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रिजर्वेशन पर न्यायिक निर्णय ही लिमिटेशन

सार

​​​​​​​सुप्रीम कोर्ट ने SC-ST रिजर्वेशन में ‘कोटे में कोटा’ और क्रीमी लेयर को लेकर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है. आरक्षण के अंदर कोटे में कोटा का निर्णय सुप्रीम कोर्ट पहले ही दे चुका है. इसी निर्णय के क्रियान्वयन को लेकर याचिका दायर की गई है. कुछ राज्यों ने इस पर पहल की है लेकिन इसके राजनीतिक नफा नुकसान को देखते हुए अधिकाँश सरकारें इस पर चुप्पी साधे हैं..!!

janmat

विस्तार

    ओबीसी रिजर्वेशन में क्रीमीलेयर लागू है. SC-ST रिजर्वेशन में इसे लागू करने के बारे में भी बौद्धिक जगत से मांग उठती रही है. यहां तक की आरक्षित वर्ग से ही आने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस BR गवई ने भी SC-ST रिजर्वेशन में क्रीमीलेयर की आवश्यकता बताई है. उनका साफ कहना है कि CJI के परिवार को भी एसटी एसटी रिजर्वेशन क्यों मिलना चाहिए? 

    इसी प्रकार आईएएस आईपीएस एमएलए एमपी जैसे बड़े पदों पर आरक्षण का लाभ लेकर पहुंच गए लोगों के परिवारों को आरक्षण का फिर लाभ मिलना वंचित वर्गों के लिए प्रभावशील इस व्यवस्था का सदुपयोग तो नहीं कहा जा सकता. क्रीमीलेयर पर तो अब तक सुप्रीम कोर्ट में कोई भी फैसला नहीं दिया है लेकिन SC-ST रिजर्वेशन में कोटे के भीतर कोटे का जो फैसला दिया गया है, उसकी भी अवधारणा यही है कि आरक्षित वर्ग के खास समुदाय आरक्षण का लाभ हासिल करते हैं. इस वर्ग की बड़ी संख्या आरक्षण के लाभ से वंचित रहती है.

    आरक्षण का उद्देश्य ही समाज में पिछड़े और वंचित वर्गों को समानता के साथ सबकी बराबरी से आगे लाना है. इस उद्देश्य में ही क्रीमीलेयर की आवश्यकता छिपी हुई है, जो लोग या परिवार आरक्षण का लाभ लेकर एक बार समानता की सीमा रेखा पर पहुंच चुके हैं उनको आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए? 

    भारत में आरक्षण राजनीति का हथियार बन गया है. सियासी दल तो आरक्षण की व्यवस्था की उपलब्धियों पर ना समीक्षा करने का साहस कर सकते हैं और ना ही समाज के सबसे गरीब व्यक्ति के हित में इसे व्यवस्थित कर सकते है. रिजर्वेशन को लेकर राजनीतिक अफवाहों पर ही नुकसान उठाना पड़ता है. इसलिए सभी राजनीतिक दल फूंक-फूंक कर कदम उठाना चाहते हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी और कांग्रेस ने बीजेपी और सरकार के खिलाफ आरक्षण खत्म करने का झूठा नेरेटिव गढ़ा, जिसका असर हुआ कि बीजेपी स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं कर सकी.

    राजनीति तो आरक्षण की सीमा बढ़ाना चाहती है. कांग्रेस तो संविधान की सीमाओं से भी आगे धर्म के आधार पर मुसलमानों को आरक्षण देने की न केवल बात करती है बल्कि अपने राज्य सरकारों में इस दिशा में कदम भी आगे बढ़ा चुकी हैं. यह अलग बात है कि न्यायिक फैसलों के कारण संविधान विरोधी कदम आगे बढ़ नहीं पाता. लेकिन इसका राजनीतिक उपयोग तो हो ही जाता है. क्रीमीलेयर की आवश्यकता को केंद्र सरकार अपने जवाब में शामिल करेगी असंभव सा है. 

    राजनीति तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित आरक्षण की सीमा की दीवार को तोड़ना चाहती है. 50% की यह दीवार अगर सुप्रीम कोर्ट ने निर्धारित नहीं की होती तो अब तक राजनीतिक दल अपने-अपने राज्यों में ना मालूम कौन सी सीमा तक आगे बढ़ जाते. देश में अब तक आरक्षण पर जो भी लिमिटेशन बनी हुई है, वह केवल सुप्रीम कोर्ट के कारण है. चाहे 50% की सीमा हो, चाहे धर्म के आधार पर आरक्षण पर रोक हो, चाहे ओबीसी आरक्षण में क्रीमीलेयर की व्यवस्था हो.

    समानता के जिस सिद्धांत पर आरक्षण की नीव खड़ी है, उसी सिद्धांत पर क्रीमीलेयर की आवश्यकता दिखाई पड़ती है. ऐसे कई उदाहरण हैं जहां आरक्षित वर्ग के एक ही परिवार में अनेकों IAS और IPS है. MLA और MP में तो अनुसूचित वर्गों का भी परिवारवादी रवैया साफ-साफ देखा जा सकता है. जब आरक्षण का लाभ लेकर कोई समानता की सीमा पर पहुंच चुका है फिर उसके परिवार को ही लगातार क्यों लाभ मिलना चाहिए? 

    प्रमोशन में आरक्षण भी समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहा है इसीलिए उस पर रोक लगाई गई है, अगर मध्य प्रदेश का ही उदाहरण लिया जाएतो कई सालों से राज्य के कर्मचारी बिना पदोन्नति के रिटायर हो रहे हैं. सरकार ने मई प्रमोशन पॉलिसी बनाई उस पर भी हाईकोर्ट की रोक लग गई. देश की पूरी राजनीति जाति और आरक्षण के इर्द गिर्द टिकी है. राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र इसकी हकीकत हैं. 

    सुप्रीम कोर्ट की मोहर के बाद ही देश में पहली बार सामान्य निर्धन वर्गों को आर्थिक आधार पर आरक्षण की ऐतिहासिक व्यवस्था की गई. क्रीमीलेयर का कॉन्सेप्ट भी आर्थिक आधार को ही मान्यता देता है. ओबीसी में जो संपन्न लोग है उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है. जब देश की 75% आबादी को क्रीमी लेयर और आर्थिक आधार पर आरक्षण की सुविधा मिलती है तो फिर एससी और एसटी को जाति के आधार पर रिजर्वेशन दिया जाना अपने आप में संवैधानिक मान्यताओं पर कुठाराघात है. समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन है.

    राजनीतिक मजबूरी के कारण सरकारें इस दिशा में पहल नहीं कर सकती. वोट बैंक उनकी मजबूरी है, सुप्रीम कोर्ट की दृष्टि न्यायिक है, संवैधानिक है, उसका नजरिया केवल और केवल न्याय पर आधारित होता है. बहुत लंबे समय से एससी- एसटी में क्रीमीलेयर पर बौद्धिक विमर्श हो रहा है, लेकिन अब मामला सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर है. 

    सुप्रीम कोर्ट का न्याय का उज्जवल इतिहास है. खासकर आरक्षित वर्गों के सबसे कमजोर लोगों के साथ समानता करने के लिए क्रीमीलेयर पर अब सुप्रीम कोर्ट ही फैसला करेगा. शायद राजनीति भी यही चाहती है, कि हमारे हाथ न फंसे और समानता की वास्तविक व्यवस्था प्रभावशील हो जाए. एससी-एसटी में क्रीमीलेयर की व्यवस्था इन वर्गों के सबसे गरीब लोगों का वास्तविक वेलफेयर होगा.