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महंगाई से राहत : कोशिश है, पूरी नहीं

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Wed , 23 May

सार

अब सरकार ने खाद्य तेल खरीद रहे उपभोक्ताओं को लाभ पहुँचाने की कोशिश की है

janmat

विस्तार

प्रतिदिन—राकेश दुबे

गेंहू,पेट्रोलियम पदार्थ के बाद अब सरकार ने खाद्य तेल खरीद रहे उपभोक्ताओं को लाभ पहुँचाने की कोशिश की है, परिणाम प्रतीक्षित हैं |सरकार ने २०  लाख मीट्रिक टन सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल के आयात पर २  साल के लिए कस्टम ड्यूटी और एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट सेस खत्म करने का ऐलान किया है। यह सेस अभी ५ प्रतिशत है।फैसले से खाने का तेल सस्ता होने की उम्मीद है।

ऐसे वक्त में जब वैश्विक संकट के बीच देश की जनता कमरतोड़ महंगाई से जूझ रही है, केंद्र सरकार द्वारा शुल्क घटाकर जनता को राहत देने का फैसला वक्त की मांग ही थी। पिछले आठ साल की सबसे अधिक खुदरा व नौ साल की सर्वधिक थोक मुद्रास्फीति झेल रही जनता को इससे कुछ न कुछ राहत अवश्य मिलेगी। इससे जहां मालभाड़ा कम होगा, वहीं खाद्य महंगाई में कुछ कमी की भी उम्मीद जगी है।

देश के केंद्रीय बैंक ने भी संकेत दे दिये थे कि पेट्रो उत्पादों की कीमत में कमी के बिना महज मौद्रिक उपायों से महंगाई पर काबू पाना मुश्किल होगा। उल्लेखनीय है कि बीते साल नवंबर में भी केंद्र सरकार ने पेट्रोल व डीजल पर उत्पाद शुल्क घटाया था। उसके बाद भाजपा व एनडीए शासित राज्यों ने भी पेट्रो उत्पादों पर से वैट घटाया था। लेकिन विपक्ष शासित राज्यों ने इसका अनुकरण नहीं किया। इस बार केंद्र सरकार द्वारा की गई कटौती के बाद राजस्थान, ओडिशा व केरल ने अपने राज्यों के लोगों को राहत देने का प्रयास किया है। विश्वास है कि अन्य राज्य भी महंगाई से हलकान जनता का बोझ कम करने का प्रयास करेंगे। निस्संदेह, सरकारी खजाने पर सवा लाख करोड़ रुपये से अधिक का बोझ पड़ेगा, लेकिन वक्त की मांग थी रिकॉर्ड तोड़ महंगाई से जनता को राहत दी जाये। वैसे केंद्र सरकार के प्रत्यक्ष व परोक्ष करों में जो वृद्धि हुई है, उससे सरकार के घाटे में कमी हो सकेगी। मौजूदा वैश्विक संकट में महंगाई का ताप कम करना हर सरकार का नैतिक दायित्व होना चाहिए क्योंकि दो साल के कोरोना संकट की वजह से देश के अस्सी करोड़ से अधिक लोगों की आय का संकुचन हुआ है। ऐसे में जख्मों पर मरहम जरूरी था।

केंद्र सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों के उद्यमों को राहत देने का प्रयास किया है। सरकार ने प्लास्टिक उत्पादों, लोहे व स्टील पर कस्टम ड्यूटी कम करने की पहल भी की है। साथ ही वायदा किया है कि निर्माण उद्योग के लिये प्रचुर मात्रा में सीमेंट की उपलब्धता कराई जायेगी। दरअसल, देश के तमाम सेक्टर उत्पाद लागत में वृद्धि व आपूर्ति शृंखला में बाधा उत्पन्न होने से संकट के दौर से गुजर रहे हैं। सरकार के इस कदम से इन क्षेत्रों के उद्यमों को राहत मिलेगी। महंगाई के इस दौर में कोरोना संकट से उबरती अर्थव्यवस्था एक बार फिर पटरी से उतरती दिख रही है। ऐसे में आय का संकुचन होने से बाजार में मांग कम हो सकती है जिससे आखिरकार अर्थव्यवस्था की गति धीमी हो सकती है।

इस संकट के मूल में जहां कोरोना दुष्काल के जख्म हैं, वहीं इस तपिश वाली आग में घी डालने का काम रूस-यूक्रेन युद्ध ने किया है। जिसके चलते पूरी दुनिया में खाद्य आपूर्ति शृंखला बाधित हुई है। जाहिर है इस संकट से सारी दुनिया जूझ रही है और कई पड़ोसी देश दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गये हैं, लेकिन अपना घर संभालने की जिम्मेदारी तो सरकार की ही बनती है। इन तमाम मौद्रिक उपायों के साथ ही सरकार को महंगाई कम करने के लिये कुछ और अतिरिक्त उपाय करने चाहिए । लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को भी संबल देना ही होगा। ऐसे में विश्वास किया जाना चाहिए कि केंद्र सरकार के हालिया कदम से लोगों की मुश्किलों में कुछ कमी आयेगी। इस संकट में भारतीय कृषि क्षेत्र हमारी ताकत बना है। सरकार ने समय रहते गेहूं के निर्यात पर रोक लगाकर घरेलू बाजार में आम आदमी की प्राथमिक जरूरत आटे की कालाबाजारी पर रोक लगाने की सार्थक पहल की है। महंगाई कम करने के लिये केंद्र व राज्यों के साझे प्रयास जरूरी हैं। संकट के दौर में कम से कम राजनीति तो नहीं होनी चाहिए।