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पहले चरण में कम मतदान, लोकतंत्र के लिए खतरे का निशान 

सार

वैसे तो यह माना जाता है कि जितने लोकल चुनाव, पब्लिक की उतनी ज्यादा भागीदारी.! नगरीय निकायों को शासन की पहली इकाई माना जाता है। आम इंसान को नगरीय निकायों से रोजमर्रा के काम पड़ते हैं। लोकसभा और विधानसभा में भले ही मतदान के प्रति अरुचि हो लेकिन नगर सरकार के प्रतिनिधियों के चुनाव के लिए पब्लिक की भागीदारी ज्यादा से ज्यादा होनी चाहिए। इस बार इन चुनावों में पिछले चुनाव की तुलना में भी कम मतदान होना लोकतंत्र के लिए खतरे का निशान बता रहा है। 

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विस्तार

मतदाताओं ने मतदान के लिए इतनी अरुचि क्यों दिखाई? क्या निर्वाचन प्रक्रिया और तैयारियों में कोई कमी रह गई थी? क्या राजनीतिक दलों द्वारा इन चुनावों को गंभीरता से नहीं लिया गया था? क्या स्थानीय विधायकों ने नगरीय चुनाव को बहुत अधिक महत्व नहीं दिया?

 

जिन 11 नगर निगमों  में मतदान हुआ उनमें से अधिकांश में पिछले चुनाव की तुलना में कम मतदान रिकॉर्ड किया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि मतदाताओं में क्या नगरीय निकायों के प्रतिनिधियों को लेकर पूर्व अनुभव निराशाजनक रहे हैं? जिसके कारण इन चुनावों में कोई उत्साह दिखाई नहीं पड़ा। 

अधिकाधिक मतदान के लिए निर्वाचन आयोग ने प्रयास क्यों नहीं किया? सत्ताधारी पार्टी सहित विपक्ष ने भी आयोग से शिकायत की है कि मतदाता सूचियों में कई तरह की गड़बड़ियां पाई गई हैं। इसके कारण मतदाताओं को मताधिकार से वंचित होना पड़ा।

कई मतदाताओं की तो यहां तक शिकायत सामने आई कि बिना किसी जानकारी के उनके नाम मतदाता सूची से गायब कर दिए गए। यहाँ तक कि परिवार के एक व्यक्ति का मतदान केंद्र अलग और दूसरे व्यक्ति का मतदान केंद्र अलग हो गया। ऐसा कैसे हो सकता है? क्या सिस्टम ने इस चुनाव को क्या गंभीरता से नहीं लिया? 

जो चुनाव 5 साल में होने चाहिए थे, वह 8 साल बाद हो रहे हैं। पिछला नगरीय निकाय चुनाव 2014 में हुआ था। इसके बाद 2019 में चुनाव होना था। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ओबीसी आरक्षण के नाम पर इस तरह के आदेश और निर्देश निकाले जिससे न्यायालय के निर्णय पर चुनाव रोक दिए गए। अंततः सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर यह चुनाव संभव हो सके।

चुनाव की पूरी प्रक्रिया का आरक्षण के नाम पर जिस तरह से राजनीतिक दलों ने राजनीतिकरण किया था उससे भी मतदाताओं में निराशा पैदा हुई थी। 

भोपाल में सबसे कम मतदान गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र में हुआ है। यह क्षेत्र पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का विधानसभा क्षेत्र रहा है। उनके निधन के बाद उनकी बहू कृष्णा गौर विरासत संभाल रही हैं। बाबूलाल गौर का क्षेत्र के मतदाताओं के साथ जितना जीवंत संपर्क था, वह वर्तमान विधायक का नहीं रहा।  

गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र में एक हाउसिंग सोसायटी रुचि लाइफ़स्केप के नाम से है। इसमें पंद्रह सौ परिवार रहते हैं। जनप्रतिनिधियों की विकास के प्रति अरुचि और संपर्कों के अभाव के कारण इस कॉलोनी में तो केवल 20% मतदान होने की खबर है। ऐसी ही स्थिति बाकी विधानसभा क्षेत्रों में भी है। 

राजनेता ऐसा मानते हैं कि मतदान करना पब्लिक की मजबूरी है। चुनाव होगा तो किसी न किसी को तो चुनना ही है। वह यह समझने में भूल कर जाते हैं कि मतदाता में अगर निराशा बढ़ी तो नकारात्मक परिस्थितियां विकसित होंगी। राजनीति के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण जब कम होता है तो ऐसे हालात बनते हैं कि पब्लिक प्रतिक्रिया स्वरूप ऐसे लोगों को निर्वाचित कर देती है जो राजनीति के लिए अजूबे घटनाक्रम होते हैं। मध्यप्रदेश में एक दौर था जब कई किन्नर विधायक निर्वाचित किए गए थे। उस दौर में भी राजनीति के प्रति निराशा बढ़ी थी।  

नगरीय निकायों में कम मतदान भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। भाजपा मध्यप्रदेश में लंबे समय से शासन चला रही है, पिछले चुनाव में भी अधिकांश नगरीय क्षेत्रों में भाजपा की ही परिषद बनी थी। भाजपा के जनप्रतिनिधियों ने ही पुरानी परिषद चलाई थी।

एक कारण यह भी हो सकता है कि मतदाताओं का पुराना अनुभव अच्छा न रहा हो। इसके कारण कम मतदान हुआ हो। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, कांगेस मजबूत विकल्प के रूप में जनता के सामने स्थापित नहीं हो सकी। विकल्पहीनता और अरुचि से उपजी निराशा भी कम मतदान का कारण हो सकती है। 
 
वैसे तो लोकतंत्र में मतदाता को भी अपनी निराशा और अरुचि को अधिकाधिक मतदान के साथ अभिव्यक्त करना चाहिए। मतदान न करके निराशा की अभिव्यक्ति लोकतंत्र को अशक्त करती है। संभवत यह पहला अवसर होगा, जब सत्ताधारी दल भी निर्वाचन में गड़बड़ियों और मतदाता सूचियों की कमियों पर आयोग को शिकायत कर रहे हैं। न्यायालय के आदेश पर चुनाव समय सीमा में कराने अनिवार्य थे लेकिन सिस्टम को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि कम समय में भी गड़बड़ी विहीन चुनाव सुनिश्चित किया जाए।  

आजकल सिस्टम में जिम्मेदारी स्वीकारने का अभाव दिखाई पड़ता है। जवाबदेही से बचने पर ज्यादा विश्वास किया जाता है। नगरीय क्षेत्रों में विकास के जो हालात हैं वह भी कोई बहुत सुखद नहीं है। ऐसी-ऐसी योजनाएं क्रियान्वित की जाती है जिसमें जनता को सुविधा की बजाय असुविधा होती है। भोपाल में बीआरटीएस कॉरिडोर ऐसा ही एक उदाहरण है।

पूरे दिन में दो-चार बस इस कॉरिडोर से गुजरती होंगी लेकिन पूरी सड़क का आधे से ज्यादा हिस्सा इस कॉरिडोर में चला जाता है। सामान्य यातायात के लिए लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है। स्मार्ट सिटी के नाम पर शहरों में जो भी काम हुए हैं उनका कितना लाभ पब्लिक को मिल रहा है यह तो कहना बहुत मुश्किल है। 

नगरीय निकायों के पहले चरण में मतदान के रुझान को देखते हुए अगले चरण में निश्चित ही निर्वाचन आयोग, सिस्टम और राजनीतिक दल मिलकर प्रयास करेंगे। ताकि अधिकाधिक मतदान हो सके। ज्यादा से ज्यादा मतदाता नगर सरकार चुनने में अपनी भागीदारी कर सकें। कम मतदान के कारण राजनीतिक दलों में टेंशन का माहौल है।

अपने-अपने ढंग से परिणामों का आकलन किया जा रहा है। चुनाव कोई भी हो हर बार जब कम मतदान होता है तो राजनीतिक अनुमान और गुणा-भाग लगाए जाते हैं। सामान्यता ऐसा देखा गया है कि राज्य सरकार और नगर सरकार का डबल इंजन विकास के लिए ज्यादा कारगर होता है।