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निचोड़ सत्ता के सेमीफायनल के नतीजों का

सार

सनातनी भाव की ओर बढ़ रहा देश, भाजपा को मजबूत कर रहा प्रदेश-प्रदेश..!!

janmat

विस्तार

नए साल की गर्मियों में होने वाले लोकसभा चुनाव की दहलीज पर हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों का सबब आखिर क्या है? मोदी का चेहरा है? मोदी की गारंटी है? अमित शाह और जगत प्रकाश नड्डा की जोरदार रणनीति है? मप्र के मुख्यमंत्री सरीखे भाजपा नेताओं की लाड़ली बहना सरीखी गेमचेंजर योजना है? मुफ्त की रेवडि? की प्रतिस्पर्धा है? या कांग्रेस के प्रति लोगों का घटती विश्वसनीयता या आम जन की नब्ज से हटता उसका हाथ है? या फिर कांग्रेस और अन्य वैकल्पिक क्षेत्रीय दलों के समर्थन में जुटते के अल्प संख्यक वर्ग विशेष लोगों के जमावड़े के खिलाफ सनातन धर्म को मानने वाले हिंदुओं की भाजपा के पक्ष में बढ़ती एकजुटता है? या फिर यह माना जाए कि मप्र, छत्तीसगढ़ या राजस्थान में व्यक्ति विशेष के चेहरे के बजाए सामूहिक नेतृत्व के आधार पर लड़ा गया चुनाव है ? इन नतीजों से यह तो साफ है कि कांग्रेस केवल उन्हीं राज्यों में भाजपा या क्षेत्रीय दलों का विकल्प रह गई है जहां कोई और रास्ता मतदाताओं के सामने नहीं रह गया है।

ये तमाम सवाल इसी मीमांसा की तरफ इशारा करते हैं कि मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ और राजस्थान तथा तैलंगाना में हुए चुनावों के नतीजे ऐसे क्यों आ रहे हैं। इन सभी चुनाव राज्यों का सिलसिलेवार चुनावी विश्लेषण किया जाए और अगले साल गर्मियों में होने वाले लोकसभा चुनावों के संभावित नतीजों पर विचार किया जाए तो स्थिति काफी हद तक साफ हो सकती है और देशी भावी दिशा की तरफ पहुंचा जा सकता है। कड़वी सच्चाई किसी को अच्छी लग सकती है या किसी को आहत कर सकती है लेकिन इसकी परवाह किए बगैर एक प्रो-पीपुलल्स पत्रकार के नाते अपनी बात रखने की कोशिश करता हूं। शुरूआत मध्यप्रदेश से ।

1-जीत को हार में तब्दील करना कांग्रेस से सीखें: याद कीजिए मध्यप्रदेश में छह महीने पहले के हालात को। सूबे में कड़ी मेहनत करने के बावजूद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार के खिलाफ जनता में सत्ता विरोधी माहौल को देखकर कांग्रेसी पुलकित थे। हालात 2018 से भी बदतर थे। कांग्रेस को लग रहा था कि शिवराज पर उबलते लोग कांग्रेस के पक्ष में मतदान के लिए टूट पड़ेंगे। लेकिन गांधी परिवार की अंडरएस्टीमेटेड नेता प्रियंका गांधी ने 23 जुलाई 2023 को ग्वालियर में कांग्रेस की चुनावी रैली को आगाह कर दिया था कि कांग्रेसी अपने हमले का निशाना केवल शिवराज पर साधें । भाजपा के दूसरे नेताओं की अनदेखी करें। ज्योतिरादित्य सिंधिया पर हमले से बचें। प्रियंका गांधी के इन मंसूबों को मप्र के कांग्रेसी नेता तो नहीं भांप सके लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इसको ताड़ गए। उन्होंने शिवराज को कांग्रेस के सीधे हमलों से बचाने के लिए कैलाश विजयवर्गीय, नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटैल जैसे नेताओं की फौज खड़ी कर दी तो केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनावी समर में उतारने के बजाए पूरे प्रदेश में झोंक दिया। फिर शाह के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के वादों और जीत की गारंटी बनकर खड़े हो गए। इसके बाद नतीजा पूरी तरह पलट गया। मालवा-निमाड़ में कैलाश विजयवर्गीय ने जान फूंकी तो महाकौशल सहित लोधी बाहुल्य इलाकों में प्रहलाद पटैल ने कमाल दिखाया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लाड़ली बहना योजना ने राजगढ़, गुना, रायसेन विदिशा से लेकर, बुंदेलखंड विंध्य और जबलपुर जैसे जिलों में बहनों को भाई के साथ खड़ा कर दिया।

2- सिंधिया गद्दार नहीं खुद्दारः इसके विपरीत 2018 में चुनावों से चंद महीने पहले आईपीएल क्रिकेट की तर्ज पर मध्यप्रदेश कांग्रेस की फ्रैंचाईजी लेने वाले कोरोबारी कम नेता कमलनाथ यही मानते रहे कि वह 15 महीने की सत्ता संभालने के अनुभवों का लाभ लेकर सूबे में कांग्रेस की नैया पार लगा देंगे। उनकी टीम के मेंटर पांच साल पहले भी दिग्विजय सिंह थे और इस बार भी वही परदे के पीछे रहकर नाथ को मध्यप्रदेश में कांग्रेस की राजनीति का पाठ पढ़ाकर पास करा देंगे। लेकिन अति आत्मविश्वास में डूबे नाथ यह भूल गए कि टीम मप्र की फ्रैंचाईज भले ही उनके साथ हो। मेंटर भले ही दिग्गीराजा हों पर मैदान पर खेलने वाला खिलाड़ी ज्योतिरादित्य सिंधिया उनके पास नहीं है, जिनके सहयोग से कांग्रेस बहुमत के करीब पहुंची थी। नाथ- और दिग्गी ने 2018 में सरकार बनाने के बाद सिंधिया को हाशिए में धकेलने की कोशिशें तेज कर दीं। नाथ ने उन्हें सड़कों पर उनकी सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने की चुनौती दी लेकिन सिंधिया ने उनको सडक पर ला दिया। सत्ता का साथ छूटने से खीझे नाथ और दिग्गी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को गद्दार कहना शुरू कर दिया। लेकिन 2023 के नतीजों ने साबित कर दिया कि सिंधिया ने मार्च 2020 में गद्दारी के लिए नहीं बल्कि अपनी खुद्दारी के लिए कांग्रेस छोड़ी।

3- मोदी-शाह की रणनीति काम आई: यदि भाजपा ने कांग्रेस की तरह गेहलोत, भूपेश बघेल या कमलनाथ के चेहरे पर चुनाव लड़ा होता तो पार्टी के भीतर की सिरफुटीव्वल उसे भी वोट प्रतिशत और जीत के आंकड़ों में नीचे उतार देती। इसलिए मोदी शाह ने तीनों राज्यों में स्थानीय चेहरों को पीछे रखते हुए भाजपा के नाम और खुद के चेहरे को सामने रखकर चुनाव लड़ा और तीनों ही राज्यों में हारी बाजी को जीत में तब्दील कर डाला।

4- -कांग्रेस के सीमित होते विकल्प: हिमाचल में भाजपा का पुराने ट्रेंड को तोड़कर सत्ता में न आ पाने का मलाल या कर्नाटक में भाजपा की गल्तियों से मिली जीत को अपना समझने वाली कांग्रेस के पास जीत के विकल्प लगातार कम हो रहे हैं। कांग्रेस या तो राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में सत्ता में आ-जा रही है जहां भाजपा या क्षेत्रीय दलों का कोई विकल्प नहीं है। या फिर या तमिलनाडू, पंजाब जम्मू कश्मीर, आंध्र या केरल जैसे राज्यों में जहां अभी तक भाजपा मजबूत विकल्प के बतौर खड़ी नहीं हो सकी है। बिहार से लेकर तमिलनाडू तक उसके लिए क्षेत्रीय दल बैसाखी बने रहे हैं। तैलंगाना में कांग्रेस इसलिए जीती क्योंकि वहां भाजपा केसी चंद्रशेखर राव की भारत राष्ट्र समिति का विकल्प नहीं बन सकी है। लेकिन आट सीटों की जीत और 14 फीसदी वोट शेयर के साथ उसने आने वाले वर्षों के लिए अपनी प्रभावी दस्तक तो दे ही दी है। साथ ही बी आरएस के सामने इंडिया के बजाए एनडीए के साथ जुड़ने का विकल्प भी दिया है।

बढ़ता सनातनी भाव ले जा रहा भाजपा को लक्ष्य की ओर
अल्पसंख्यकों के एक वर्ग में आक्रामक अंदाज में भाजपा के खिलाफ जितना तेजी से विकर्षण और कांग्रेस के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है, उतना ही तेजी से देश के हिंदुओं में धीरे-धीरे और गुपचुप ही सही सनात प्रतिक्रिया स्वरूप बढ़ता जा रहा है। यह भाव ही भाजपा को पचास फीसदी मतों के लक्ष्य के पार पहुंचाने में मदद कर रहा है। यानि चुनाव दर चुनाव | उसके पक्ष और खिलाफ में होते उलट पुलट (फ्लोटिंग वोट) मतदाताओं पर उसकी निर्भरता कम होती जाएगी।