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ज़हरीली हवा : हम कब सुधरेंगे ?

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Wed , 25 Jul

सार

दीपावली के बाद अगली सुबह दर्ज आंकड़ों ने फिर दिल्ली की जहरीली हुई हवा की हकीकत बता दी..!

janmat

विस्तार

दीपावली पर गैरजिम्मेदार व्यवहार से दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में जहरीली हवा बही,परंतु कुदरत की फुहार से उसमें बड़ी राहत मिली । लोग चैन की सांस लेने लगे । यूँ तो सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद दिल्ली व केंद्र सरकार कार्रवाई करने की बात कर रहे थे, लेकिन दीपावली पर जमकर हुई आतिशबाजी ने एक बार फिर उन लोगों के अरमानों पर पानी फेर दिया जो प्रदूषण कम होने से राहत की उम्मीद लगाए थे। 

दीपावली के बाद अगली सुबह दर्ज आंकड़ों ने फिर दिल्ली की जहरीली हुई हवा की हकीकत बता दी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद जमकर आतिशबाजी हुई और सोमवार को वायु गुणवत्ता सूचकांक नौ सौ पार कर गया। यह विडंबना ही है कि लोग संपन्नता के प्रदर्शन व क्षणिक सुख के लिये दूसरों के जीवन से खिलवाड़ करने से बाज नहीं आते। यह विचारणीय विषय है कि जब शीर्ष अदालत के आदेश के अनुसार दिल्ली व आसपास के इलाकों में पटाखों की बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा हुआ था तो इतने पटाखे कैसे फूटे? जाहिर है, तंत्र की नाकामी ही सामने आई। अब इस मुद्दे पर जमकर राजनीतिक बयानबाजी हो रही है। 

दिल्ली सरकार का आरोप है कि दिल्ली में तो पटाखों पर प्रतिबंध था लेकिन भाजपा शासित हरियाणा में पटाखों पर रोक नहीं लगाई गई, जिसके चलते हरियाणा से लगते दिल्ली के इलाकों में जमकर पटाखों की खरीद-फरोख्त हुई। सवाल यह भी कि दिल्ली शासन-प्रशासन ने इस पर अंकुश लगाने की पहल क्यों नहीं की? निश्चित रूप से नागरिक के रूप में तो हमारी यह विफलता है, लेकिन तंत्र भी अपनी नाकामी को नहीं छुपा सकता। दिल्ली सरकार व भाजपा के आरोप-प्रत्यारोपों के बीच मानवता इस संकट की कीमत चुका रही है। जो एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। बेहतर होता कि इस स्थिति को टालने के प्रयास किये जाते और राजनीतिक दल मतभेद भुलाकर सामने आते।

यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि दीपावली के दूसरे दिन एक्यूआई का स्तर नौ सौ का आंकड़ा पार कर गया। जो दुनिया में भारतीय तंत्र की नाकामी की वजह से देश की प्रतिष्ठा पर आंच लाने वाला है। विडंबना है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देश में कहा था कि बेरियम से बने पटाखों पर बैन है तो यह प्रतिबंध सिर्फ दिल्ली-एनसीआर पर ही नहीं, हर राज्य पर लागू होता है। सवाल यह है कि दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रों वाले पड़ोसी राज्यों का पुलिस प्रशासन यदि सख्ती दिखाता तो यह संकट इतना गहरा नहीं होता। यदि सतर्कता बरती जाती तो नौ-दस नवंबर की बारिश से जो राहत मिली थी, वह किसी सीमा तक बरकरार रह सकती थी। इस बारिश से करीब पचास फीसदी प्रदूषण कम हो गया था। मगर भारी आतिशबाजी के चलते तेरह नवंबर को दिल्ली के लाजपत नगर में वायु गुणवत्ता सूचकांक साढ़े नौ सौ से अधिक दर्ज किया गया। 

इस आतिशबाजी से देश में एक्यूआई चार गुना होने की बात कही जा रही है। देश के कई भागों में पटाखे जलाने के बाद वातावरण में प्रदूषित धुएं की काली परत देखी गई। जो प्रदूषण के खतरनाक स्थिति तक पहुंचने का परिचायक है। यह स्थिति पिछले कुछ सालों से बदतर हालात को दर्शाती है। यह संकट कितना घातक है कि कई स्थानों पर प्रदूषण का पी.एम. 2.5 का स्तर 45 गुना तक बढ़ा पाया गया। इसी तरह पी.एम.10 का स्तर 33 फीसदी तक बढ़ा पाया गया। ये कण इतने घातक हैं कि सांस के जरिये मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। इनकी हवा में उपस्थिति आदमी के लिये नुकसानदायक हो सकती है। बहरहाल इतना तय है कि एक नागरिक के तौर पर जब तक हम जिम्मेदार व्यवहार नहीं करेंगे, यह संकट समाप्त नहीं होगा। संवेदनहीन तंत्र हर बार कोर्ट की चाबुक के बाद जागता है लेकिन फिर अपनी सुप्त अवस्था में चला जाता है। यह स्थिति जनता की सक्रियता व जिम्मेदार व्यवहार से ही सुधरेगी। इस भयावह संकट की आहट को हर नागरिक को महूसस करना होगा।