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फ्री योजनाओं का डंका, कहीं हमें भी ना बना दे श्रीलंका? सरयूसुत मिश्र 

सार

भारत की डेमोक्रेसी फ्री योजनाओं की शिकार हो गई है. राजनीतिक दल फ्री बांटने की घोषणाओं में एक दूसरे से आगे निकल कर जनता का विश्वास हासिल करने में लगे हुए हैं. राजनीतिक लाभ के लिए राज्यों की अर्थव्यवस्था की बदहाली को रोकने की बजाए संकट को और बढ़ावा दिया जा रहा है. अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि फ्री योजनाओं का डंका बजाने के लिए राज्यों की सरकारें और नेता आत्मघाती आर्थिक कदम उठाते रहे तो कई राज्यों को श्रीलंका बनने से नहीं रोका जा सकेगा..!

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विस्तार

भारत और श्रीलंका का सनातन काल से सांस्कृतिक और भावनात्मक रिश्ता रहा है| लंका-कांड के बिना रामचरितमानस अधूरा ही रहता| कभी सोने की लंका आज दाने-दाने को मोहताज हो गई है| श्रीलंका के राजनीतिक नेताओं की स्वार्थी और गलत नीतियों के कारण श्रीलंका आज भुखमरी, महंगाई और जरूरी वस्तुओं के अकाल से जल रहा है|

भारत में ये चिंता लोगों को परेशान करने लगी है| राज्यों की सरकारों और नेताओं की फ्री योजनाओं का डंका बजाने की चुनावी राजनीति से, कहीं हम भी श्रीलंका जैसे हालात में तो नहीं फंस जाएंगे? नेताओं का अप्रोच देखिए की लंका में माता सीता का मंदिर बनाने की घोषणा भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री करते हैं|

राजनीति की यह दौड़ देखिए, राज्यों में सरकारी खजाने के लिए खतरे की घंटी बज रही है लेकिन नेताओं में होड़ लगी हुई है कि कौन कितनी खैरात बाँट सकता है| अधिकांश राज्यों में ढांचागत सुधार और पूंजी निवेश पर आगे बढ़ने की बजाय कर्ज लेकर बेतरतीब खर्चा किया जा रहा है| सबसे पहले हम पंजाब राज्य की चर्चा करते हैं| पंजाब में कर्ज पहले ही राज्य के घरेलू उत्पाद के अनुपात में 50% को पार कर गया है|

चालू वित्तीय वर्ष में तो यह आंकड़ा 52% के ऊपर पहुंच जाएगा| नवगठित आम आदमी पार्टी की सरकार ने 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने की योजना लागू कर दी है| लोकलुभावन मुफ्त योजना को लागू करने पर 12 हजार करोड़ रुपए का बोझ सरकार पर पड़ेगा| एक ऐसा राज्य जो पूरी तरह से कर्ज में डूबा हो, जहां आर्थिक आपातकाल की स्थिति हो, उस सरकार के लिए राज्य को आर्थिक संकट से उबारना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए थी या फ्री बिजली देना|

दिल्ली में केजरीवाल ने  बिजली पानी फ्री देने की घोषणा कर सरकार बनाई और  बनने पर दिया भी| बाकी राज्यों की स्थिति बिल्कुल अलग है, दिल्ली का स्थापना व्यय बाकी राज्यों की तुलना में कम है| दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अंतर्गत है| कानून व्यवस्था पर दिल्ली सरकार को कोई खर्चा नहीं करना पड़ता| लेकिन पंजाब जैसे राज्य में स्टैब्लिशमेंट एक्सपेंडीचर ही इतना अधिक है कि फ्री योजनाओं का भार यह राज्य सह नहीं सकेगा|

आम आदमी पार्टी बाकी राज्यों में होने वाले चुनाव में दिल्ली और पंजाब के रास्ते, उन्हीं फ्री योजनाओं को आधार बनाते हुए, राजनीतिक सफलता हासिल करने की तरफ बढ़ रही है| सरकार के खजाने से राजनीति करने का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा|

केजरीवाल और दूसरे मुख्यमंत्री भी अपनी छवि चमकाने के लिए अपने-अपने राज्यों के बाहर करोड़ों रुपए खर्च कर विज्ञापन प्रकाशित कराते हैं| इसका क्या औचित्य है| ये केवल सरकारी पैसे से राजनीतिक लाभ उठाने की सोच के अलावा और क्या हो सकता है| जो जनता आपकी वोटर नहीं है| उसको सरकार की उपलब्धियां या योजना बताने की क्या आवश्यकता है? 

बंगाल के आर्थिक हालात आश्चर्यजनक रूप से खराब होते जा रहे हैं| जो बंगाल 1980 में प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश में सातवें स्थान पर था| वही बंगाल आज इसी पैमाने पर देश में इक्कीसवे स्थान पर पहुंच गया| राज्य पर लगभग 6 लाख करोड का कर्ज है| यह ऋण जीएसडीपी के अनुपात में 35% है|

देश के कई राज्यों में कर्ज और जीएसडीपी का अनुपात राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन द्वारा निर्धारित 25% के ऊपर है| राज्यों में पूंजीगत व्यय लगातार घट रहा है| राज्य सरकारों के करों के अनुपात में सब्सिडी का गणित बिगड़ता जा रहा है| सरकारों द्वारा कर्ज लेकर बेतहाशा खर्चा करना आने वाली पीढ़ियों के साथ धोखे के अलावा क्या हो सकता है? 

मध्यप्रदेश में भी फ्री योजनाओं की भरमार है|  मध्यम श्रेणी के लोगों को महंगी दर पर बिजली लेनी पड़ रही है| लेकिन किसानों को सब्सिडी के नाम पर करोड़ों रुपए सरकार खर्च कर रही है| सरकारी पैसे से तीर्थ यात्रा कराने से तीर्थ का लाभ कैसे मिलेगा?

हमारी संस्कृति यही कहती है कि गाढ़ी कमाई से तीर्थ ही सफल माना जाता है? कोई मांग भी नहीं रहा है लेकिन वोट के लिए सरकारी पैसे से श्रवण कुमार की भूमिका सरकारें क्यों निभाना चाहती हैं? कन्या विवाह परिवार का दायित्व है, इस दायित्व में भी सरकार जनता की गाढ़ी कमाई खर्च करती है| अमीरों को लूटना और गरीबों में बांटना यह कभी चंबल की रॉबिनहुड नीति हुआ करती थी|

अब तो यह रॉबिनहुडी पॉलिटिक्स राजनेताओं ने अपना ली है| दक्षिण भारत के राज्यों में फ्री योजनाओं की नीति कई दशकों से चल रही है| वहां तो टीवी फ्रिज जैसे सामान भी चुनावी घोषणाओं में शामिल होते रहे हैं| किसानों की कर्ज माफी का लाभ भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने चुनाव में उठाया है| कर्ज माफी की गलत नीति कैसे बैंकों और कर्ज की व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर रही है| आज ऐसी प्रवृत्ति हो गई है कि कर्ज चुकाने की जरूरत नहीं है| चुनाव के समय तो सरकार माफ कर देगी| नेताओं ने कितना बड़ा नुकसान अर्थव्यवस्था का किया है? 

राजस्थान, आंध्र प्रदेश, केरल और बंगाल में कर और जीएसडीपी का अनुपात भयावह होता जा रहा है| फ्री योजनाओं से देश में कर्महीनता बढ़ रही है| कर्महीन समाज को नष्ट होने से कोई नहीं बचा सकता| गरीबों की मदद करना सरकार का दायित्व हो सकता है| लेकिन उन्हें रोजगार या मजदूरी के रूप में मदद की जानी चाहिए| फ्री योजनाओं के रूप में किसी भी तरह का सहयोग करना देश को कमजोर करने जैसा है|

जो राज्य सरकारें अरबों रुपए फ्री योजनाओं पर खर्च कर रही है| उन राज्यों में लाखों की संख्या में सरकारी पद खाली हैं| नौजवान रोजगार के लिए तरस रहे हैं| लेकिन सरकारें खाली पद इसलिए नहीं भर पा रही हैं क्योंकि उनके पास वेतन देने के पैसे नहीं हैं| फ्री योजनाओं के माध्यम से लोगों को लुभा कर राजनीतिक सत्ता हासिल होना सरल होता है| 

देश में अर्थव्यवस्था को लेकर राष्ट्रीय सहमति बनाने की जरूरत है| फ्री संस्कृति बंद कर काम देने की संस्कृति जरूरी है| प्रधानमंत्री को फ्री योजनाओं के बढ़ते संकट पर, राज्य के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक कर, राष्ट्रीय नीति बनाने की जरूरत है| इस पर समय रहते काम नहीं किया गया तो कई राज्यों को श्रीलंका बनने से रोकना मुश्किल होगा| कोई भी राज्य या देश बिना आर्थिक आत्मनिर्भरता के प्रगति नहीं कर सकता| फ्री योजनाओं की राजनीतिक प्रतिद्वंदिता डेमोक्रेसी का कहीं गला न घोंट दे|