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परशुराम का मान, ब्राम्हणों का स्वाभिमान-सरयूसुत मिश्र

सार

राजनीति में भगवान परशुराम के अनुयायियों के प्रभाव महत्व और संख्या को देखते हुए आजकल भगवान परशुराम की मूर्तियां पूरे देश में लगाई जा रही हैं| भोपाल में भी परशुराम जि की भव्य प्रतिमा स्थापित होने जा रही है..!

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विस्तार

ब्राह्मण बुद्धिमान और विवेकशील वर्ण है और वह ‘वोट बैंक’ कभी नहीं हो सकता। वह अपनी सूझबूझ और बुद्धि लगाकर वोट करता है। भगवान् परशुराम ने पृथ्वी पर अच्छा शासन तो स्थापित किया, लेकिन वह खुद सत्ता से दूर रहे। उन्होंने छीनी हुई समस्त भूमि/राज्य उस समय के वंचितों और सात्विक लोगों को दे दी। उन्होंने भीष्म और कर्ण जैसे क्षत्रियों को शिक्षा दी और दशरथ और जनक जैसे क्षत्रिय सु-शासकों का दमन नहीं किया। वह जातिवाद से ऊपर थे। 

परशुराम जी दुनिया भर में ब्राह्मण वर्ण और अन्य समुदायों के आस्था और पौरुष का प्रतीक भी हैं| एक दौर ऐसा आया था जब  परशुराम जी  और उनके अनुयायियों को भुलाने की कोशिश की गई| इसके कारण राष्ट्रीय राजनीति में  दशकों तक प्रभुत्व में रहने वाले राजनीतिक दल का पराभव सबने देखा है|

परशुराम के अनुयायियों ने जाति और संप्रदाय की राजनीति में कम होते अपने राजनीतिक प्रभुत्व को एक बार फिर से अपनी बुद्धिमत्ता से न केवल स्थापित कर लिया है बल्कि आज देश में कोई भी राजनीतिक दल चाहे वह राष्ट्रीय हो या क्षेत्रीय परशुराम और परशुराम के वंशजों को इग्नोर करने की हिम्मत नहीं कर पाता| 

"महापुरुषों और राजनीतिक लोगों की मूर्तियों के सहारे पोलिटिक्स को आगे बढ़ाने का फार्मूला कोई नया नहीं है| आस्था और पूजा पद्धति में मूर्तियों का ख़ास स्थान व महत्व है| मूर्तियाँ  किसी न किसी वर्ग के उत्कर्ष का प्रतीक होती हैं| इसलिए न सिर्फ मूर्तियां बनवाने बल्कि उसके सम्मान और अपमान तक से राजनीतिक लोग वोट पाने में कामयाब हो जाते हैं|"

मूर्ति (Statue) बनाने से किसी समाज का भला होता है ये रिसर्च का विषय है लेकिन उसे लगवाने वाले का भला जरूर हो जाता है| हालाकि ब्राह्मण कभी वोट बैंक नहीं बना|  दरअसल ब्राह्मण आज जातिवादी सोच से बहुत आगे निकल चुका है इसलिए उसे जातीय वोट बैंक में तब्दील करने की कोशिश अभी तक सफल नहीं हो सकी है|

ब्राह्मण जब वोट करने जाता है तो अपनी जाति को देखने की बजाए अपनी विवेक और बुद्धि के आधार पर उस प्रत्याशी का चयन करता है जो राष्ट्र और समाज के लिए कारगर साबित हो सके| ऐसा होना भी चाहिए| ब्राह्मण वह वर्ण है जो सजातीय होने के बावजूद भी रावण को अपना आदर्श नहीं मानता| 

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भगवान परशुराम की भव्य प्रतिमा की स्थापना के साथ  एक बार फिर  परशुराम और ब्राह्मण चर्चा के केंद्र में हैं| दरअसल सियासी चश्मे से देखने वाले लोग इस आयोजन ब्राह्मण समाज को साधने का प्रयास मान रहे हैं|  इस दृष्टि से देखा जाए तो निश्चित ही ब्राह्मणों का चुनावी राजनीति में अहम स्थान है|  

राजनीतिक दल जानते हैं कि ब्राह्मण न सिर्फ संख्या के आधार पर चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते बल्की अन्य जाति और वर्ग में भी उनकी सोच, समझ और राय का प्रभाव पड़ता है| कथा, प्रवचन, लेखन, धर्म कर्म मीडिया और बौद्धिक वर्ग में इस समाज के लोगों की महती भूमिका होने के कारण इस समाज का भारत में मार्गदर्शक के रुप में अहम स्थान रहा है|  भारतीय सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार और विस्तार में भी ब्राह्मण वर्ण के लोग आदिकाल से संलग्न हैं|  ऐसे में ब्राह्मणों को सियासत में उपेक्षित नहीं रखा जा सकता| 

भारत की संस्कृति के संवाहक के रूप में ब्राह्मणों की भूमिका सर्व विदित है| भोपाल के लाल घाटी में गुफा मंदिर प्रांगण में भगवान परशुराम की भव्य 21 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की जा रही है| इसके लिए बड़े स्तर पर तैयारी की गई है| इस आयोजन को भव्य रूप देने  के पीछे राजनीतिक मंशा भी देखी जा रही है| ब्राह्मण समाज के अलग-अलग संगठनों से जुड़े हुए लोगों को इस आयोजन से जोड़ा गया है| दोनों दलों की सियासी हस्तियां इस कार्यक्रम में मौजूद रहेंगी|

मध्यप्रदेश में जातिगत समीकरण भी चुनावों में अहम भूमिका निभाते हैं| हालांकि मध्यप्रदेश में हिंदू जातियों में उस तरह का ध्रुवीकरण नहीं है जैसा उत्तर प्रदेश में है लेकिन फिर भी धीरे धीरे सभी समाज अपने आप को संगठित कर रहे हैं| लेकिन ब्राह्मण समाज ने कभी भी खुद को वोट बैंक की तरह एकजुट और इस्तेमाल नहीं किया| इस मूर्ति की स्थापना के पीछे ब्राह्मण  भारत का स्वाभिमान और पौरुष देखते हैं भले ही राजनीतिक दल इसमें सियासत देखें|

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले तत्कालीन बीजेपी (BJP) अध्यक्ष अमित शाह ने यूपी में पिछड़े वर्गों को रिझाने के लिए महाराजा सुहेलदेव की मूर्ति और लिंगायत समुदाय के वोटबैंक के लिए कर्नाटक में दार्शनिक बसवेश्वर की मूर्ति का अनावरण किया था|

बसपा प्रमुख मायावती तो हाथियों की मूर्ति को लेकर विवादों में घिर चुकी हैं| उत्तर भारत में दलित राजनीति के प्रतीक डॉ भीमराव आंबेडकर और दक्षिण में ईवी रामास्वामी पेरियार की मूर्ति के नाम पर भी खूब सियासी खिचड़ी पकती है| गुजरात में सरदार सरोवर बांध के पास नर्मदा नदी पर वल्लभभाई पटेल की विशालकाय मूर्ति 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' का निर्माण कराया गया है| 

यूपी में एसपी और बीएसपी ब्राह्मण वोट साधने के लिए इस बार एक दूसरे को कॉम्पिटिशन देने में उतर आए थे।समाजवादी पार्टी ने सूबे में परशुराम की मूर्ति लगाने का वादा किया। तो मायावती ने एसपी से बड़ी परशुराम की मूर्ति लगाने का ऐलान कर दिया। हलाकि दोनों ही चुनाव हार गये|

दरअसल ब्राम्हण वोट ऐसा वोट है जो प्रतीक प्रतिमानों और राजनितिक नारों की बजाये सोच समझ कर वोट देने में यकीन रखता है| भगवान परशुराम ब्राह्मण हैं और सात चिरजीवी विभूतियों-अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम में से एक हैं। वह भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं, उन्होंने 21 बार दुष्ट राजाओं का संहार किया। 

भगवान परशुराम निश्चित ही भारत के उत्कर्ष, शौर्य और पौरुष का प्रतीक हैं|  निश्चित ही परशुराम जी की प्रतिमा लगाना चाहिए|  लेकिन इस प्रतिमा को वोट बैंक की राजनीति से ऊपर रख कर ब्राह्मण समाज के देश के विकास में योगदान, भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के उत्थान में भागीदारी और सत्य व समन्वय के साथ वसुधैव कुटुंबकम् की भावना के साथ आगे बढ़ने के प्रतीक के रूप में माना जाना चाहिए|