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चुनाव परिणाम, माहौल को विषाक्त मत बनाईये 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Thu , 03 Mar

सार

७५ बरस बाद भी देश जनतंत्र का ककहरा सीख रहा हैं। चुनाव, मतदान और परिणाम से सरकार बनाने तक होने वाली कवायद में बहुत सुधार बाकी है। कोई जीते या हारे, लेकिन जनतंत्र-निर्माण का काम चुनाव से पहले से लेकर चुनाव के बाद तक जारी रखने की चुनौती है और बहुत बड़ी है ।

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विस्तार

अगले कुछ घंटों में देश के पांच राज्यों के चुनाव नतीजे सामने होंगे | जीत- हार के जुलूस के साथ समाज में कटुता का भी प्रदर्शन होगा, जो बहुत चिंताजनक है | कोई भी जीते- कोई भी हारे, माहौल विषाक्त नहीं होना चाहिए | कोई भी राजनीतिक दल अभी इस दिशा में काम करता दिखाई नहीं दे रहा है | चुनाव के जरिये जनप्रतिनिधियों के चयन की इस प्रक्रिया में अपने विरोधी दलों को निकृष्ट और समाज के खलनायक के रूप में चित्रित करने की बीमारी लगातार बढ़ रही है। ऐसा नहीं होना चाहिए, क्या कोई भी जनतांत्रिक सरकार बिना सक्षम और समर्थ विरोधी दलों के चल सकती है ? 

दुर्भाग्य, हमारे राजनेता देश की परम्परा और इतिहास को पढना और समझना नहीं चाहते |दो प्रसंग याद आ रहे हैं, जो भारत की परम्परा के परिचायक हैं | याद कीजिये, जब जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ डॉ राममनोहर लोहिया ने १९६२ के चुनाव में अपना पर्चा फूलपुर संसदीय क्षेत्र से भरा, तो नेहरू जी ने एक पत्र लिखकर डॉ लोहिया को न सिर्फ शुभकामनाएं दीं थी , बल्कि यह भी आशा प्रकट की कि चुनाव प्रचार के दौरान दोनों पक्षों की तरफ से देशहित की चुनौतियों के संदर्भ में नीतियों और कार्यक्रमों पर लोक-शिक्षण का काम किया जाएगा। दूसरा प्रसंग- आपातकाल में जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा अपने नैतिक बल के जरिये बनाई गई जनता पार्टी को प्रबल बहुमत मिला, तो जयप्रकाश नारायण ने जनता पार्टी के नवनिर्वाचित सांसदों को राजघाट पर बापू की याद दिलाते हुए आदर्श जनसेवक बनने की बाकायदा शपथ दिलाई और उसके बाद पराजित हो चुकी पूर्व प्रधानमत्री इंदिरा गांधी से मिलने उनके घर गए। जब जयप्रकाश पराजित इंदिरा गांधी से मिले, तो उन्होंने अपनी तरफ से और विजयी जनता पार्टी की तरफ से उनको निजी सुरक्षा को लेकर निश्चिंत रहने का पूरा भरोसा दिलाया। ये प्रसंग आज चुनावी नतीजों के साथ और उसके बाद भी याद करना जरूरी है |

वर्तमान में राजनीतिक दल तो चुनाव प्रक्रिया से जनतंत्र-निर्माण के बजाय व्यक्ति की महिमा और दलों के एकाधिकार का अवसर से ज्यादा कुछ बना ही नहीं रहे हैं। जो पूरी तरह से राजनीतिक असहिष्णुता और सीमित तानाशाही की पृष्ठभूमि बनाती दिखती है। चुनाव को हुल्लड़ और जानलेवा मुकाबले के रूप में बदलना चुनाव और जनतंत्र के बीच में अंतर्विरोध है। चुनाव की अनिवार्य और एक शर्त उसे मित्र भाव से लड़ना है, क्योंकि विभिन्न दलों के उम्मीदवार एक ही नाव में सवार होते हैं। विजयी हों या पराजित, उम्मीदवारों और दलों के हाथों में जनतंत्र की पतवार दिए बिना हमारी नाव एकाधिकारवाद की दलदल में फंसने को वैसे ही अभिशप्त हो जाएगी। जैसे अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया में हुआ है | पहले दल विशेष को भारी बहुमत मिलना, फिर उसके द्वारा सदन में संख्या बल के आधार पर पूरी व्यवस्था को एक दल आधारित बना देना, देश को उसी तरफ धकेला जा रहा है |जिसका अगला पायदान, किसी एक व्यक्ति को आजीवन राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री चुनकर लोगों के मतदान व बहुमत के दावे के आधार पर जनतंत्र को ही दफ्न कर देने का काम होने की शंका है | नाइजीरिया, युगांडा से लेकर इंडोनेशिया और मलयेशिया में यह सब हो चुका है। अभी जो दृश्य दिख रहा है वो चुनाव के अपराधीकरण और चुनावी जीत-हार को मरने-मारने की बीमारी के परिणाम से उपजता दिख रहा है | इस समय यह सवाल सहज उपस्थित हैं क्या देश के राजनीतिक दल जनतंत्र की चिता नहीं सजा रहे हैं? 

कभी हमने चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता का सम्मान करने की जिम्मेदारी उठाई थी, थोडा निभाया भी । जीतकर बहुमत पाने वाला दल अल्पमत में आए दलों और प्रवक्ताओं को अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों के बराबर महत्व देता था। इसे स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता की भावना के अनुकूल आचरण माना जाता था। मगर अब जीतने वाले दल और नायक खुद को एकमात्र जन-प्रतिनिधि और देशसेवक होने का दावा करने की बीमारी से पीड़ित देखे जाते हैं। और, बहुमत पाने में असफल दल चुनाव प्रक्रिया की वैधता से लेकर मतदाताओं पर मूर्खता तक का आरोप लगाते हैं। यह दोनों ही अनुचित है।

७५ बरस बाद भी देश जनतंत्र का ककहरा सीख रहा हैं। चुनाव, मतदान और परिणाम से सरकार बनाने तक होने वाली कवायद में बहुत सुधार बाकी है। कोई जीते या हारे, लेकिन जनतंत्र-निर्माण का काम चुनाव से पहले से लेकर चुनाव के बाद तक जारी रखने की चुनौती है और बहुत बड़ी है । चुनाव परिणामों की पूरी तस्वीर आने के पहले तक जिस प्रकार के तेवर और भाषा शैली का प्रदर्शन हो रहा है, वह हास्यास्पद , चिंताजनक और आत्मघाती है। यह सब काम जनतंत्र निर्माण की दिशा में अनुचित है।राजनीतिक दलों को संभलना और अपनी भक्त मंडली को संभालना चाहिए |