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6 जून 1674 को शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक तिथि पर विशेष

सार

शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक ज्येष्ठ शुक्ल त्रियोदशी को हुआ था...!

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विस्तार

शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक ज्येष्ठ शुक्ल त्रियोदशी को हुआ था। उस वर्ष यह तिथि 6 जून को थी। इस वर्ष यह ज्येष्ठ शुक्ल त्रियोदशी 12 जून को पड़ रही है। इसलिये इस वर्ष इस वर्षगाँठ का आयोजन 6 जून को भी है और बारह जून को भी रहेगा। कहीं कहीं यह स्वाभिमान उत्सव पूरे सप्ताह चलने वाला है।

चूँकि शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक उत्सव पूरे दस दिन चला था। इसका कारण यह था कि शिवाजी महाराज और उनकी माता जीजा वाई ने इस आयोजन को केवल राज्याभिषेक आयोजन तक सीमित न रखा था। अपितु इसे भारत राष्ट्र के स्वाभिमान और स्वत्व जागरण के उत्सव का स्वरूप प्रदान किया था।

वह काल-खंड साधारण नहीं था। वह मुगल बादशाह औरंगजेब द्वारा भारत में भारत्व के दमन अभियान का दौर था। औरंगजेब ने 1665 में सभी साँस्कृतिक प्रतिष्ठानों और मंदिरों को ध्वस्त करने का आदेश निकाला था। बल, भय और लालच से मतान्तरण का अभियान चलाया जा रहा था। भारत के मूल निवासियों के समक्ष अपनी ही मातृभूमि पर प्राण बचाने और पेट भरने का संकट सामने था।

उन विषम और विपरीत परिस्थितियों में शिवाजी महाराज ने स्वत्व और स्वाभिमान जागरण अभियान आरंभ किया और साम्राज्य की नींव रखने के संकल्प को पूरा किया। भारत में भारत के अस्तित्व दमन से भरे उस घोर अंधकार युग में हिन्दवी स्वराज्य या हिन्दू साम्राज्य की स्थापना इतिहास का वह अद्भुत प्रसंग है, जिसके उदाहरण दुनियाँ में बहुत कम मिलते हैं।

यह शिवाजी महाराज स्वत्व जागरण का संकल्प ही तो था जो उन्होंने अपने राज्य क्षेत्र को केवल साम्राज्य नहीं अपितु "हिन्दवी स्वराज्य" का नाम दिया था। उस वर्ष 6 जून 1674 की तिथि को समुद्र सतह से लगभग पन्द्रह सौ मीटर ऊँचाई पर बने रायगढ़ किले में हिन्दवी स्वराज्य या हिन्दू साम्राज्य के संकल्प ने आकार लिया था।

इसके लिये राज्याभिषेक कराने के लिए पधारे बनारस के आचार्य पं. गागा भट्ट, माता जीजाबाई और इतिहास प्रसिद्ध संत समर्थ स्वामी रामदास सहित भारत के कौने कौने से पहुंचे स्वराज समर्थक प्रतिनिधि उस आयोजन के साक्षी बने। वह आयोजन और वह क्षण जितना भारतीय संदर्भ के लिये जितना अविस्मरणीय है इतिहास में उसका उल्लेख उतना ही अल्प है।

इसके जो भी कारण रहे हों लेकिन आज भारतीय जन एक ओर जहाँ विश्व की महाशक्तियों के बीच भारत राष्ट्र की नाम और स्थान प्रतिष्ठित करने के अभियान में लगे हैं वहीं दूसरी ओर अपने अतीत के पन्नों में विखरे गौरव पलों को भी एकत्र करने और संकलित करने के काम भी आरंभ हुआ है। नवीन पीढ़ी की इस श्रम साधना से जो गौरवमयी तथ्य सामने आये हैं वे प्रत्येक भारतीय का शीश उन्नत करने वाले हैं ।

यह तथ्य हमें यह बोध कराते हैं कि भारत ने कभी भी दासत्व की पूर्णता को स्वीकार नहीं किया। यह ठीक है कि परिस्थिति जन्य विवशताओं के चलते भारतीय पूर्वजों ने स्वयं को सीमित किया अथवा कहीं शीश भी झुकाया लेकिन उनके हृदय में स्वत्व और स्वाभिमान सदैव जागरत रहा।

इसीलिए शताब्दियों तक दासत्व दमन सहने के बाद भी भारत में भारत का अस्तित्व जीवित रह पाया। अन्यथा हम देख लें पूरी दुनियाँ को आक्रांताओं और दमन से सबका स्वरूप बदल गया। उनका जीवन संस्कृति और संस्कार सब इतिहास का अंग रह गये पर भारत में भारत का स्वत्व अपने गौरव के साथ स्थित है।

भारत के अतिरिक्त दुनियाँ में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं कि दासत्व के अंधकार में उनकी सभ्यता सुरक्षित रही हो। भारत को क्षति तो बहुत हुई फिर भी भारत में भारतत्व सुरक्षित रहा। भारत के स्वाभिमान और अस्मिता का संगठित स्वरूप ही है शिवाजी महाराज का हिन्दवी स्वराज्य। 

यह साम्राज्य चारों ओर तनाव दबाव और आक्रमणों के बीच स्थापित हुआ था। दक्षिण से गुजरात तक पाँच सुल्तान और उत्तर में शक्तिशाली मुगल, लेकिन शिवाजी महाराज ने सबसे टक्कर ली। चारों ओर मोर्चा साधा था। कभी संगठित शत्रुओं का सामना किया तो कभी कूटनीतिक कौशल से..! इनमें कोई ऐसा नहीं जो उनके युद्ध कौशल और रणनीति से पराजित न हुआ हो।

उन्होंने दक्षिण में आदिलशाही और निजामशाही को ही पराजित नहीं किया अपितु मुगल सेना को भी पराजित किया और युद्ध का व्यय वसूला। शिवाजी महाराज ने अपनी शक्ति का विस्तार अपने पिता के रहते ही कर लिया था लेकिन उन्होंने अपनी स्वतंत्र सत्ता की घोषणा पिता के रहते नहीं की थी।

यह उनकी माता जीजाबाई के संस्कार और गुरू समर्थ स्वामी रामदास की शिक्षा थी कि उन्होंने अपने पिता के रहते अपने साम्राज्य की विधिवत घोषणा नहीं की। इसका कारण यह था कि उनके पिता शाहजी आदिलशाही में सेनापति थे और उन्होंने अपने राजा को वचन दिया था कि शिवा स्वतंत्र शासक नहीं बनेंगे। इसीलिए शिवाजी महाराज ने पिता के रहते स्वयं को संयमित किया।

पिता के रहते शिवाजी महाराज के पास पूना को केन्द्र मानकर लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर लंबे और लगभग अस्सी किलोमीटर चौड़े क्षेत्र में पूर्ण आधिपत्य हो गया था, यहाँ उनकी अपनी सेना थी। लेकिन तब वे स्वयं को पिता की ओर से आदिलशाही की धरोहर ही बताते थे। जब पिता का देहान्त हुआ तब शिवाजी महाराज ने अपने स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया।

राज्याभिषेक की घोषणा कर दी। जिसका नाम उन्होंने हिन्दवी स्वराज दिया। राज्याभिषेक के पूर्व ही उनके मन में अपनी भावी सत्ता का और भारत राष्ट्र में स्वाभिमान की पुनर्प्रतिष्ठा का एक पूरा स्वरूप था जो तत्कालीन परिस्थितियों का प्रतिकार करने और सुधार करने के संकल्प के साथ तैयार हुआ था। जिसकी झलक पूरे भारत में देखने को मिली। शिवाजी महाराज वे भयानक परिस्थितियां कभी नहीं भूले थे जो उन्होंने बचपन से देखीं और सुनी थीं।

बचपन में उन्हे उन समाचारों ने विचलित किया था कि बनारस में मंदिर तोड़कर आक्रमण कारियों ने मूर्तियों को सीढ़ियों में लगवाया था। वे तुलजा भवानी के उपासक थे। यह मंदिर भी तोड़ दिया गया था। चिपलूर में भगवान् परशुरामजी मंदिर और पंढरपुर के बिढोवा मंदिर को भी ढहा दिया गया था। स्त्रियों का अपमान तो मानों हमलावरों के सैनिकों के खून में था।

शिवाजी महाराज के सामने वह विवरण स्पष्ट था किस प्रकार निजाम ने पूना पर हमला कर पूरा नगर विध्वंस किया, कत्ले आम कराया था। स्त्रियों के चीत्कार से आसमान गूँज गया था। इस हमले का वीभत्स वर्णन आज भी इतिहास के पन्नों पर है कि तब पूना में लाशें उठाने वाला भी कोई न बचा था। ऐसी तमाम बातों ने शिवाजी महाराज के भीतर एक श्रेष्ठ सैनिक और संस्कृति रक्षक बनने का संकल्प जगाया था। वे अपनी बाल्य वय में ही सैनिक अभ्यास करने लगे थे। उन्होंने बालपन में ही टोलियाँ गठित करने और पीड़ितों की सेवा का काम आरंभ कर दिया था।

कोई सैनिक वहां रहने वाले किसी परिवार को या सैनिकों की टुकड़ी किसी गाँव को प्रताड़ित करती तो उनकी सेवा के लिये पहुँचने वाली टोली शिवा की होती। उनके इन सेवा कार्यों ने ही उन्हे लोकप्रिय बनाया और स्वतंत्रता के विचार के बच्चे उनकी ओर आकर्षित होने लगे। किशोर वय तक तो उन्होंने एक सैन्य टुकड़ी का गठन कर लिया था और सैनिकों को अत्याचार से रोकते।

उनकी शिकायतें कयी बार आदिलशाही में हुईं और पिता को सफाई देना पड़ी। यह उनके भीतर पनपता गुस्सा ही था कि जब पिता उन्हे एक बार दरबार में लेकर गये तो उन्होंने सिर नहीं झुकाया। तब शिवाजी महाराज बारह वर्ष के थे। पन्द्रह वर्ष की आयु में शिवा ने युद्ध में हिस्सा लिया। यह युद्ध पूना के दक्षिण में जुन्नारनगर में हुआ। जिसका नेतृत्व स्वयं शिवा ने किया।

शिवाजी पूना के विध्वंस को कभी न भूले। उन्होंने पूना का पुनर्निर्माण कराया और सोने का हल चलवाया। शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित इस साम्राज्य स्थापना के इस विवरण में  संपूर्ण भारतीय संस्कृति की झलक मिलती है। वैदिक वाड्मय से लेकर आचार्य चाणक्य के सिद्धांत तक सभी सिद्धान्तों की झलक इस समारोह में थी। जिसमें राजा स्वामी नहीं सेवक का भाव लेकर सिंहासन संभालता है।

राज्य की शक्तियाँ या तो समाज के पास होतीं हैं या प्रधानों के पास । राजा केवल उनका संयोजन करता है। शिवाजी महाराज इसी भाव से सिहासनारूढ हुये। उन्होंने पूरा मंत्रीमंडल बनाया जिन्हे "अष्ट प्रधान" का नाम दिया गया। इसमें पेशवा, आमात्य, मंत्री  सचिव, सुमन्त, नायक, पंडित राव और न्यायधीश ये कुल आठ पद थे। इस मंत्री मंडल को ही अष्टप्रधान कहा गया । प्रत्येक प्रधान अपने विभाग से संबंधित कार्यों का निर्णय लेने में स्वतंत्र था।

इसमें पेशवा के अधिकार प्रधानमंत्री के रूप में, आमात्य के पास समस्त वित्तीय अधिकार, मंत्री के पास साम्राज्य में घटी समस्त घटनाओं का विवरण, सचिव के पास समस्त कार्यालय और कार्य प्रगति का विवरण, सुमन्त की भूमिका विदेश मंत्री जैसी, नायक की भूमिका सेनापति के रूप में पंडितराव के पास धर्मस्व निर्णय अधिकार और न्यायधीश  के पास विवादों का निराकरण का दायित्व था।

कहने के लिये यह हिन्दवी स्वराज्य या हिन्दू साम्राज्य था लेकिन इसमें सभी मतों और धर्मों को समान आदर था । शिवाजी महाराज ने यदि मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया तो पूना में अपने निवास के सामने मस्जिद का निर्माण भी कराया । तो पादरी एंब्रोज के आग्रह पर चर्च का निर्माण भी कराया। उनके शासन में  चर्च और मस्जिदों  को भी अनुदान मिलता था ।

महिलाओं, निराश्रितों और बुजुर्गों के सम्मान के विशेष निर्देश थे। इसका उदाहरण बसई युद्ध में मिलता है । युद्ध के बाद खजाने की पूछताछ करते बक्त नबाब की बहू को बंदी बनाकर पूछताछ हुई इस पर शिवाजी महाराज ने क्षमा याचना की और सम्मान सहित विदा किया। यह शिवाजी महाराज की ही परंपरा थी कि मराठों ने जब और जहाँ युद्ध जीते महिलाओं का सम्मान  किया।

यदि आगे चलकर पेशवा ने दिल्ली में बादशाह को बंधक बनाया तब भी जनानखाने में कोई सैनिक प्रविष्टि न हुआ। जबकि नादिरशाह और गुलाम कादिर ने मुगल जनानखाने में क्या किया यह सब विवरण इतिहास के पन्नों में दर्ज है। शिवाजी महाराज ने संस्कृत और मराठी को राजभाषा घोषित किया, अपनी मुद्रा निकाली। यह राज मुद्रा संस्कृत में थी जिसे बनारस के आचार्य पंडित गागा भट्ट ने तैयार किया था जिसमें अंकित था- 

"प्रतिपच्चंद्र लेखेव वर्धिष्णु विश्ववंदिता, शाहसुनोः शिवस्येषा मुद्राय राजते"

अर्थात "जिस प्रकार बाल चन्द्र प्रतिपदा से धीरे धीरे बढ़ता है और सारे विश्व द्वारा वंदनीय होता है उसी प्रकार शाहजी राजे के पुत्र शिवा की यह मुद्रा बढ़ती जायेगी"

शिवाजी महाराज ने नयी कर प्रणाली लागू की जिसमें। छोटे कृषक से कम और बड़े कृषक से अधिक कर लेने के मानदंड स्थापित किये गये। गोहत्या निषेध और स्त्री सम्मान का आदेश जारी हुआ। उन्होंने नौसेना का एक बेड़ा तैयार किया। यही बेड़ा भारत नौसेना की शुरुआत है।

हालांकि भारतीय नौ सेना के इतिहास में शुरुआत अंग्रेजों द्वारा तैयार उस टुकड़ी को बताया जाता है जो उन्होंने अपने व्यापार रक्षा के लिए तैयार की थी, पर वह तो व्यापार रक्षा के लिए लिये थी। युद्ध के लिये तो बेड़ा शिवाजी महाराज ने ही तैयार किया था, शिवाजी महाराज ने उस समय के अधिकांश राजाओं को स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने के लिये भी प्रेरित किया था और सहायता का आश्वासन दिया था।

शिवाजी महाराज के कहने पर ही बुन्देलखण्ड में महाराज छत्रसाल ने, आसाम में महाराज चक्रधर सिंह ने और कूचविहार में महाराज सत्य सिंह ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की थी। शिवाजी महाराज ने राजा जयसिंह को भी पत्र लिखकर स्वतंत्र राजा बनने का आग्रह किया था। यह हिन्दवी स्वराज्य का संकल्प ही था सैकड़ो साल बाद भारत में स्वतंत्र सत्ता का बोध हुआ। शिवाजी महाराज तक आते आते भारतीय शासक स्वतंत्र सत्ता मानों भूल चुके थे। आक्रामकों द्वारा उनसे छीनी गयी सत्ता में अधीनस्थ रहना ही मानों भारतीयों ने अपना भाग्य समझ लिया था। 

हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना ने मानो पूरे देश को झकझोर दिया। आत्म अभिमान का बोध जागा और अपनी सत्ता का संघर्ष आरंभ हुआ और अंततः भारत ने अपने स्वतंत्र आसमान तले श्वांस लेना आरंभ की। आज इसी स्वाभिमान और स्वत्व स्थापना की स्मृति का दिन है। भारत लाखों बलिदानियों की आहूति से 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र तो हुआ पर स्वत्व बोध का अभियान अभी शेष है। हम मानसिक, बौद्धिक सांस्कृतिक और परंपराओं की दृष्टि से भी अपनी जड़ो की ओर लौटें।

यह स्मृति हमें शिवाजी महाराज के हिन्दवी स्वराज से होती है। उन विषम और विपरीत परिस्थितियों में भी शिवाजी महाराज ने भले भारतीय वैदिक चिंतन वसुधैव कुटुंबकम् सिद्धांत के अंतर्गत चर्च और मस्जिदों को संरक्षित किया पर उनकी प्रधानता में संस्कृत और सनातन संस्कृति ही मूल थी।

संस्कृत में मुद्रा प्रसारित की, विभिन्न राजाओं को स्वयं सत्ता का संदेश भेजा। इन दिनों हम अपनी स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। उत्सव और आनंद के इन क्षणों में यह समीक्षा करने की भी आवश्यकता है कि भारत और भारतीय समाज स्वत्व बोध के प्रति कितना जागरूक है। तभी हिन्दवी स्वराज की स्मृति सार्थक होगी और स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव भी...!!