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सदाबहार शोले पर नेताओं का मन डोले

सार

एमपी के चुनाव में सदाबहार फिल्म शोले का राजनीतिक एडिशन बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट हो गया है. कांग्रेस की ओर से जय और वीरू की जोड़ी की कहानी के साथ शुरू फिल्म में गब्बर सिंह, सूरमा भोपाली, बसंती और राधा की भी एंट्री हो गई है. सलीम जावेद की पटकथा पर फिल्म बनाने वाले जीपी सिप्पी ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि 50 साल बाद उनकी फिल्म का राजनीतिकरण इतनी सफलता के साथ हो सकेगा.

janmat

विस्तार

शोले के सभी कैरेक्टर एमपी के चुनाव में तैर रहे हैं. फिल्म के डायलॉग और फिल्मी कैरेक्टर के सहारे एक दूसरे पर बयानों की गोलियां दागी जा रही हैं. बीजेपी ‘जय-वीरू’ के चोरी और अपराध के कैरेक्टर पर कांग्रेस को घेर रही है तो कांग्रेस फिल्म की जान गब्बर सिंह का कैरेक्टर भाजपा की शान शिवराज पर चस्पा कर रही है. सोशल मीडिया पर चुनावी नजरिये से शोले फिल्म के कैरेक्टर्स के एनीमेटेड वीडियो आ रहे हैं. चुनावी चौपालों पर फिल्म के चर्चित डायलॉग उछाले जा रहे हैं. सबसे बड़ी चुनावी कॉमेडी यह हो रही है कि 50 साल पहले लिखी गई फिल्म की कहानी-डायलॉग और दृश्य आज की राजनीति पर फिट होते जा रहे हैं.

राजनीति और पैसा एक दूसरे के पूरक हैं. शोले में भी पैसे के लिए ही काम करने की कहानी है. शोले में ठाकुर का सुपरहिट डायलॉग है ‘अपनी बहादुरी पर अगर इतना ही घमंड है तो एक काम करोगे मेरे लिए? कीमत जो तुम चाहो लेकिन काम वह जो मैं चाहूं’ इसके जवाब में जय-वीरू का डायलॉग ‘ठाकुर साहब हम सिर्फ पैसों के लिए काम करते हैं’ 

राजनीति और शोले फिल्म के यह दोनों डायलॉग जब जनता एक साथ महसूस करती है तब बोल ही नहीं पाती है. लोगों को ऐसा लगता है कि शायद यह डायलॉग आज की राजनीति के लिए ही लिखे गए थे.

गब्बर सिंह का कैरेक्टर ना होता तो शोले फिल्म इतनी पॉपुलर ना होती है. गब्बर का कैरेक्टर डाकू का है, अत्याचारी का है, लोगों के शोषण का है,स्त्रियों की मर्यादा को खंडित करने का है, चोरी-डाका और गरीबों को उजाड़ने का है. अपने नेताओं को तो कांग्रेस ने दोस्ताना के नाम पर ‘जय-वीरू’ बना दिया लेकिन भाजपा के स्टार  केम्पेनर को गब्बर सिंह बता दिया. शिवराज जैसा दुबला-पतला गब्बर तो कभी सोचा भी नहीं जा सकता. राजनीति में चुनावी बयान और भाषण के लिए डायलॉग आम बात हो गए हैं लेकिन अगर यह डायलॉग हकीकत से मेल नहीं खाते हैं तो राजनीतिक नुकसान भी बहुत गहरा करते हैं.

बीजेपी के कैप्टन के रूप में शिवराज सिंह चौहान के आने के बाद कांग्रेस की टीम पूरी कोशिश करने के बाद भी मुकाबला नहीं कर पाई है. 2008 और 2013 में भी इसी तरीके के निजी आक्षेप उन पर लगाए गए थे. 2008 के चुनाव में ‘तो उन्हें डंपर सिंह चौहान कहकर उनके चेहरे को भ्रष्ट बताने की पुरजोर कोशिश की गई थी लेकिन जनता ने इसी डंपर से कांग्रेस के सपनों को रौंद दिया था. 2013 में ‘शवराज सिंह’ तक कहा गया. चुनाव परिणामों ने उनका जवाब दिया. घोषणावीर, कलाकार, नाटकबाज और घोषणामशीन के कांग्रेस के आक्षेप भी शिवराज के समर्थन को कम करने में सफल नहीं हुए.

जिस नेता पर जनता इतने वर्षों से भरोसा व्यक्त कर रही है, आम चुनाव और उपचुनाव इस भरोसे को साबित करते रहे हैं उस नेता की गब्बर सिंह के कैरेक्टर से तुलना कर कांग्रेस ने बड़ी राजनीतिक भूल कर दी है. जो नेता ‘लाड़ली लक्ष्मी का मामा’ होने का धर्म निभा रहा है, लाडली बहनों का भाई होने का सामाजिक रिश्ता जिसकी राजनीति का आधार हो, उसकी स्त्रियों की मर्यादा खंडित करने वाले गब्बर के कैरेक्टर से तुलना करना लाडली बहनें कभी बर्दाश्त नहीं करेंगी.

वैसे भी ‘लाडली बहना योजना’ बीजेपी के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है. उसमें शिवराज पर गब्बर सिंह का आरोप ‘कोढ में खाज’ साबित हो सकता है. कांग्रेस द्वारा रिलीज की गई राजनीतिक फिल्म ‘शोले’ चुनावी तारीख तक सफलता के नए रिकॉर्ड कायम कर सकती है. फिल्म का राजनीतिक संस्करण झूठ फरेब की राजनीति का प्रतिबिंब बन जाएगा. राजनीति में पैसे के दुरुपयोग की कहानी इस फिल्म में पैसे के लिए काम करने की कहानी से जन भावनाओं को जोड़ देगी.

चुनाव को ‘डांस ऑफ डेमोक्रेसी’ भी कहा जाता है. इसमें नेता नाचने की मुद्राओं में मतदाताओं को रिझाने और लोगों को जोड़ने की पुरजोर कोशिश करते हैं. गब्बर सिंह फिल्मी कैरेक्टर बसंती को कहता है ‘जब तक तेरे पैर चलेंगे उसकी सांस चलेगी.. तेरे पैर रुके तो यह बंदूक चलेगी’ ‘बहुत याराना लगता है’ 

जनता ऐसे डायलोगों पर चुनाव में तालियाँ बजा रही है. सत्ता के बसंत के लिए ना मालूम कितनी बसंती जनता के सामने नृत्य कर रही हैं. 

शोले फिल्म के ‘जय-वीरू-बसंती और राधा के कैरेक्टर निभाने वाले अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी और जया भादुड़ी संयोग से राजनीति से जुड़े हुए हैं. यह चारों सांसद रहे हैं. हेमा मालिनी और जयाभादुड़ी तो अभी भी सांसद हैं. शोले के जय वीरू अमिताभ और धर्मेन्द्र राजनीति में आये तो जरुर लेकिन जल्द ही उनका इससे मोहभंग हो गया.यह सभी महानायक सक्रिय फिल्मी जगत से दूर हो गए हैं. शोले फिल्म के सबसे पॉपुलर कैरेक्टर गब्बर सिंह का रोल अमजद खान ने निभाया था वह अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन यह फिल्म उनकी मौजूदगी का एहसास कराती है.

एमपी चुनाव में कांग्रेस द्वारा रिलीज राजनीतिक फिल्म शोले का ही केरैक्टर चुनाव में जीतेगा. अभी तो यह शुरुआत है जैसे-जैसे चुनाव प्रचार बढ़ेगा, राजनीतिक शोले की गर्माहट बढ़ती जाएगी. बयानों के गोले और शोले फिल्म के डायलॉग सियासत के डायलॉग बनते दिखाई पड़ेंगे. 

हर चुनाव की तरह एमपी के चुनाव में भी विकास के मूलभूत मुद्दे शोले फिल्म की चकाचौंध में खोते चले जाएंगे. शायद राजनीति भी यही चाहती है कि मूल मुद्दों पर बात ना हो और ऐसे ही फिल्मी अंदाज में जनादेश उनकी झोली में टपक जाए. फिल्म रिलीज होने के पहले उनके प्रोमो आ जाते हैं. राजनीति का प्रोमो तो जनता का रोज का विषय बन गया है. राजनीति के शोले, फिल्म के कैरेक्टर भले ही मध्यप्रदेश में पहली बार उछाले जा रहे हों लेकिन पब्लिक से कुछ भी छुपता नहीं है.