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अंगदान न होने से देश में हर साल पांच लाख मौतें

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 19 Jun

सार

देश में अंगों की अनुपलब्धता के कारण हर साल पांच लाख लोगों की मौत हो जाती है, इसके मुकाबले वर्ष 2022 में पंद्रह हजार अंगों का प्रत्यारोपण ही हो सका है..!

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विस्तार

प्रतिदिन विचार-राकेश दुबे 

06 /03 /2023

दुर्भाग्य ! देश में 640 चिकित्सा महाविद्यालय और अस्पताल  हैं, जिनमें अंग प्रत्यारोपण और स्तंभ कोशिका से उत्पादन का काम किया जा सकता है, लेकिन चंद चिकित्सा संस्थानों में ही अंग प्रत्यारोपण व उत्सर्जन की शल्य क्रिया सुविधा उपलब्ध है। अब  इनमें अंग प्रत्यारोपण व उत्सर्जन के पाठ्यक्रम भी नवीन चिकित्सा शिक्षा में जोडे गए हैं। 

चौंकिए मत ! देश में अंगों की अनुपलब्धता के कारण हर साल पांच लाख लोगों की मौत हो जाती है। इसके मुकाबले वर्ष 2022 में पंद्रह हजार अंगों का प्रत्यारोपण ही हो सका है। लोगों की जान बचाने के लिए जरूरत और उपलब्धता के बीच की इस खाई को पाटना जरूरी है। इसके दो ही उपाय हैं। पहला,अंगदान के लिए लोगों को जागरूक किया जाए और दूसरा, स्तंभ कोशिकाओं यानी स्टेम सेल के जरिए अंगों का उत्पादन बढ़ाया जाए।

इस प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाने के लिए भारत सरकार ‘एक राष्ट्र-एक नीति’ लागू करने जा रही है। जिससे अब अंगदान और उसका प्रत्यारोपण देश के किसी भी अस्पताल में कराया जा सकता है। भारत सरकार ने मूल निवासी प्रमाणपत्र की बाध्यता को हटाते हुए आयु सीमा की बाध्यता भी खत्म कर दी है। अंग प्राप्त करने के लिए अब जरूरतमंद रोगी किसी भी राज्य में पंजीकरण करा सकते हैं। 

पंजीकरण के लिए अब मरीजों से कोई शुल्क भी नहीं लिया जाएगा। अभी तेलंगाना,महाराष्ट्र, गुजरात और केरल जैसे राज्य अंगदान के पंजीकरण के बहाने पांच हजार से दस हजार रुपए के बीच शुल्क ले रहे थे। बीते दस सालों में अंग प्रत्यारोपण की मांग बढ़ी है, लेकिन उपलब्धता कम है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, अंग प्रत्यारोपण में सालाना सत्ताईस प्रतिशत की दर से वृद्धि हो रही है। मांग के अनुपात में पूर्ति नहीं हो पा रही है। 

देश में अंगों की अनुपलब्धता के कारण हर साल पांच लाख लोगों की मौत हो जाती है। दो लाख लोग यकृत, पचास हजार लोग हृदय और डेढ़ लाख लोग गुर्दा संबंधी बीमारियों से हर साल मरते हैं। हालांकि गुर्दा प्रत्यारोपण के लिए कई लोग अपना गुर्दा दान देने लगे हैं। लेकिन पूरे साल में पांच हजार रोगियों को ही गुर्दा दान में मिल पाते हैं। इनमें नब्बे फीसद गुर्दे महिलाओं के या निकटतम परिजनों के होते हैं। ऐसे में अंगों का कृत्रिम तरीके से उत्पादन जरूरी है।

मानव त्वचा की महज एक स्तंभ कोशिका (स्टेम सेल) को विकसित कर कई तरह के रोगों के उपचार की संभावनाएं उजागर हो गई हैं। स्तंभ कोशिका मानव शरीर के क्षय हो चुके अंग पर प्रत्यारोपित करने से अंग विकसित होने लगता है। करीब दस लाख स्तंभ कोशिकाओं का एक समूह सुई की एक नोक के बराबर होता है। ऐसी चमत्कारी उपलब्धियों के बावजूद समूचा चिकित्सा समुदाय इस प्रणाली को रामबाण नहीं मानता। 

गर्भनाल से निकले रक्त को शीत अवस्था में इक्कीस साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है। लेकिन इस बैंक में रखने का शुल्क कम से कम एक-डेढ़ लाख रुपए है। ऐसे में यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि गरीब लोग इन बैंकों का इस्तेमाल कर पाएंगे? सरकारी स्तर पर अभी इन बैंकों को खोले जाने का सिलसिला शुरू ही नहीं हुआ है। निजी अस्पतालों में इन बैंकों की शुरुआत हो गई है और पचहत्तर से ज्यादा बैंक कोशिकाओं के संरक्षण में लगे हैं। इस पद्धति से जिगर, गुर्दा, हृदय रोग, मधुमेह, कुष्ठ और स्नायु जैसे वंशानुगत रोगों का इलाज संभव है।

महिलाओं के मासिक धर्म के दौरान निकलने वाले रक्त में जीवन को निरोगी और दीर्घायु बनाने की क्षमता पाई गई है। नए शोधों से पता चला है कि इस रक्त में स्तंभ कोशिकाएं प्रचुर मात्रा में होती हैं, जिनका उपयोग अनेक बीमारियों के उपचार में किया जा सकता है। मुंबई में इन कोशिकाओं के संरक्षण की दृष्टि से ‘मेंस्ट्रूअल स्टेम सेल’ बैंक भी शुरू हो चुका है। शोधों से पता चला है कि रजस्वला स्त्री के रक्त से मिलने वाली स्तंभ कोशिकाओं में सफलता की संभावना अस्थि मज्जा से निकाली गई कोशिकाओं की बनिस्बत सौ गुना अधिक होती है। इनके संग्रह के लिए चिकित्सा विशेषज्ञ की भी जरूरत नहीं होती। 

वैसे स्तंभ कोशिकाओं से उपचार की ये प्रणालियां अभी शैशव अवस्था में हैं। उपचार भी महंगा है। इस कारण जिगर और गुर्दे की बीमारियों में प्रत्यारोपण की सबसे ज्यादा मांग है। फिलहाल अंग प्रत्यारोपण के लिए सबसे कारगर पद्धति अंगदान ही है। 

देश में 74.2 प्रतिशत महिलाएं परिजनों को अंगदान करती हैं, लेकिन उन्हें महज 21.8 प्रतिशत अंग दान में मिल पाते हैं। सत्तर प्रतिशत माताएं बच्चों को अंगदान करती हैं, जबकि तीस प्रतिशत पिता ऐसा करते हैं। पचहत्तर प्रतिशत दादी पोते-पोतियों के लिए अंगदान करती हैं, जबकि दादा पच्चीस प्रतिशत ही करते हैं। यानी लैंगिक भेद यहां भी बरकरार हैं। यह सब बदलने के लिए चैतन्य समाज की ज़रूरत है ।