान किया है वह ऐसा ही प्रयास है जैसा मुस्लिमों को बरगला कर राजनैतिक हित साधा जाता है| जो अंसारी कट्टर मुस्लिम राजनीति करते हुए भी 2 बार उपराष्ट्रपति के संवैधानिक पद तक पहुंच सकते हैं| उनका देश के मुस्लिमों को दोयम दर्जे का बताना उनकी स्वार्थी साजिश के अलावा और क्या हो सकता है| हामिद अंसारी को  ऐसी क्या बेकरारी थी कि उन्होंने उन्होंने सारी मर्यादा तोड़ दी|  यदि भारत विरोधी उनके बयानों को भाजपा विरोधी ना माना जाए तो उनके देश विरोधी वक्तव्य को आम मुसलमान भी स्वीकार नहीं करेगा|

बीजेपी से जुड़े एक चिंतक का मनना है कि एक दशक से ज्यादा समय से देश के कई राज्यों और अब तो केंद्र में भी भाजपा की सरकार काम कर रही है| किस राज्य के मुसलमान भाजपा सरकारों में अन्याय झेल रहे हैं? उनका कहना है कि भाजपा चुनाव के समय हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण पर भले ही राजनीतिक लाभ लेती हो लेकिन उसकी किसी सरकार में कहीं भी धर्म और जाति का भेद नहीं होता| बीजेपी नेता कहते हैं कि भाजपा सरकारों ने एक नई शैली से योजनाओं का निर्माण किया है, जिसमें सभी धर्म और समुदाय के लोगों को योजनाओं का लाभ मिलता है| चाहे प्रधानमंत्री आवास योजना हो, उज्जवला योजना हो या आयुष्मान योजन, इनमें कोई जाति धर्म का भेदभाव नहीं है| 

खैर चुनाव प्रक्रिया पूर्ण होते ही राजनीतिक दलों की चुनावी नैय्या तो किनारे लग जाएगी| लखनऊ के प्रशासनिक धाम पर नया किंग बैठ जाएगा| लेकिन चुनाव में हिंदू मुस्लिम विभाजन जो घाव बढ़ेगा वो शायद लम्बे समय तक ना भर सके|  सभी समाज, समुदाय और सभी राजनीतिक दल सोच विचार के स्तर पर एकजुटता लाएं और सामाजिक सामुदायिक एकता का एक नया अध्याय लिखें यह तो भविष्य की बात है, लेकिन यूपी चुनाव का फैसला तो हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण पर ही आने की संभावना दिख रही है|