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वैचारिक प्रतिबद्धता पर सरकार की दृढ़ता

सार

डेढ़ सौ साल पहले लिखे गये वंदेमातरम राष्ट्रगीत को संविधान में अब पूर्णता मिली है. राष्ट्रगीत के रूप में तो इसके केवल दो छंदों को स्वीकार किया गया था लेकिन ही, अब मोदी सरकार ने इसके सभी छह छंदों को संवैधानिक मान्यता दी है..!!

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विस्तार

    राष्ट्रगीत के गायन को जन गण मन से पहले अनिवार्य किया गया है. स्कूलों में इसे प्रतिदिन गाया जायेगा. अधिकारिक सरकारी समारोह के साथ ही राष्ट्रपति, राज्यपाल, उपराज्यपाल के सरकारी समारोह में आने जाने के समय वंदे मातरम राष्ट्रगीत अनिवार्य रूप से गाया जाएगा. सिनेमा घर में भी राष्ट्रगीत बजेगा. 

    बंकिमचंद्र चटर्जी ने 1875 में राष्ट्रगीत लिखा था. जो उनके उपन्यास ‘आनंद मठ’ में छपा था. इसमें कुल छह छंद हैं. दो छंदों में भारत मां की स्तुति है. बाकी चार छंदों में मां दुर्गा, मां सरस्वती सहित अन्य देवियों की स्तुति है. मातृभूमि की वंदना के साथ ही राष्ट्रगीत में भारत माता की सभी पहचान को जोड़ा गया है. 

    आजादी के पहले वंदे मातरम के पूर्ण छंदों को लेकर राजनीतिक विवाद उत्पन्न हुआ था. अभी पिछले दिनों ही संसद में राष्ट्रगीत 150 साल पूरे होने पर विस्तृत रूप से चर्चा हुई थी.. राष्ट्रगीत के पूर्ण छंदों को पहले तो गाया जाता था लेकिन बाद में कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं द्वारा एतराज से जब इस पर राजनीति हुई तो फिर कांग्रेस के अधिवेशन में इसे काटा गया. 

    आजादी के बाद कांग्रेस की सरकार ने उन दो छंदों को ही राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया. आरएसएस के भी 100 साल हो गए हैं. आरएसएस के गीत और राष्ट्रगीत के भाव लगभग समान हैं. आरएसएस मातृभूमि के लिए राष्ट्रगीत के भाव पर भी खड़ा हुआ है. कांग्रेस और संघ के बीच में वैचारिक मतभेद की भूमिका भी राष्ट्रगीत के इन्ही छंदों में पढ़ी जा सकती है.

    2027 के बजट की सामान्य चर्चा में राहुल गांधी ने भारत अमेरिका ट्रेड डील पर चर्चा करते हुए भारत माता का उल्लेख किया. यानी भारत माता के प्रति उनकी भावना और वंदना संदेह से परे है. वंदेमातरम भी भारत माता की वंदना ही है. पक्ष और विपक्ष की भारत माता का स्वरूप अलग-अलग तो नहीं हो सकता. 

    इंदिरा गांधी ने आपातकाल में संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ा था. बीजेपी इस शब्द को अनावश्यक मानती है फिर भी इसे हटाने की पहल नहीं की गई है. जैसे आपातकाल में कांग्रेस की सरकार ने अपनी वैचारिक अनुष्ठान को संवैधानिक स्वरूप दिया था. वैसे ही बीजेपी ने वंदे मातरम के सभी छंदों को संवैधानिक मान्यता प्रदान की है. 

    जिस कांग्रेस ने आजादी के समय से दशकों तक शासन किया और उसने राष्ट्रगीत के दो ही छंदों को मान्यता प्रदान की, वह अब पूर्ण राष्ट्रगीत को संवैधानिक स्वरूप दिए जाने को चुपचाप स्वीकार करे ऐसा संभव नहीं लगता.मुसलमान भी वंदे मातरम पर आपत्ति कर सकते हैं. पहले भी उनकी आपत्ति पर ही दो छंदों को स्वीकार किया गया था.

    राजनीतिक दलों को अपनी विचारधारा और चिंतन के अनुसार सरकार और नीतियों को चलाने का संवैधानिक अधिकार है. इस अधिकार से ही बीजेपी ने वंदे मातरम के सभी छंदों को संवैधानिक स्वीकार्यता दी है. जिस तरह इंदिरा गांधी ने अपने अधिकारों को उपयोग करके धर्मनिरपेक्षता को जोड़ा था वैसे ही बीजेपी ने वंदे मातरम को पूर्णता प्रदान की है. 

    राष्ट्रगीत को धर्म के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. राष्ट्र तो वहां की मूल संस्कृति और जीवन पद्धति से जाना पहचाना जाता है. बंकिम चंद्र चटर्जी ने जब यह गीत लिखा गया था तब ना संघ की स्थापना हुई थी और बीजेपी का तो नामोनिशान ही नहीं था. देश में ना कोई राजनीति थी और ना ही कोई राजनीतिक विचारधारा की प्रतियोगिता. देश का बंटवारा भी नहीं हुआ था. इसलिए हिंदू मुसलमान की कथित धर्मनिरपेक्षता का भी कोई प्रश्न नहीं था. इसके पीछे ना हिंदू थॉट था और ना ही मुस्लिम अवमानना.

    वंदे मातरम पर राजनीतिक सुरताल पहले से ही साधे जाते रहे हैं. इसको हिंदू संस्कृति से जोड़कर देखा जाता रहा है. जब दो छंद थे तब भी विवाद खड़े किये जा रहे थे तो अब तो पूर्ण छंदों का राष्ट्रगीत संवैधानिक रूप से मान्य हो गया है. एक तरफ बीजेपी की सरकारों में पूर्ण राष्ट्रगीत सम्मान के साथ बजेगा तो दूसरी तरफ विरोध का राजनीतिक संगीत भी गूंजेगा.

    सबसे पहले इसकी शुरुआत तो बंगाल से होगी. बंगाल में चुनाव सामने है. वहां पहले से ही बाबरी मस्जिद की राजनीतिक आधारशिला रखी जा चुकी है. अब जब पूर्ण राष्ट्रगीत बीजेपी बंगाल में बजायेगी तो फिर ममता बनर्जी और टीएमसी इसका विरोध करेंगे और राजनीति का वही पुराना तुष्टिकरण-ध्रुवीकरण का खेल सब अपने-अपने तरीके से खेलेंगे.

    जनादेश सरकारों को राजनीतिक दलों की विचारधारा और मान्यता पर काम करने का मौका देता है. कांग्रेस और बीजेपी की वैचारिक धारा में अंतर तो साफ है. बीजेपी कश्मीर में धारा  370, अयोध्या में राम मंदिर और समान नागरिक संहिता के अपने एजेंडे पर काफी आगे बढ़ चुकी है. अयोध्या में भव्य राम मंदिर पर धर्म ध्वजा फहरा रही है, 370 इतिहास हो चुका है, समान नागरिक संहिता भी राज्यवार धीरे-धीरेआगे बढ़ रही है. 

    सरकारों की पापुलैरिटी उनकी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता और दृढ़ता से मजबूत होती है. राष्ट्रवाद के प्रति आरएसएस और बीजेपी की विचारधारा पूर्ण राष्ट्रगीत की संविधानिक स्वीकार्यता से मजबूत हुई है. अभी तो यह शुरुआत है. देखना होगा विचारधारा की नीतियों पर आगे क्या-क्या होता है. 

    वंदे मातरम की पूर्णता को दृढ़ता के साथ स्वीकार कर बीजेपी ने अपनी प्रतिबद्धता के साथ ही राजनीतिक एजेंडा भी सेट कर दिया है, अब इसका जितना भी विरोध होगा वह बीजेपी की राजनीतिक पिच को ही मजबूत करेगा. बीजेपी का हिंदुत्व तो एजेंडा अब तक उनके सकारात्मक प्रयासों से ज्यादा उसके राजनीतिक विरोध के कारण मजबूत होता रहा है. वंदे मातरम राजनीतिक लक्ष्य तो साधेगा ही लेकिन राष्ट्र का सम्मान भी बढ़ाएगा.