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शिक्षा : विकसित पर अपर्याप्त तंत्र

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 15 Jun

सार

17 वीं जन विज्ञान कांग्रेस भोपाल में 6 से 9 जून 2022 को आयोजित हो रही है..!

janmat

विस्तार

17 वीं जन विज्ञान कांग्रेस भोपाल में  6 से 9 जून 2022 को आयोजित हो रही है| इसे आयोजित करने वाली संस्था से मेरा कोई सीधा सरोकार नहीं है, पर अपनी इस मान्यता के चलते कि “ धर्म और विज्ञान को राजनीतिक विचार से परे रखना चाहिए” मैत्री भाव से आयोजक समिति के सदस्यों के साथ प्रदेश के कुछ अधिकारियों  और एक मंत्री जी से पिछले दिनों मिला | मंत्री जी ने अचानक रिक्त हुए अपने समय का सदुपयोग  किया और मेरे अतिरिक्त प्रतिनिधि मंडल में शामिल शिक्षाविदों और वैज्ञानिकों से शिक्षा के भविष्य पर सवाल पूछ डाला | सवाल गंभीर था, उसने मुझे  “भारत: वर्तमान शिक्षा परिदृश्य”पर  चिन्तन का अवसर दिया |

यह अकाट्य तर्क है और सत्य भी है कि आज बिना शिक्षा के प्रतिष्ठा नहीं मिल सकती। आधुनिक दुनिया में जीने के लिए शिक्षा अनिवार्य है और अच्छे रोजगार के लिए शिक्षा  जरूरी  है। आम आदमी की ये अपेक्षाएं शिक्षा के उद्देश्यों और पाठ्यक्रम संबंधी हमारे लक्ष्यों से सीधे-सीधे जुड़ी हुई भी हैं। इसके विपरीत हमारा शिक्षा तंत्र बच्चों में बुनियादी समझ विकसित करने के मामले में विफल साबित हो रहा है, साथ ही निर्धारित अ अन्य लक्ष्यों को पूरा करने में असफल भी । 
शिक्षा प्रणाली की इस कमजोरी से ही युवाओं में अल्प-रोजगार या बेरोजगारी की दर बढ़ा रही है।

मूल में पर्याप्त संख्या में नौकरियों व आजीविका के नए अवसरों का पैदा न होना है, लेकिन हमारी स्कूली व उच्च शिक्षा प्रणाली इसमें  बराबर की भागीदार है । स्थापित तथ्य है शिक्षा तंत्र में गुणवत्ता और समानता की बुनियादी विफलताओं का गहरा व व्यापक प्रभाव तमाम विषयों पर पड़ता है, जिसमें नौकरियों और रोजगार तक पहुंच भी शामिल है। हमारे समाज के ज्यादातर हिस्सों की तरह, शिक्षा भी इस सोच से नत्थी है कि हमारी सर्वोच्च क्षमता ‘दिमाग चलाना’ है। इसमें ‘हाथ चलाने’ काम करने [हाथ चलाने] जैसी भावना को बहुत ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता है। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि व्यावसायिक शिक्षा को अकादमिक शिक्षा की तुलना में कमतर आँका जाता है| अकादमिक शिक्षा में भी ‘काम करने’ को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता। मूल्यांकन-कार्यों में तो हास्यास्पद रूप से ‘प्रैक्टिकल’ को कम वजन दिया जाता है। यहां तक कि व्यवसायिक कॉलेजों में भी अभ्यास कराने के बजाय लिखने और बैठने पर जोर दिया जाता है। 

एक और बात क्षमता के विकास पर नाममात्र या बिल्कुल ध्यान नहीं  दिया जाता है , जिसे आमतौर पर ‘कौशल’ कहा जाता है। कौशल असल में अपने हाथों से विभिन्न तरह के काम  करने का ही नाम है। इसके कई आयाम हैं। यह ज्ञान और कौशल के बीच एक कृत्रिम अलगाव पैदा करता है। अनादि काल से ‘क्या जानें’ और ‘कैसे जानें’  हमारे   शैक्षिक दर्शन का मूल है और दोनों में अटूट संबंध भी  है। दिमाग और हाथ को मिलकर काम करना पड़ता है। इसके विपरीत आज देश में व्यावसायिक और अकादमिक शिक्षा की एक-दूसरे से दूरी निरंतर बढ़ रही है।

पिछले कुछ दशकों में दोनों के बीच यह खाई ज्यादा गहरी हुई है, एक संपूर्ण ‘कौशल प्रशिक्षण’ तंत्र का उदय हुआ है, जो बड़े शहरों  तक  ही सीमित है, इसे स्कूल  के निचले पायदान तक पहुंचना जरूरी है ।  यही मंत्री जी की चिंता का वास्तविक उत्तर हो सकता है | शिक्षा क्षेत्र में अभी सम्पूर्ण विकसित और अपर्याप्त तंत्र मौजूद हैं। हमारा अकादमिक शिक्षा तंत्र ‘कैसे जानें’ की अनदेखी करता है। कौशल प्रशिक्षण और व्यावसायिक शिक्षा तंत्र ‘क्या जानें’ के अभाव से ग्रस्त  है। इस प्रक्रिया में अकादमिक शिक्षा तक पहुंच रखने वाले लोगों को व्यावसायिक शिक्षा व कौशल प्रशिक्षण में जबरन धकेल दिया गया है | इससे लोगों के बीच की असमानताएं बढ़ी हैं।

जन विज्ञान कांग्रेस भोपाल में हो रही है, एक समग्र शिक्षा विकास और व्यवहार पर एक विचार अनुष्ठान जरूरी है | इससे देश, देश हित समझने की प्रारम्भिक समझ विकसित होगी | इस समझ के विकास में “राजनीति” नहीं होना चाहिए, “देश नीति” पर विचार होना चाहिए , सारे परहेज ताक पर रखकर |