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नफरत की नकारात्मक दृष्टि से राजनीति का सकारात्मक दृष्टिकोण मुश्किल 

सार

भारत की सेकुलर राजनीति में भारत जोड़ो यात्रा से मोहब्बत, नफरत और डर की नई राजनीतिक भाषा का उदय हुआ है। राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी मुस्लिम तुष्टिकरण की बात करने से भयभीत हो गई है लेकिन मोहब्बत, नफरत और डर शब्दों का राजनीतिक भाषणों में उपयोग कर मुस्लिम समर्थन का संदेश देने की कोशिश लगातार की जा रही है। 

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विस्तार

भारत की राजनीति में आज ऐसा दौर आ गया है जब डर और नफरत शब्द का राजनीतिक उपयोग मुस्लिम समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। इसके पहले सेकुलर शब्द को भी इसी तरीके से राजनीतिक मान्यता मिल चुकी है। आज जो भी राजनेता अपने राजनीतिक संदेशों में इस तरीके के शब्दों का उपयोग करता है उसको मुस्लिम तुष्टिकरण से ही जोड़कर देखा जाता है। 

भारत जोड़ो यात्रा की बुनियाद और सोच ही विभाजन और नफरत को खत्म करने पर गढ़ी गई है। समाज में भले ही इस तरह की कोई खाई नहीं हो लेकिन राजनीतिक दल अपने खेल में इस तरह की खाई निर्मित कर राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि में लगे हुए हैं। राहुल गांधी की यात्रा भी कांग्रेस के खो गए परंपरागत जनाधार की राजनीतिक जमीन को तलाश करने के प्रयास के रूप में देखी जा रही है। 

भारत जोड़ो यात्रा जहां भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों को भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने का संदेश देने का प्रयास है, वही कांग्रेस के परंपरागत वोट दलित आदिवासी और मुस्लिम समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। फिलहाल नफरत की नकारात्मक दृष्टि से सकारात्मक राजनीतिक दृष्टिकोण का संदेश देना मुश्किल दिखाई पड़ रहा है। 

भारत जोड़ो यात्रा में एक ओर राहुल गांधी डर और नफरत की बात कर बहुसंख्यक हिंदू समाज को अप्रत्यक्ष रूप से निशाने पर लेते नज़र आते हैं वहीं दूसरी ओर वे यात्रा में सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति भी करते दिख रहे हैं। यह दोनों ही बातें विरोधाभासी हैं और बहुसंखयक हिन्दू समुदाय को गुमराह करती नजर आती हैं। हिन्दू हमेशा ही उदार माना जाता है नफरत उसके डीएनए में ही नहीं मानी जाती तो आखिर ये नफरत और डर का संदेश किसे और क्यों दिया जा रहा है?
 
राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को मध्यप्रदेश में शानदार रिस्पांस मिल रहा है। मध्यप्रदेश पहला हिंदी भाषी प्रदेश है जहां यह यात्रा पहुंची है। इसके पहले कन्याकुमारी से शुरू यह यात्रा जिन राज्यों से गुजरी है, उनमें दक्षिण भारत के साथ मराठी राज्य महाराष्ट्र शामिल था। मध्यप्रदेश में कांग्रेस का जनाधार भी अन्य राज्यों की तुलना में ठीक-ठाक है। यात्रा का मध्यप्रदेश पहुंचने पर जिस गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया है उसने मध्यप्रदेश में कांग्रेस का राजनीतिक माहौल  बनाया है। अभी यात्रा मध्यप्रदेश में कुछ दिन और रहेगी। मध्यप्रदेश में यात्रा को मिले रिस्पांस से अभिभूत राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश को अब तक की यात्रा का सबसे सफलतम प्रदेश बताया है। 

यात्रा के समन्वयक दिग्विजय सिंह को भी इस राजनीतिक यात्रा का लाभ मिलता दिखाई पड़ रहा है। उम्र के इस पड़ाव पर भी दिग्विजय सिंह ने यात्रा में पैदल चलकर जो ऊर्जा प्रदर्शित की है उस पर सामान्य लोगों में चर्चा है। कमलनाथ और कांग्रेस के दूसरे नेता राहुल गांधी के साथ कदमताल नहीं कर पा रहे हैं। कांग्रेस के अधिकांश नेता फोटो खिंचवाने के लिए दिन में एक दो बार यात्रा में शामिल होते हैं और उसके बाद वाहनों से यात्रा में चलते हुए दिखाई पड़ते हैं।  मध्यप्रदेश के दोनों ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर और महाकालेश्वर में राहुल गांधी द्वारा दर्शन और पूजन राजनीतिक मैसेजिंग के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है। 

मध्यप्रदेश में भारत जोड़ो यात्रा को विवादों से भी दो चार होना पड़ा है। आदिवासियों के मसीहा माने जाने वाले मामा टंट्या भील के जन्म स्थान पर भाषण में राहुल गांधी द्वारा अंग्रेजों के साथ उनकी लड़ाई और आरएसएस द्वारा अंग्रेजों का साथ देने के बयान पर विवाद सामने आया है। भाजपा की ओर से यह कहा गया कि जब मामा टंट्या को फांसी हुई थी तब आरएसएस का जन्म भी नहीं हुआ था। फिर इसको कैसे और क्यों जोड़ा गया? यद्यपि राहुल गांधी का संदर्भ कुछ और हो सकता है। 

पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे पर भी राहुल गांधी की यात्रा विवादों में घिरी है। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में एफआईआर दर्ज हो चुकी है। भारत जोड़ो यात्रा को लेकर मध्यप्रदेश में सरकार और बीजेपी अति सतर्क दिखाई पड़ रही है। जिस तरह के घटनाक्रम सामने आ रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि ज्यादा ही सतर्कता बरती जा रही है। यद्यपि यात्रा को सामान्य रूप से ही लिया जाना चाहिए। यह यात्रा जैसे बाकी राज्यों से गुजर गई है वैसे ही मध्यप्रदेश से भी गुजर जाएगी। 

यात्रा का प्रभाव मध्यप्रदेश में लगभग एक साल बाद होने वाले चुनावों पर क्या पड़ेगा, इसको अभी से नहीं कहा जा सकता। यात्रा से माहौल भले ही बन गया हो लेकिन इसको चुनाव तक बनाये रखना कांग्रेस के राज्य नेतृत्व के लिए बहुत कठिन होगा। मध्यप्रदेश में कांग्रेस का मुकाबला शिवराज और ज्योतिरादित्य सिंधिया की जोड़ी से है और यह मुकाबला कांग्रेस के लिए आसान नहीं कहा जा सकता। 

मध्यप्रदेश में इस बात पर लगातार चर्चा हो रही है कि राहुल गांधी की यात्रा का कांग्रेस को कितना लाभ होगा? यह बात तो चुनाव परिणामों के साथ ही स्पष्ट होगी लेकिन राहुल गांधी को व्यक्तिगत रूप से यात्रा से अवश्य लाभ होगा। यात्रा से उनकी छवि निखरेगी। चांदी के चम्मच के साथ पैदा होने की उनकी छवि बदलेगी और एक जमीनी नेता के रूप में उनका राजनीतिक भविष्य आंका जाएगा। 

राहुल गांधी की यात्रा मध्यप्रदेश के बाद राजस्थान में प्रवेश करेगी। राजस्थान कांग्रेस और  राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। कन्याकुमारी में यात्रा के प्रारंभ से ही राजस्थान में राजनीतिक विवाद चल रहा है। अभी हाल ही में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सचिन पायलट के ‘गद्दार’ होने का जो बयान दिया है उससे ऐसा लगता है कि गहलोत अब गांधी परिवार को खुली चुनौती दे रहे हैं। गहलोत के एपिसोड से जो राजनीतिक संदेश जा रहा है उससे राहुल गांधी और गांधी परिवार की किरकिरी हो रही है। इसके कारण यात्रा का संदेश प्रभावित हो रहा है। यात्रा अपने उद्देश्यों से भटकती हुई लगने लगती है। 

राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा निश्चित रूप से सफलता के पायदान छू रही है लेकिन इस यात्रा से जो राजनीतिक संदेश और एजेंडा सेट किया जाना चाहिए उस दृष्टि से यात्रा को खास सफलता नहीं मिल पा रही है। मध्यप्रदेश में तो भारत जोड़ो यात्रा कांग्रेस नेताओं में मतभेद का कारण भी बनती हुई दिखाई पड़ रही है। बुरहानपुर में निर्दलीय विधायक सुरेन्द्र सिंह शेरा और पूर्व सांसद अरुण यादव के बीच में विवाद सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं। इसी प्रकार इस यात्रा में कांग्रेस के कई नेताओं की भूमिका नगण्य दिखाई दे रही है। कमलनाथ और उनके समर्थकों द्वारा यात्रा के सारे प्रबंधन और प्रदर्शन पर कब्जा कर लिया गया है। इस कारण भी कांग्रेस के बीच तनाव देखा जा रहा है। 

भारत की राजनीति सकारात्मक रूप की ओर आगे बढ़ चुकी है। अब डर और नफरत की बात करके बहुत अधिक राजनीतिक सफलता हासिल करना नामुमकिन सा लगने लगा है। विकास और विश्वास के साथ समानता भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण आधार बनती जा रही है। अब किसी भी प्रकार के विभाजन या नफरत को आधार बनाकर राजनीतिक हित साधना असंभव सा हो गया है। यही कारण है कि भारत जोड़ो यात्रा को मिल रही सफलता दीर्घकालीन सफलता के रूप में नहीं देखी जा रही है। राहुल गांधी को अपनी राजनीतिक जमीन के लिए अभी और फोकस्ड और वैचारिक स्तर पर मेहनत करने की जरूरत रहेगी।