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प्रकृति ही नहीं राजनीति में भी जड़े हीं करती पुष्पित-पल्लवित

सार

बीजेपी के चाणक्य और पॉवर हाउस के रूप में माने जाने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मध्यप्रदेश के दौरे में कार्यकर्ताओं के दिल को छू लिया है. चुनावी तैयारियों की रणनीति के लिए कोर ग्रुप की बैठक में अंदर खाने की खबरें जो छनकर आई हैं उसमें पार्टी की बुनियाद और जड़ों को सहेजने की जरूरत अमित शाह ने बताई है.

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विस्तार

अमित शाह का यह सवाल बहुत मायने रखता है कि मध्यप्रदेश में पार्टी कार्यकर्ता इतना खफा क्यों है? कार्यकर्ता की भावना को पार्टी के सर्वोच्च स्तर पर गंभीरता से समझना ही कार्यकर्ता के लिए ताकत बन जाता है. एमपी का बीजेपी संगठन पार्टी में उदाहरण के रूप में देखा जाता रहा है. पार्टी कार्यकर्ता की ही बदौलत बीजेपी इस राज्य में इतने लंबे समय से शासन पर काबिज है. 2003 के पहले एमपी में बीजेपी सरकार बनाने में तो कई बार सफल हुई लेकिन पांच साल सरकार नहीं चला पाई थी.

केंद्रीय गृहमंत्री के मध्यप्रदेश दौरे को लेकर तमाम सारी अटकलें लगाई जाती रहीं. बदलाव की अफवाहों को भी पूरी हवा दी गई. राजनीतिक पंडितों के लिए अभी भी यह सवाल अनुत्तरित ही है कि क्या अमित शाह केवल एक बैठक लेने के लिए भोपाल आए थे? अमित शाह ने जो अपनी इमेज विकसित की है उसमें तो यह बात कोई मानने को ही तैयार नहीं होता कि उनका दौरा कभी भी बिना किसी रणनीति के होता है.

एमपी के लिए बीजेपी के नए चुनाव प्रभारियों को पॉवर सेंटर बताकर केंद्रीय गृहमंत्री ने राज्य के नेताओं को निश्चित रूप से संकेत दिया है कि चुनावी कमान केंद्रीय नेतृत्व के हाथों में ही होगी. पार्टी में एकजुटता की जरूरत भी केंद्रीय नेतृत्व के फीडबैक पर ही बताई गई होगी. कार्यकर्ता ही पार्टी को सत्ता में पहुंचाता है. एमपी में बीजेपी के वर्तमान सरकार पापुलर जनादेश से नहीं बल्कि कांग्रेस में टूट और उपचुनाव के जनादेश पर चल रही है.

किसी भी राजनीतिक दल में यह बात आमतौर पर शिकायत की जाती है कि कार्यकर्ता की सुनवाई नहीं हो रही है. अमित शाह ने भी अगर यह सवाल पूछा कि एमपी में कार्यकर्ता खफा क्यों है, तो इसको हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए. समाज में ऐसा कौन सा व्यक्ति होगा जिसे एक दूसरे के सहयोग और समर्थन की आवश्यकता ना हो. पार्टी कार्यकर्ता भी ऐसे ही सहयोग की अपेक्षा करता है.

बीजेपी कैडर बेस पार्टी है. कैडर ही उसकी ताकत है. बीजेपी देश की राजनीति में परिवारवाद और कैडरबेस राजनीति के फर्क को अपना बहुत बड़ा आधार बताती है. पार्टी के सामान्य कार्यकर्ता का प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का अवसर पार्टी में कार्यकर्ताओं को ताकत और समर्पण के साथ काम करने के लिए प्रेरित करता है. जो चीज प्रेरणा देती है, वही विपरीत परिस्थितियों में निराशा भी पैदा करती है. इसलिए कार्यकर्ताओं में उत्साह और सक्रियता के लिए आशा का संचार पार्टी के नेताओं की अहम जिम्मेदारी होती है. केवल चुनाव के समय कार्यकर्ताओं को तात्कालिक रूप से प्रोत्साहित करने की रणनीति कैडरबेस पार्टी में तो स्वीकार नहीं की जाती है.

केंद्रीय गृहमंत्री ने कार्यकर्ताओं की आवाज को एमपी की चुनावी रणनीति की बैठक में ताकत के साथ रखा है तो इसका मतलब है कि उनके पास फीडबैक की कमी नहीं है. अच्छी बात है कि एमपी के नेताओं को चुनाव से काफी पहले पार्टी के पॉवर हाउस से ऐसा फीडबैक दिया गया है. निश्चित रूप से कार्यकर्ताओं को साधने का अभी पर्याप्त समय है. जब भी कोई पार्टी सरकार में होती है तो संगठन का स्ट्रक्चर काफी हद तक सरकार के समन्वय से ही चलता है. कई बार ऐसी परिस्थितियां लेटलतीफी और नजरअंदाज मोड में चलने लगती हैं. यह कोई सोचा समझा प्रयास नहीं होता बल्कि स्वाभाविक रूप से शांति काल में हो जाता है.

कार्यकर्ताओं में ठहराव किसी भी पार्टी के लिए लाभदायक नहीं होता. कार्यकर्ताओं की गतिशीलता और सक्रियता सामान्य समय में भी उसी गति से यदि चलती रहेगी तो चुनाव के युद्ध के समय कार्यकर्ताओं की गतिशीलता चरम पर पहुंच जाएगी. लंबे समय से प्रदेश में सत्ता चलाने के कारण आम लोगों में और कार्यकर्ताओं में भी एंटी इनकंबेंसी हो सकती है. बीजेपी इसे साधने में सक्षम है. बशर्ते सभी नेता एकजुटता के साथ काम करें.

कार्यकर्ताओं को देवी देवता के रूप में वंदनीय बताकर उनकी अनंत संभावनाओं और अनंत क्षमताओं का केवल उपयोग करना पार्टी हित में नहीं होता. कार्यकर्ताओं को भी जीवन की हकीकत और भविष्य की संभावनाओं के प्रति आशावान बनाना संगठन की बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है. 

यहां कोई भी आपका सपना पूरा करने के लिए नहीं है. हर कोई अपनी तकदीर और हकीकत बनाने में लगा हुआ है. इस बुनियादी सिद्धांत को समझना बहुत जरूरी है. केवल उपदेश और संदेश से कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार करने का एप्रोच खुद को धोखे में रखने जैसा है. पार्टी के पॉवर हाउस ने अपना काम कर दिया है. साफ संदेश दे दिया है कि कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने की तत्काल जरूरत है.

एक मंदिर में बहुत सुंदर शब्द लिखे थे-
 
ठोकर खाकर भी ना संभले तो मुसाफिर का नसीब.
वरना पत्थरों ने तो अपना फर्ज निभा दिया है.