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मन काला तो दिखे घोटाला ही घोटाला..!

सार

एमपी कांग्रेस ने बीजेपी सरकार के घोटालों पर एक आरोप-पत्र जारी किया है. यह दस्तावेज ही काले मन और घोटाले में शामिल मन की कहानी कह रहा है. कमलनाथ द्वारा पत्रकार वार्ता में जारी कथित आरोप-पत्र के मुद्रित दस्तावेज में मुद्रक और प्रकाशक का नाम गायब बताया जा रहा है. किसी भी मुद्रित दस्तावेज में मुद्रक और प्रकाशक की जानकारी वैधानिक आवश्यकता है. इसके बिना प्रकाशित दस्तावेज गैरकानूनी होता है. ऐसे दस्तावेज को जारी करने वाले व्यक्ति या संस्था के खिलाफ कानूनी कार्यवाही हो सकती है.

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विस्तार

यह बात पीसीसी और कमलनाथ को नहीं मालूम होगी, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता. लेकिन, झूठ भी बोलना है और कानूनी कार्यवाही से अपने को बचाना भी है, इसलिए शायद ऐसा किया गया है कि विवाद बढ़ने पर इस दस्तावेज की वैधानिकता से स्वयं को और पीसीसी को अलग बनाए रखने की रणनीति अपनाई गई है. 

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष ये सवाल उठा रहे हैं कि ये दस्तावेज़ फर्जी है, इसे किसने प्रकाशित किया है, किसने मुद्रित किया है, इसकी कोई जानकारी नहीं है. आरोप-पत्र में घोटालों का जिक्र ऐसे किया गया है जैसे घोटालों के आंकड़े कांग्रेस ने स्वयं तैयार किए हैं. हर घोटाले के सामने करोड़ों की राशि का उल्लेख किया गया है. करोड़ों रुपए का यह आंकड़ा कांग्रेस कहां से लाई है? यह बात साबित करने के लिए कांग्रेस के पास कोई दस्तावेजी सबूत हैं तो निश्चित रूप से उनको सार्वजनिक किया जाता. जब मन काला होता है तो सब काला काला ही दिखाई पड़ता है. घोटाले की मशीन ही घोटाले के आंकड़े पकड़ सकती है.
 
बहुत प्रसिद्ध कहावत है, “सूप बोले तो बोले, छलनी क्यों बोले, जिसमें हजार छेद”. “छलनी कहे सुई से तेरे पेट में छेद है”. 

कांग्रेस और कमलनाथ द्वारा जारी कथित आरोप-पत्र में जिस तरह से घोटाले के सुनिश्चित आंकड़े बताए हैं, उससे तो यही लगता है कि 15 महीनों की सरकार में इन सभी घोटालों की गति और रेट के अनुसार आंकड़ों का कैलकुलेशन किया गया है. कांग्रेस को यह कैसे पता लगा कि पोषण आहार में 15 हज़ार करोड़ रुपये, मिड डे मील में 12 हजार करोड़ रुपये, बिजली में 94 हज़ार करोड़ रुपये, आरटीओ घोटाला 25 हज़ार करोड़, चेक पोस्ट घोटाला 50 हज़ार करोड़, टोल घोटाला 15 हज़ार करोड़, शराब घोटाला 85 हज़ार करोड़, अवैध खनन घोटाला 50 हज़ार करोड़ और सीवरेज निर्माण घोटाला 11 हज़ार करोड़ का है. इन घोटालों के बारे में क्या कोई सरकारी दस्तावेज कांग्रेस के पास हैं? अगर है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए.
   
विपक्ष की यह लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है कि सरकार के कामकाज पर नजर रखे. भ्रष्टाचार के मामले को सार्वजनिक करे. राजनीतिक स्वार्थ के लिए किसी भी सरकार या राज्य के नाम को बदनाम करने के लिए भ्रष्टाचार के अवैधानिक आरोप लोकतंत्र के साथ बड़ा क्राइम कहां जाएगा. राजनीति का दोगलापन देखिए, जो व्यवहार उसे अपने साथ गैरकानूनी लगता है वह अपने विरोधी के साथ वैसा ही व्यवहार करता हुआ दिखाई पड़ता है. या तो पब्लिक को नासमझ माना जाता है या स्वयं को बहुत ज्यादा समझदार. 

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ 2003 में तत्कालीन भाजपा नेता उमा भारती द्वारा जब 15 हज़ार करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे. तब दिग्विजय सिंह ने उमा भारती के खिलाफ मानहानि का मुकदमा चलाया था. कांग्रेस चुनाव हार गई थी. उमा भारती मुख्यमंत्री बन गई थी. इसके बावजूद उमा भारती को मानहानि के मुकदमे का सामना आज भी करना पड़ रहा है.

दिग्विजय सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों का सबूत और तथ्य प्रमाणित नहीं किए जा सके. इस सच्चाई को जानते हुए भी कांग्रेस भ्रष्टाचार पर इस तरह का अप्रमाणिक, अतार्किक झूठा आरोप शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार पर लगा रही है. दिग्विजय सिंह शायद आरोप-पत्र जारी करते समय इसीलिए उपस्थित नहीं थे कि इस अवैधानिक प्रयास पर उनका समर्थन नहीं था. दिग्विजय के उमा भारती के खिलाफ चल रहे मानहानि के प्रकरण से निश्चित रूप से बीजेपी सीख लेगी और कमलनाथ को मध्य प्रदेश की मानहानि करने के लिए कानूनी कटघरे में जरूर खड़ा करेगी.
 
कांग्रेस ने अपने आरोप-पत्र में व्यापम घोटाले को दो हजार करोड़ का घोटाला बताया है. इस मामले में एसटीएफ और सीबीआई ने भी घोटाले में प्रक्रिया की गड़बड़ियों की बात तो मानी, लेकिन उसमें घोटाले की रकम का कोई आंकड़ा अभी तक सामने नहीं आया. कांग्रेस ने घोटाले की रकम पर पहुंचने के लिए कल्पना की उड़ान भरी है. उनका आरोप-पत्र कल्पना लोक ही दिखाई पड़ता है. कर्नाटक में भ्रष्टाचार और कमीशन के आरोपों को कांग्रेस अपनी जीत का आधार मानती है. 

राहुल गांधी के सिपहसालार उसी रणनीति को मध्यप्रदेश में दोहराने की कोशिश कर रहे हैं. शायद इसीलिए रणदीप सुरजेवाला को चुनाव के समय राज्य का प्रभारी बनाया गया है. कांग्रेस के लिए कर्नाटक में काम करने वाली राहुल गांधी की टीम ही मध्यप्रदेश में लगी हुई है. चुनाव जीतने के लिए राज्य की छवि खराब करना और किसी भी नेता को बदनाम करने की चुनावी रणनीति हमेशा सफल होगी, ऐसा मानकर कांग्रेस बड़ी गलती कर रही है.

कर्नाटक और मध्य प्रदेश की परिस्थितियां अलग-अलग हैं.  मध्यप्रदेश में कांग्रेस का मुकाबला बीजेपी के ऐसे नेता से है जो जनता के बीच में आम गरीब के हितेषी के रूप में पहचाना जाता है. उसकी छवि को खराब करने की कोशिश कांग्रेस को उल्टा भी पड़ सकती है. पहले भी भ्रष्टाचार के कई आरोप कांग्रेस लगा चुकी है और जनादेश उसे ख़ारिज कर चुका है. 2018 के चुनाव में भी अगर मतों के हिसाब से देखा जाए तो बीजेपी को ही कांग्रेस से ज्यादा मत मिले थे. 

आरोप-पत्र में कांग्रेस उनकी सरकार गिरा कर बीजेपी सरकार बनाने को लोकतंत्र के साथ घोटाला के रूप में निरूपित कर रही है. जब भी घोटाला होता है तो उसमें दो हाथ होते हैं. एक हाथ से ताली कैसे बजेगी? कांग्रेस की सरकार अगर जनभावनाओं के अनुरूप काम कर रही होती तो उनकी सरकार गिराने वालों के खिलाफ राज्य में जन आक्रोश खड़ा हो जाता. इसके विपरीत कांग्रेस की सरकार जाने के बाद लोगों ने राहत महसूस की थी.

कांग्रेस को और कमलनाथ को घोटालों की बात नहीं करना चाहिए. विज्ञान भी साबित कर चुका है कि किसी का भी डीएनए नहीं बदलता. घोटालों का डीएनए ही घोटालों को तेजी से पकड़ता और समझने की क्षमता रखता है. आरोप-पत्र में जिस तरह से हर घोटाले के लिए सुनिश्चित आंकड़े दिए गए हैं, इससे तो यही लगता है कि कांग्रेस अपने अनुभवों के आधार पर आंकड़ों को अंतिम रूप दे सकी है.

अगर इतने घोटाले हैं तो विपक्षी पार्टी के रूप में अभी तक कमलनाथ या कांग्रेस का कोई नेता जांच एजेंसियों के सामने भ्रष्टाचार की जांच के लिए शिकायत करने क्यों नहीं पहुंचा. जो लोग आरोप-पत्र में ही वैधानिकता को छिपाकर केवल मीडिया को भ्रमित करने की कोशिश कर रहे हैं उन लोगों में इतना साहस कहां से हो सकता है जांच के लिए शिकायत करने की हिम्मत जुटा सके. चुनाव अपने निर्धारित समय पर हो जाएंगे. जिसको भी जनादेश मिलेगा उसकी सरकार बन जाएगी. सरकार पर किसी भी पार्टी का कब्जा हो लेकिन मध्यप्रदेश आज भी है और मध्यप्रदेश आगे भी रहेगा. किसी भी नेता या राजनीतिक दल को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए बिना तथ्य और प्रमाण के साथ राज्य की छवि बर्बाद करने का कोई अधिकार नहीं हो सकता.

कांग्रेस ने आरोप-पत्र में जो भी आरोप लगाए हैं या तो उनके संबंध में जांच एजेंसियों के सामने प्रमाण प्रस्तुत करें या मध्य प्रदेश से क्षमा याचना करें. इनके द्वारा लोकतंत्र में चोरी और सीनाजोरी कभी बर्दाश्त नहीं की जा सकती.