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संकट परोसती दूषित व्यवस्था

सार

एमपी में बीजेपी की कहानी बिजली सड़क पानी से ही शुरू हुई थी. देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतें दूषित व्यवस्था में पल रहे संकट का नमूना है, जहां संकट नहीं आया है वहां सब कुछ अच्छा चल रहा है ऐसा मानना गलत है..!!

janmat

विस्तार

    जब स्वच्छता का लगातार पुरस्कार लेने वाले शहर में दूषित पानी से लोग मर जाते हैं तो फिर जो शहर स्वच्छता का दावा नहीं करते वहां तो गंदी व्यवस्था कायम ही होगी.

    मौत के सच से दूषित व्यवस्थाएं खेल रही हैं. इसी व्यवस्था को पुरस्कार मिलता है. बड़े-बड़े मंचों पर बड़े-बड़े नेता जाकर पुरस्कार ग्रहण करते हैं. फिर उसके बड़े-बड़े विज्ञापन और होर्डिंग में चेहरे चमकाये जाते हैं. स्वच्छता का क्रेडिट दूषित व्यवस्था का हर जिम्मेदार चेहरा लेना चाहता है, लेकिन आज दूषित पानी से मौतों की जिम्मेदारी कोई लेने को तैयार नहीं है.

    इंदौर मध्य प्रदेश के सपनों का शहर है. प्रशासन और राजनीति के लिए तो यह सबसे पसंदीदा शहर है. इस शहर में सामूहिकता का दिग्दर्शन कराया है. यह धन कुबेरों का शहर है. यहीं के धन से राजनीति चला करती है. राजनीतिक रूप से इस शहर पर भाजपा का कब्जा रहा है. नगर निगम के महापौर और ज्यादातर विधायक दशकों से इसी पार्टी के रहते रहे हैं. अब तो सरकार भी दशकों से भाजपा ही चला रही है. अब इंदौर ने तो यह भी इतिहास रचा है कि सीएम स्वयं इस जिले के प्रभारी मंत्री हैं. 

    इसी साल 2025 में घटी घटनाओं के नजरिए से इंदौर को देखा जाए तो यही कहा जा सकता है कि जैसे इस सपनों के शहर को ग्रहण सा लग गया है. सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में चूहे नवजात बच्चों को कुतर देते हैं. नो एंट्री में ट्रक के घुसने से हुआ अप्रत्याशित हादसा भी यह शहर कभी भूल नहीं पाएगा. अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी के साथ दुर्व्यवहार की घटना से भी इंदौर की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ा था. इंदौर की जागरुकता दूसरों के लिए मिसाल है. इस सबके बावजूद दूषित पानी से सबसे स्वच्छ शहर में मौतें होना केवल इंदौर के लिए नहीं मध्यप्रदेश के लिए कलंक है.

    जब मौतें हुई हैं तो सहानुभूति भी दिखेगी. संवेदना भी जगेगी. सीएम एवं प्रभारी मंत्री पीड़ितों से मिलेंगे. राहत भी बंटेगी. कुछ छोटे-मोटे दोषी सस्पेंड कर दिए जाएंगे. सारी लीपापोती हर बार की तरह की जाएगी. फिर धीरे-धीरे सब कुछ भुला दिया जाएगा. इस दुर्घटना के पीछे जो बेसिक कारण हैं, वे न तलाशे जाएंगे, न उनका कोई समाधान होगा. फिर जब कभी कुछ दुर्घटना होगी तो फिर सब कुछ ऐसे ही दोहराया जाएगा.

    सरकारों से प्लानिंग तो जैसे गायब हो गई है. मॉनिटरिंग तो एडजस्टमेंट और हिस्सेदारी का जरिया बन गया है, लोक सेवक अब स्वयंसेवक बन गए हैं. व्यवस्था और लोक के बीच में कोई तालमेल नहीं है. जिस इंदौर में दूषित पानी से मौतें हो रही है उसी शहर में बड़े-बड़े नौकरशाह और थैलीशाह अल्केलाइन वॉटर भी पी रहे होंगे. जमीन पर दूषित व्यवस्था से लोक जनजीवन पर संकट की स्थितियां आए दिन सामने आती हैं लेकिन प्रचार में हर दिन राम राज्य दोहराया जाता है. हर सेक्टर में ऐसी उपलब्धियां बताई जाती हैं, कि उनको देखकर तो दूषित पानी से मौत की कल्पना भी नहीं की जा सकती. 

    एक तरफ जहां शहरीकरण बढ़ रहा है वही शहरों में अधोसंरचना जरूरत के मुताबिक विकसित नहीं हो पा रही है. नगर निगम भी फंड के संकट से गुजर रहे हैं.  सिस्टम के लोग तो धनी हो रहे हैं लेकिन सिस्टम पर क़र्ज़ का घुन लगता जा रहा है. बुनियादी मुद्दों पर ना कोई सोचना चाहता है और ना ही कुछ करना. हर शहर की ट्रैफिक व्यवस्था बेहाल है. पेड़ों की कटाई से पर्यावरण को हो रहा नुकसान किसी को दिखाई नहीं पड़ रहा है.

    जब कोई संकट आएगा तो फिर दूषित व्यवस्था दौड़-भाग चालू कर देगी. शहरों में गाड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है. कई किलोमीटर तक पार्किंग की व्यवस्था नहीं होती लेकिन अगर किसी ने सड़क किनारे गाड़ी खड़ी करी तो फिर उसको उठाने के लिए क्रेन आने में देर नहीं लगती. क्रेन का काम प्राइवेट ठेके पर दे दिया गया है. यह उसका धंधा है. इस धंधे में दूषित व्यवस्था की हिस्सेदारी स्वाभाविक होगी.

    सत्ताधारी दल अव्यवस्थाओं के लिए पहले की सरकारों को उन दलों को जिम्मेदार बताते हैं. मध्यप्रदेश में तो अब बीजेपी सरकार को इतना लंबा वक्त हो गया है कि अब पुरानी किसी गलती से वर्तमान संकट पर पर्दा नहीं डाला  जा सकता है. जो लोग मरे हैं हो सकता है उनमें कोई राज्य सरकार की लाड़ली बहना भी हो, पेंशन पाने वाला भी हो. हम अपने लाभ के लिए नगद खातों में पैसा देकर तो अपनी जीत हासिल कर सकते हैं लेकिन व्यवस्था में सुधार शायद राजनीतिक लाभ का सौदा नहीं बचा होगा.

    सरकार और उनकी संस्थाएं केवल वेतन और पेंशन देने में ही अपने आप को सक्षम पा रही हैं. यहां तक बताया जा रहा है कि सरकारों का 80 % राजस्व इसी पर खर्च हो जाता है. सड़कें तो सब टोल पर चली गई है. बिजली का मामला भी प्राइवेटाइज है. केवल नगरीय व्यवस्था अभी नगर निगम के जरिए सरकारें क्रियान्वित हो रही हैं. इस व्यवस्था की हालत नरक के दर्शन कराती है.

     मौत सच्चाई है लेकिन अगर यह मौत किसी दूषित व्यवस्था के कारण होती है तो यह उसके लिए शर्मनाक है. शर्म भी एक भाव है, जब सब कुछ सौदेबाजी में होता है तो दूषित व्यवस्था में भावना का तो कहीं स्थान ही नहीं बचा है. 

    दूषित पानी से मौतों  ने इंदौर को देश का सबसे शहर स्वच्छ शहर होने का मिलने वाला पुरस्कार भी झूठा साबित कर दिया है. सबसे बड़े और विकसित शहर में जब यह हालत हैं तो बाकी की तो केवल कल्पना ही की जा सकती है.