• India
  • Thu , Jul , 25 , 2024
  • Last Update 09:33:AM
  • 29℃ Bhopal, India

क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ, देश  के लिए खतरा

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Tue , 25 Jul

सार

क्षुद्र राजनीतिवश कुछ लोग विवाद का विषय बना रहे हैं. ट्वीट करके निशाना साध रहे हैं. ये मानसिकता और राष्ट्रीय चिन्हों पर विवाद किसी खतरे से कम नहीं है..!

janmat

विस्तार

प्रतिदिन -राकेश दुबे

12/07/2022
पूरा विश्व भारत के राष्ट्रीय चिन्ह अशोक स्तंभ  को जानता है |  देश के हर नागरिक का इस चिन्ह के प्रति सम्मान कर्तव्य है, नए संसद भवन की बिल्डिंग की छत पर कांस्य के राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ के अनावरण के बाद जो वातावरण बना है वो  राष्ट्रीय भावना के विपरीत है | क्षुद्र राजनीतिवश कुछ लोग विवाद का विषय बना रहे हैं | ट्वीट करके निशाना साध रहे हैं |ये मानसिकता और राष्ट्रीय चिन्हों पर विवाद किसी खतरे से कम नहीं है |

यह सब एक श्रंखला  के अंग हैं |कुछ दिनों में देश किस बुरी तरह से विभाजित हुआ है, इसका पता उन प्रतिक्रियाओं से चलता है, जो एक ही अदालत के दो अलग-अलग फैसलों के फौरन बाद आई, और निरंतर हैं  । ये प्रतिक्रियाएं अतिरेकी हैं और इस बात का द्योतक हैं कि अब हमारा समाज किसी भी तरह की मुखालिफ राय सुनने के लिए तैयार नहीं है।इसका ही नतीजा है कि पिछले दिनों उदयपुर और अमरावती में दो व्यक्तियों का नृशंसतम तरीके से गला काट दिया गया। राजनीतिक दलों ने देश के दो बड़े समुदायों- हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को चौड़ा करने का काम किया है|

राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ के अनावरण का विषय हो या अन्य कोई विषय उत्तेजना में निकले कुछ वाक्यों ने इस विभाजन की ओर संकेत दिए हैं, जो देश के लिए शुभ नहीं है, और पूरी तरह अस्वीकार्य है । इसी की परिणति आज टीवी चैनलों पर “कुछ भी कहना” आम दृश्य हो गया है, बहस में भाग लेने वालों की भाषा और बोलने के अंदाज से कोई भी समझ सकता है कि सब कुछ प्रायोजित है। इन बहसों से सिर्फ चैनलों की टीआरपी बढ़े न बढ़े , देश का क्षैतिज विभाजन पुख्ता होता दिखता है। कई बार तो ऐसा लगता है कि अनपढ़ धर्मगुरु जान-बूझकर उत्तेजनात्मक बातें कर रहे हैं, ताकि बहस को मसालेदार बनाया जा सके। इन बहसों में चैनल के एंकर की भूमिका ज्यादातर समय उत्तेजना कम करने का प्रयास करने की जगह इसे भड़काने वाले की ज्यादा दिखती है।सरकार अपनी राजनीति साध रही है, जबकि उसकी भूमिका इस समय निर्णायक है और उसे इस मुद्दे पर और अधिक गंभीरता से विचार करना चाहिए |

इस अफरा-तफरी में कुछ ऐसा भी हो रहा है, जिससे देश के संघीय ढांचे को ही नुकसान पहुंचा सकता है। स्वाभाविक है कि देश के प्रांतों में अलग-अलग दलों की सरकारें हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है, बिना अपवाद के वे सभी अपनी पुलिस का दुरुपयोग कर रही हैं। पिछले दिनों कई बार ऐसा हुआ कि एक राज्य की पुलिस किसी दूसरे राज्य में गिरफ्तारी करने गई और वहां उसे स्थानीय पुलिस से मदद तो दूर, उसके शत्रुतापूर्ण व्यवहार का सामना करना पड़ा। कई बार तो दो राज्यों के पुलिस बल आपस में इस तरह भिड़े कि लगा दो शत्रु राष्ट्रों के सैनिक एक-दूसरे से लड़ रहे हैं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है  जो मुकदमे कायम हुए, उनकी परिस्थितियां भी संदिग्ध रही हैं, जो अक्षम्य है |

देश के नागरिको  द्वारा आजादी के 78 वें वर्ष में अपेक्षा की जा रही थी कि देश अपने स्थायित्व या एकता के प्रति ज्यादा मजबूत होगा , पर यहां तो उल्टा ही हो रहा है। देशद्रोह के सबसे अधिक आरोप इसी साल लग रहे हैं? हाल में विस्थापन और पर्यावरण के मुद्दों पर जन-आंदोलन खड़ा करने वाली मेधा पाटकर के विरुद्ध एक मुकदमा दर्ज किया गया है, जिसके अनुसार, वे जनता से जुड़े मुद्दे उठाकर वह राष्ट्र-विरोधी कार्य कर रही है । इस धारणा के मुताबिक तो पर्यावरण की बात करने वाले देशद्रोही हैं और राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ के अनावरण पर विवाद करने वाले ?  अभी तक देश के समाज की समझ में एक छोटा-सा तथ्य नहीं बन पाया है कि देश और सरकार अलग अवधारणाएं हैं |आज  सरकार का विरोध राजनीतिक कारणों से राष्ट्र का विरोध कहा जाने लगा है यह भी गलत है ।

भारत इस अर्थ में भाग्यशाली हैं कि उसे दुनिया के बेहतरीन संविधानों में से एक मिला है। यह संविधान न्याय की सर्वोच्चता और बराबरी के सिद्धांतों की रक्षा तो करता ही है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी एक पवित्र मूल्य मानता है। इसकी भावनाओं को राजनीति दूषित करती दिख रही है , इसके उपाय फौरन खोजना होंगे |